सुशासन दिवस की औपचारिकताएं तो पूरी हो गईं, लेकिन इसके उद्देश्य आखिर कब तक पूरे होंगे?

By कमलेश पांडे | Dec 25, 2022

भले ही भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की जयंती हरेक 25 दिसम्बर को सुशासन दिवस के रूप में मनाई जा रही हो, लेकिन देश-प्रदेश से निरन्तर जो आपराधिक घटनाएं और निजी व सार्वजनिक क्षेत्रों में तरह-तरह के घपले-घोटालों की खबरें सामने आ रही हैं, वह सुशासन यानी गुड गवर्नेंस को मुंह चिढ़ाती हुई प्रतीत हो रही हैं। 

शायद इसलिए भी कि वह भी भ्रष्टाचार का एक 'हिस्सेदार' बन चुकी है, अन्यथा इतनी विपरीत स्थिति कतई पैदा नहीं होती। यह बात मैं नहीं बल्कि भारतीय जनमानस बोल रहा है, जिसे मैं अनुभूत सत्य जानकर, सुनकर व समझकर यहां अभिव्यक्त कर रहा हूँ। 

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सच कहूं तो प्रथम दृष्टया सुशासन से तात्पर्य है किसी सामाजिक-राजनीतिक ईकाई, जैसे- नगर निगम, राज्य सरकार आदि से, जिसको इस प्रकार से चलाना है कि वह वांछित परिणाम दे पाए। मसलन, सुशासन के अन्तर्गत बहुत सी चीजें आतीं हैं जिनमें अच्छा बजट, सही प्रबन्धन, कानून का शासन, सदाचार इत्यादि भी शामिल है। इसके विपरीत राजकाज में पारदर्शिता की कमी या सम्पूर्ण अभाव, जंगल राज, लोगों की कम भागीदारी और भ्रष्टाचार का बोलबाला आदि दुःशासन के लक्षण हैं।

जहां तक सुशासन के शाब्दिक अर्थ का सवाल है तो यह बता दें कि 'शासन' शब्द में 'सु' उपसर्ग लग जाने से 'सुशासन' शब्द का जन्म होता है। ’सु’ उपसर्ग का अर्थ शुभ, अच्छा, मंगलकारी आदि भावों को व्यक्त करने वाला होता है। इसी तरह से राजनीतिक और सामाजिक जीवन की भाषा में सुशासन की तरह लगने वाले कुछ और बहुप्रचलित और घिसे-पिटे शब्द प्रचलन में हैं, जैसे- प्रशासन, स्वशासन, अनुशासन आदि। लगभग इन सभी शब्दों का संबंध शासन से है।

देखा जाए तो ’शासन’ आदिमयुग की कबीलाई संस्कृति से लेकर आज तक की आधुनिक मानव सभ्यता के विकासक्रम में अलग-अलग विशिष्ट रूपों में प्रणाली के तौर पर विकसित और स्थापित होती आई है। इस विकास क्रम में परंपराओं से अर्जित ज्ञान और लोककल्याण की भावनाओं की अवधारणा भी प्रबल प्रेरक की भूमिका में रही है। इस अर्थ में शासन की सभी प्रणालियाँ कृत्रिम हैं। 

इस प्रकार हम कह सकते है कि सुशासन व्यक्ति को भ्रष्टाचार एवं लालफीताशाही से मुक्त कर प्रशासन को स्मार्ट बनाता है। यहां पर स्मार्ट शब्द का विन्यास विशेष तौर पर किया गया है, जहां पर एस से सिम्पल यानी साधारण, एम से मोरल यानी नैतिक, ए से एकॉउंटेबल यानी उत्तरदायी, आर से रेस्पोंसिबल यानी जिम्मेदारीयोग्य और टी से ट्रांसपेरेंट यानी पारदर्शी से है। कहने का तातपर्य यह है कि सुशासन में उपर्युक्त सभी तत्व मौजूद होने चाहिए।

आपको पता होना चाहिए कि सुशासन के कुछ प्रमुख तत्त्व भी होते हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ के अनुसार सुशासन की आठ विशेषताएँ होती हैं, जिनमें विधि का शासन, समानता एवं समावेशन, भागीदारी, अनुक्रियता, बहुमत/मतैक्य, प्रभावशीलता दक्षता, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और निष्पक्ष आकलन प्रमुख हैं। भारत सरकार ने भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन को जब सुशासन दिवस के रूप में घोषित की थी, तो उसने भी बहुत-से उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये कुछ महत्वपूर्ण दृष्टिकोण घोषित किये थे, जो इस प्रकार से है:- 

पहला, सरकारी प्रक्रिया को व्यावहारिक बनाकर देश में एक "खुला और जवाबदेह प्रशासन" प्रदान किया जाएगा। दूसरा, देश में एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन मुहैया कराने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता के बारे में लोगों को जागरूक बनाया जाएगा। तीसरा, भारत में आम नागरिकों के कल्याण और भलाई को बढ़ाने के लिए इस समर्पित दिवस का उपयोग किया जाएगा। चतुर्थ, सरकार के कामकाज के मानकीकरण के साथ-साथ यह भारतीय लोगों के लिए एक अत्यधिक प्रभावी और जवाबदेह शासन के लिए इस दिन का उपयोग किया जायेगा। 

पंचम, भारत में सुशासन के एक मिशन को पूरा करने के लिए अच्छी और प्रभावी नीतियों को लागू करने के लिए इस दिन का उपयोग किया जायेगा। षष्टम, सरकारी अधिकारियों को आंतरिक प्रक्रियाओं और उनके काम के लिये प्रतिबद्ध करने के लिये इस दिन का उपयोग किया जाएगा। सप्तम, सुशासन के माध्यम से देश में वृद्धि और विकास को बढ़ाने के लिए इस दिन का सदुपयोग होगा। अष्टम, नागरिकों को सरकार के करीब लाकर सुशासन की प्रक्रिया में उन्हें सक्रिय भागीदार बनाने के लिए इस दिन का सदुपयोग किया जाएगा। 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सिद्धांत के तौर पर उपर्युक्त बातें अक्षरशः सत्य हैं। इन्हें व्यवहारिक अमलीजामा पहनाने के लिए विगत 8-9 वर्षों से केंद्र सरकार भी प्रयत्नशील है। लेकिन इस सपने को पूरी तरह से साकार करने के लिए सरकार को और अधिक अथक परिश्रम करने होंगे, जो दिखाई तो दे रहे हैं, लेकिन उपलब्धियां नगण्य हैं।

उल्लेखनीय है कि सरकार में जवाबदेही सुनिश्चित करने के वास्ते और भारतीय लोगों के बीच जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए ही प्रधानमंत्री वाजपेयी को सम्मानित करते हुए  वर्ष 2014 में सुशासन दिवस की स्थापना की गई थी। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा 23 दिसंबर 2014 को, नब्बे वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय (मरणोपरांत) को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न के लिए भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार के प्राप्तकर्ता के रूप में घोषित किया गया था। 

इस घोषणा के बाद नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासन ने इसकी स्थापना करते हुए कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेयी की जयंती को भारत में प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसी कड़ी में 19-25 दिसंबर तक "सुशासन सप्ताह" मनाने की भी घोषणा की गई। इस साल भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर पूरे देश में 19-25 दिसंबर, 2022 तक "सुशासन सप्ताह" मनाया गया। इस वर्ष भी 'प्रशासन गांव की ओर' अभियान सुशासन सप्ताह का हिस्सा बना हुआ है।

बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन को सुशासन दिवस के रूप में मनाना आम भारतीय लोगों के लिये बहुत सम्मान की बात है। वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर सुशासन दिवस की पहली घोषणा भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा की गई थी। तब सुशासन दिवस की घोषणा "ई-गवर्नेंस के माध्यम से सुशासन” के आधार पर की गयी है। यह एक कार्यक्रम है जो सभी सरकारी अधिकारियों को बैठक और संचार के लिये आमंत्रित करके बाद में मुख्य समारोह में शामिल होकर मनाया जाता है।

मसलन, यहाँ एक दिन की लंबी प्रदर्शनी का आयोजन करके और सरकारी अधिकारियों को भाग लेने के साथ ही ई-गवर्नेंस और प्रदर्शनी के बारे में कुछ सुझाव देने के लिये आमंत्रित करके मनाया जाता है। संयोग से भारत में सुशासन दिवस की घोषणा 25 दिसम्बर क्रिसमस उत्सव (एक राजपत्रित अवकाश) से मेल खाती है, हालांकि सुशासन दिवस पर पूरे दिन काम करने की घोषणा की गयी है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के 90वें जन्मदिन पर ये घोषणा की गयी थी।

# जानिए, कैसे मनाते हैं सुशासन दिवस और कौन से छात्र कैसे कर सकते हैं इसमें शिरकत

राजग सरकार के भाजपाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती पर हर साल 25 दिसंबर को 'सुशासन दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की है। इस मौके पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) द्वारा सरकारी कार्यालयों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य शिक्षण संस्थानों को विभिन्न गतिविधियों का आयोजन करके इसे मनाने का संदेश भेजा गया। जिसके बाद से स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थी कई गतिविधियों में भाग लेते हैं, जैसे: निबंध लेखन प्रतियोगिता, वाद-विवाद, समूह चर्चा, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता, खेल आदि। वहीं, विद्यार्थीयों की सुगमता के लिए प्रतियोगिताओं की ऑनलाइन व्यवस्था भी की गयी है, जैसे: ऑनलाइन निबंध लेखन, ऑनलाइन प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता, आदि। 

इस मौके पर ये भी घोषणा की गयी कि के दो दिन यानी 25-26 दिसम्बर को चलने वाले समारोह के दौरान सभी विद्यार्थी अपने अपने स्कूल, कॉलेज व संस्थानों की गतिविधियों में भाग ले सकते हैं। वहीं, इस बात की भी पुष्टि की गयी कि 25 दिसम्बर को ऑनलाइन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जायेगा, जबकि इसके लिए तो विद्यालयों का खुलना आवश्यक नहीं है। विद्यार्थी चाहे तो प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं और नहीं भी, क्योंकि ऑंनलाइन प्रतियोगिता स्वैच्छिक है। ये विद्यार्थीयों को प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिये बाध्य करने का समारोह नहीं है। विद्यार्थीयों का भाग लेना या न लेना, उनकी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। छात्र अपने घरों या अन्य स्थानों से जहां वो इंटरनेट प्रयोग कर सकते हैं, वहां से भी इन प्रतियोगिताओं में भाग ले सकते हैं।

# जानिए सुशासन दिवस पर दिलाई जाने वाली शपथ में क्या-क्या बोला जाता है?

सुशासन दिवस पर कर्मचारियों को एक कार्यक्रम आयोजित करके शपथ भी दिलवाई जाती है। वह शपथ इस प्रकार है : - " मैं सत्यनिष्ठा से शपथ लेता/लेती हूँ कि मैं प्रदेश में सुशासन के उच्चत्तम मापदंडों को स्थापित करने के लिए सदैव संकल्पित रहूंगा/रहूंगी और शासन को अधिक पारदर्शी, सहभागी, जनकल्याण केंद्रित तथा जवाबदेह बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करता/करती रहूंगा/रहूंगी। प्रदेश के नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लक्ष्य को पाने के लिए सदैव तत्पर रहूंगा/रहूंगी।" जय हिंद, जय भारत।

जब आप उपर्युक्त बातों पर नजर दौड़ाएंगे तो यह सवाल आपके मन में जरूर उठेगा कि हमारे संविधान में, हमारे जनसरोकार में, सभी आदर्श बातें समाहित हैं। लेकिन बिहार में जहरीली शराब पीने से दर्जनों लोग काल के गाल में समा जाते हैं और हम हैं कि सियासी व प्रशासनिक थेथरई से बाज नहीं आते। वहीं, जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कह रहे हैं कि अगले दो साल में नशा के तस्करों की रीढ़ तोड़ देंगे तो यह सवाल सहज ही उठ जाता है कि आखिर में 75 साल तक भारतीय प्रशासन क्यों इसकी अनदेखी करता रहा! 

देश के विभिन्न हिस्सों में हो रही लूट-मार की घटनाएं व ताबड़तोड़ हत्याएं और उन्हें रोकने में असहाय पुलिस यह जतलाती है कि पिछले साढ़े सात दशकों तक हमने कानूनी अठखेलियाँ खेली हैं, लेकिन आम भारतीयों को पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पाए। इसी तरह से डिजिटल धोखाधड़ी की घटनाएं आम आदमी को आर्थिक रूप से पंगु बनाती जा रही हैं।

मेरा मानना है कि जीवन निर्वाह और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा होगा, जो लोकल रँगबाजों, अंतरराज्यीय गिरोहों और अंतरराष्ट्रीय तस्करों के गुप्त गठजोड़ से प्रभावित नहीं हो। हमारी सबसे पहली जरूरत इनकी कमर तोड़कर आमलोगों के हित को सुरक्षित करने की है। लेकिन जिस तरह से सफेदपोश राजनेताओं का संरक्षण हासिल है और प्रशासन जानबूझकर तक तमाशबीन बना रहता है, उसके मद्देनजर तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि सुशासन दिवस की औपचारिकता पूरी होने के साथ साथ इसके ठोस परिणाम भी नजर आने चाहिए, जो बीते 8 साल में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं। यदि यही हाल रहा तो सुलगता जनमानस कभी भी दावानल बनकर विस्फोटक रूप अख्तियार कर सकता है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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