विश्व पर्यावरण दिवसः बड़ा पर्यावरणीय खतरा है ग्लेशियर का पिघलना

By ललित गर्ग | Jun 05, 2021

विश्व पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को मनाया जाता है। इंसानों को प्रकृति, पृथ्वी एवं पर्यावरण के प्रति सचेत करने के लिए यह खास दिवस मनाया जाता है, और देश एवं दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की याद दिलाई जाती है। यह सर्वविदित है कि इंसान व प्रकृति के बीच गहरा संबंध है। इंसान के लोभ, सुविधावाद एवं तथाकथित विकास की अवधारणा ने पर्यावरण का भारी नुकसान पहुंचाया है, जिसके कारण न केवल नदियां, वन, रेगिस्तान, जलस्रोत सिकुड़ रहे हैं बल्कि ग्लेशियर भी पिघल रहे हैं, जो विनाश का संकेत तो है ही, जिनसे मानव जीवन भी असुरक्षित होता जा रहा है। वर्तमान समय में पर्यावरण के समक्ष तरह-तरह की चुनौतियां गंभीर चिन्ता का विषय बनी हुई हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल कर समुद्र का जलस्तर तीव्रगति से बढ़ा रहे हैं। जिससे समुद्र किनारे बसे अनेक नगरों एवं महानगरों के डूबने का खतरा मंडराने लगा है। इस बार पर्यावरण दिवस ऐसे समय में आया है, जबकि पूरी मानवजाति एक बड़ी कोरोना वायरस महामारी के कहर से जूझ रही है और दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, असंतुलित पर्यावरण जैसी चिंताओं से रू-ब-रू है। पर्यावरण को समर्पित यह खास दिन हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने एवं उसके प्रति संवेदनशील होने के लिए प्रेरित करता है, ताकि हम कोरोना जैसे महासंकट से मुक्ति पा जाये एवं भविष्य में हमारी पर्यावरण जागृति से ऐसा संकट दूबारा न आये। विश्व पर्यावरण दिवस 1974 से ही मनाया जाता है, जब संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार इसकी घोषणा की थी।

पर्यावरण के निरंतर बदलते स्वरूप ने निःसंदेह बढ़ते दुष्परिणामों पर सोचने पर मजबूर किया है। औद्योगिक गैसों के लगातार बढ़ते उत्सर्जन और वन आवरण में तेजी से हो रही कमी के कारण ओजोन गैस की परत का क्षरण हो रहा है। इस अस्वाभाविक बदलाव का प्रभाव वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तनों के रूप में दिखलाई पड़ता है। सार्वभौमिक तापमान में लगातार होती इस वृद्धि के कारण विश्व के ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगे हैं। ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के कारण महासागर में जलस्तर में ऐसी ही बढ़ोतरी होती रही तो महासागरों का बढ़ता हुआ क्षेत्रफल और जलस्तर एक दिन तटवर्ती स्थल, भागों और द्वीपों को जलमग्न कर देगा। ये स्थितियां भारत में हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने से एक बड़े संकट का कारण बन रही है।

ग्लेशियर का पिघलना सदियों से जारी है, लेकिन पर्यावरण पर हो रहे विभिन्न हमलों के कारण इनका दायरा हर साल बढ़ रहा है। खूब बारिश और बर्फबारी से ग्लेशियर लगातार बर्फ से ढ़के रहते थे। मौसम ठंडा होने की वजह से ऊपरी इलाकों में बारिश की बजाय बर्फबारी होती थी। लेकिन 1930 के आते-आते मौसम बदला और बर्फबारी में कमी आने लगी। असर ग्लेशियर पर भी पड़ा। ये बढ़ने की बजाय पहले स्थिर हुए, फिर पिघलते ग्लेशियरों का दायरा बढ़ने लगा। गंगोत्री ग्लेशियर पिछले दो दशक में हर साल पांच से बीस मीटर की गति से पिघल रहा है। उत्तराखंड के पांच अन्य प्रमुख ग्लेशियर सतोपंथ, मिलाम, नीति, नंदा देवी और चोराबाड़ी भी लगभग इसी गति से पिघल रहे हैं। भारतीय हिमालय में कुल 9,975 ग्लेशियर हैं। इनमें से 900 ग्लेशियर सिर्फ उत्तराखंड हिमालय में हैं। इन ग्लेशियरों से 150 से अधिक नदियां निकलती हैं, जो देश की 40 प्रतिशत आबादी को जीवन दे रही हैं। अब इसी बड़ी आबादी के आगे संकट है। हाल के दिनों में हिमालयी राज्यों में जंगलों में आग की जो घटनाएं घटीं, वे ग्लेशियरों के लिए नया खतरा हैं। वनों में आग तो पहले भी लगती रही हैं, पर ऐसी भयानक आग काफी खतरनाक है। आग के धुएं से ग्लेशियर के ऊपर जमी कच्ची बर्फ तेजी से पिघलने लगी हैं। इसके व्यापक दुष्परिणाम होंगे। काला धुआं कार्बन के रूप में ग्लेशियरों पर जम जाएगा, जो भविष्य में उस पर नई बर्फ को टिकने नहीं देगा।

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पूरी दुनिया में ग्लेशियरों के पिघलने की घटनाओं पर व्यापक शोध एवं अनुसंधान हो रहे हैं, लेकिन भारतीय ग्लेशियरों के पिघलने की स्थितियों पर न अध्ययन हो रहा है, न ही उसको नियंत्रित करने के कोई उपाय होते हुए दिखाई दे रहे हैं।  इन गंभीर होती स्थितियों पर काम करने वाले कुछ पर्यावरण संरक्षकों ने देश के लिए ग्लोबल वार्मिंग के खतरों के संकेत देने शुरू कर दिए हैं। साथ ही यह सवाल भी खड़ा किया है कि भारत इसका मुकाबला कैसे करेगा? भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के उपग्रह इमेजरी से हुए एक ताजा अध्ययन में 466 ग्लेशियरों के आंकड़ें जमा किए हैं, जिनसे पता चलता है कि 1962 से 2001 तक इनका आकार बीस फीसदी तक कम हुआ है। कई बड़े ग्लेशियर छोटे टुकडों में टूट गए हैं और सब तेजी से पिघल रहे हैं। इस इलाके के सबसे बड़े ग्लेशियरों में से एक पार्वती के अध्ययन में पाया गया है कि हर साल 170 फीट की रफ्तार से पिघल रहे हैं।

हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से दुनिया खासी चिंतित हैं, खासतौर पर भारत और पड़ोसी देशों पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभाव को लेकर। हिमाचल में, जिन्हें दक्षिण एशिया की जल आपूर्ति का सेविंग अकाउंट माना जाता है। ये उन दर्जनों नदियों को जलमग्न बनाते हैं, जो करोड़ों लोगों का जीवन संवारती है, उनके जीने का आधार है। इसके तेजी से पिघलने का अर्थ है पीने के पानी की कमी और कृषि उत्पादन पर मंडराता खतरा, साथ ही बाढ़ और बीमारियों जैसी समस्याएं हैं।

दुनिया भर में ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग के बैरोमीटर माने जाते हैं। ग्रीन हाउस गैसों के असर से पूरी दुनिया के साथ ही हिमालय भी गरम हुआ है। हाल में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि उत्तर पश्चिमी हिमलाय के औसत तापमान में पिछले दो दशक में 2.2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। यह आंकड़ा उसके पहले के सौ साल में हुई बढ़ोतरी से कहीं ज्यादा है। अध्ययन में यह भी अनुमान लगाया गया है कि जैसे-जैसे ये ग्लेशियर पिघलेंगे, बाढ़ की विभीषका भी बढ़ेगी, प्राकृतिक आपदाएं घटित होंगी और उसके बाद नदियां सूखने लगेंगी। इसका दोष दुनिया के औद्योगिकीकरण एवं सुविधावादी जीवनशैली जिनमें बढ़ते वाहन एवं वातानुकूलित साधनों के विस्तार को ही दिया जा सकता है, जिनसे ऐसी गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, जो ओजोन के साथ-साथ ग्लेशियरों के लिये खतरनाक है, उन पर पाबंदी लगाने में हम नाकाम हो रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग को रोकना तो सीधे तौर पर हमारे बस में नहीं है, लेकिन हम ग्लेशियर क्षेत्र में तेजी से बढ़ती मानवीय गतिविधियों को रोककर ग्लेशियरों पर बढ़ते प्रदूषण के प्रभाव को कम कर सकते हैं। इस दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस पर व्यापक चिन्तन-मंथन होना चाहिए।

- ललित गर्ग

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