लोकतंत्र की सौगातें (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Nov 16, 2023

हमारे विश्वस्तरीय लोकतंत्र की अनेक सौगातें हैं । पूरी दुनिया हमारा लोहा मानती है। लोहा एक सस्ती धातु है इसका विकास कर, बढ़िया प्रारूप दे दिया जाए तो कीमत बढ़ जाती है। यदि हम यह कहें कि दुनिया हमारा पीतल कांस्य या सोना मानती है तो कितने गर्वित और यशस्वी हो सकते हैं। वैसे भी सोना खरीदने में हिन्दुस्तानी बहुत समृद्ध हैं। वह बात दीगर है कि सोना संभाल कर ज्यादा रखा जाता है क्यूंकि सार्वजनिक रूप से पहनना खतरनाक होता जा रहा है। लोहा माने या सोना, मुहावरों का क्या है जब चाहें बदल सकते हैं। बदलते वक़्त के साथ बदलना भी चाहिए। देखिए न, हमने हिंदी और अंग्रेज़ी को मिलाकर, हिंगलिश पका ही दी न और खूब प्रयोग हो रही है।  

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बताते हैं, भगवान का देश कहे जाने वाली धरती के सत्तर प्रतिशत लोग, दुर्भाग्य से आपराधिक मामलों में फंसें हैं। उनका भाग्य उस खास वक़्त में सही तरीके से काम कर रहा होता तो वह साफ़, स्वच्छ बच निकलते और अपनी सफलता पर बेशर्मों की तरह खिलखिलाकर हंसते। उन्होंने यह काम ज्यादा लोकतांत्रिक माहौल में, सुरक्षित तरीके और अनुभवी लोगों से नहीं करवाए, वरना नहीं फंसते। लोकतंत्र किसी समाज और देश की आत्मा की तरह होता है। उसे बुरा कहो, बदनाम करो, अच्छा कहो, तारीफ़ करो, कुछ फर्क नहीं पड़ता। बहुत पवित्र होता है लोकतंत्र। सुना है, शिक्षा आंखे खोलती है। व्यक्ति को मनुष्य बनाने में बहुत मदद करती है लेकिन ऐतिहासिक, प्राचीन विश्वविद्यालयों की क्यारियों में तो अपराध के फूल ज़्यादा खिल रहे हैं। 

आयोग की बातें कौन सुनता है। व्यवस्था के बीच हलफनामों की क्या बिसात है। ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता तो अब वस्तुएं बन गई हैं जो ज़िंदगी के बाज़ार की रौनक बढ़ा रही हैं। यह सर्वप्रिय तंत्र, लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। राजनीति का अर्थ समाज सेवा पता नहीं किसने उगा दिया। राज करने की नीति ही राजनीति होती है। बदलते इंसान के साथ परिभाषाएं बदलने को कौन रोक सकता है। अब लोकतंत्र के हलवे में समानता और समरसता के बादाम नहीं बल्कि जाति, क्षेत्र, सम्प्रदाय, धर्म, स्वार्थ, भ्रष्टाचार और मनमाने तंत्र, मंत्र, षडयंत्र जैसे स्वादिष्ट मसाले डाले जाते हैं। जो स्वाद लेकर खाता है उसे प्रशंसा मिलती है। 

जो लोकतंत्र के नियमों के अनुसार कार्य करता, चलता फिरता है, वही स्वस्थ रहता और लम्बी उम्र पाता है। वह जो चाहे कर सकता, जितना चाहे कमा सकता है। दिमाग खोलकर गुप्त दान दे सकता है। लोकतंत्र की खूबसूरती, कमी, अदा और खुराफातों के ज़िम्मेदार संतरी मंत्री कुछ भी करते रहें वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देता, उसे पता है संतुष्ट और शांत रहना चाहिए ताकि एक बार मिली ज़िंदगी आराम से बसर हो जाए।  कुछ कहेगा तो तंत्र उसे बख्शेगा नहीं। यही हमारी टनाटन लोकतांत्रिक संस्कृति है। 

- संतोष उत्सुक

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