बदले हुए समय में भगवान (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jun 20, 2026

इंसान ने समय बदल दिया है। उसकी नैसर्गिक बुद्धि ने, अपनी ही खुराफातों और गुस्ताखियों से बचने के लिए नकली बुद्धि का निर्माण किया। इधर नकली बुद्धि ने उसकी ही नाक में दम कर दिया है और उधर धार्मिक होते जा रहे इंसान से भगवान परेशान हो गए हैं। इंसान ने भगवान को बहुत पहले से ही नकदी, सोना, चांदी और ज़मीन देकर अपने जैसा कर लिया था। अब उन्हें अपनी महाबदमाशियों में शामिल करना शुरू कर दिया है। भगवान को अपने व्यवसाय में स्लीपिंग पार्टनर बना लिया है। उन्हें खुश रखने के लिए धार्मिक कार्य और आयोजन किए जाते हैं जिनमें उनका सार्वजनिक आशीर्वाद प्राप्त कर लिया जाता है।   

वास्तव में बाज़ार में खड़े इंसान ने भगवान् को अपना हेराफेरी पार्टनर बना दिया है। जब समझदार इंसान धंधा कर रहा होता है, लालच उसे लुभाने लगता है और वह दूसरों द्वारा भगवान् के नाम पर संचित की गई संपत्ति में से भी हिस्सा ऐंठने लगता है। बहुत पुरानी प्रेरक और सफल कहावत है, ‘भगवान् नाम जपना, पराया माल अपना’। इस मामले में खुद को सुरक्षित रख, हेराफेरी करने वाले ज्यादा समझदार लोग भगवान् से आग्रह करने लगे हैं कि वे अपनी संपत्ति, नकदी और जेवर का ध्यान स्वयं रखें। भगवान तो हर जगह उपस्थित हैं, सर्वशक्तिमान हैं। जिन्हें संसार का मालिक माना जाता है, जिनकी मर्जी के बिना एक पत्ता ज़रा सा भी नहीं हिल सकता तो फिर किसी डाकू या चोर इंसान की क्या औकात और हिम्मत कि उनकी दौलत में सेंध लगा ले और सफलता से चुरा भी ले। ऐसा होता है तो फिर ऐसे में आम लोगों की संपत्ति की रक्षा कैसे हो सकती है। वह बात अलग है कि उनका निवास बनवाने के लिए उनके प्रिय अनुयायी इंसान, न्यायालय में कई दशक तक कानूनी जंग लड़ते हैं, तब कहीं जाकर उनके निवास का निर्माण हो सकता है। दुनिया के अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली की स्थिति कितनी असहाय है।

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भगवान के सक्रिय न होने पर कुछ इंसान कहते हैं कि भगवान् बाहर नहीं है वह तो इंसान के मन के भीतर हैं यानी इंसान दवारा बनाई महंगी, विशाल और सुन्दर ईमारतों में भगवान् नहीं है। इंसान ने जो उनके नाम पे किया वास्तव में अपने लिए किया। ऐसी हरकतें देखकर तो उनका अपने भक्तों पर से विशवास भी डगमगा कर उठ गया होगा। सवाल यह है कि क्या इंसान नाम का प्राणी उनके विशवास लायक है। वह तो हर क्षण अपनी स्वार्थपरता, लालची और धोखा प्रवृति के प्रमाण देता रहता है। यह सब भी तो मानवीय प्रवृतियां हैं और हर युग के चरित्रों में विद्यमान रही है चाहे त्रेता हो या द्वापर। अब महाघोर कलयुग चल रहा है, जिसका आधार कार्ड बताता है कि पहले शातिर इंसान, भगवान् के नाम का धार्मिक चोगा धारण कर सामान्य दूसरों को रिझाएगा, फुसलाएगा, ठगेगा और फिर भगवान् के सहारे इक्कट्ठा किए धन दौलत को अपना माल बना लेगा। उधर ऊंचे, खूबसूरत मंच पर राजनीति अर्धनग्न नृत्य करती रहेगी। वह नाच किस किस को कैसे नचा रहा होगा यह लिखने  की नहीं समझने की बात है।  

असली भगवान किसी भी तरह के कुकृत्यों को कदापि पसंद नहीं करेंगे। इसलिए मूर्ख इंसान को सांसारिक मामलों में समझाना भी बंद कर देंगे। अपना समय मधुर संगीत और मनपसंद पेय और स्वास्थ्य रक्षक भोजन करने में व्यतीत करेंगे।

- संतोष उत्सुक

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