न्यूज एंकरों पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी को गंभीरता से ले सरकार

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Sep 24, 2022

हमारे टीवी चैनलों की दशा कैसी है, इसका पता सर्वोच्च न्यायालय में आजकल चल रही बहस से चल रहा है। अदालत ने सरकार से मांग की है कि टीवी चैनलों पर घृणा फैलाने वाले बयानों को रोकने के लिए उसे सख्त कानून बनाने चाहिए। पढ़े हुए शब्दों से ज्यादा असर, सुने हुए शब्दों का होता है। टीवी चैनलों पर उड़ेली जाने वाली नफरत, बेइज्जती और अश्लीलता करोड़ों लोगों को तत्काल प्रभावित करती है।

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एक-दो चैनल अपवाद हैं लेकिन ज्यादातर चैनल चाहते हैं कि उनके वक्ता एक-दूसरे पर चीखे-चिल्लाएं और दर्शक लोग उन चैनलों से चिपके रहें। हमारे चैनलों पर आजकल न तो विशेषज्ञों को बुलाया जाता है और न ही निष्पक्ष बुद्धिजीवियों को! पार्टी-प्रवक्ताओं को बुलाकर चैनलों के मालिक अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे रहते हैं। इसीलिए हमारे टीवी चैनलों को, जैसे अमेरिका में पहले कहा जाता था, ‘इडियट बॉक्स’ याने ‘मूरख बक्सा’ कहा जाने लगा है।

भारत के विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि भारतीय दंड संहिता में एक नई धारा जोड़कर ऐसे लोगों को दंडित किया जाना चाहिए, जो टीवी चैनलों से घृणा, अश्लीलता, अपराध, फूहड़पन और सांप्रदायिकता फैलाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय और विधि आयोग की यह चिंता और सलाह ध्यान देने योग्य है लेकिन उस पर ठीक ढंग से अमल होना लगभग असंभव है। टीवी पर बोला गया कौन-सा शब्द उचित है या अनुचित, यह तय करना अदालत के लिए आसान नहीं है और अत्यंत समयसाध्य है। कोई कानून बने तो अच्छा ही है लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि टीवी चैनल खुद ही आत्म-संयम का परिचय दें।

पढ़े-लिखे और गंभीर लोगों को ही एंकर बनाया जाए। उन्हीं लोगों को बहस के लिए बुलाएं, जो विषय के जानकार और निष्पक्ष हों। पार्टी-प्रवक्ताओं के दंगलों से बाज आएं। यदि उन्हें बुलाया जाए तो उनके बयानों को पहले रिकार्ड और संपादित किया जाएं। एंकरों को सवाल पूछने का अधिकार हो लेकिन अपनी राय थोपने का नहीं। हमारे टीवी चैनल भारतीय लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। यदि इनकी हालत जैसी है, वैसी ही रही तो हमारा लोकतंत्र खोखला भी हो सकता है।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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