संगत-पंगत की अलौकिक परंपरा के संस्थापक श्री गुरू अंगद देव जी

By सुखी भारती | May 12, 2021

श्री गुरू अंगद देव जी का जन्म 31 मार्च 1504 को मत्ते की सराय (मुक्तसर) में हुआ। आप जी के पिता जी का नाम फेरू मल था। माता-पिता ने अपने घर आए बालक का नाम लहणा रखा। आप के पिता जी एक शाहूकार थे। इलाके में उनका अच्छा रसूख था। भाई लहणा जी बचपन से ही भक्ति भावों से ओतप्रोत थे। आप जी के मस्तक की आभा बताती थी, कि संसार में आपका आगमन किसी खास उद्देश्य से हुआ है। आपको बचपन में ही भक्ति भाव की घुंटी प्राप्त हो गई थी। क्योंकि आप के पिता जी माता दुर्गा के उपासक थे। वह हर साल संगत के जत्थे लेकर ज्वाला जी के दर्शनों को जाया करते थे। आप भी बचपन से संगत के साथ माता रानी के दर्शन करने जाया करते थे। आपके पिता जी ने आपका विवाह गाँव संघर (नजदीक खडूर साहिब) में बीबी खीवी जी से कर दिया।

दूसरे दिन ही भाई लहणा जी जत्थे से आज्ञा प्राप्त कर व घोड़े पर सवार होकर करतारपुर की ओर चल पड़े। और वहाँ पहुँचने पर उन्हें समझ नहीं आ रहा थ कि वे गुरू नानक देव जी के दरबार तक कैसे जाएँ? थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्हें रास्ते में एक वृद्ध आते दिखाई दिए। भाई लहणा उनसे कहने लगे, पिता जी! मुझे श्री गुरू नानक देव जी के दरबार में जाना है। क्या आप मुझे उनके दरबार का पता दे सकते हैं? वृद्ध व्यक्ति ने कहा कि हे भले मानुष! मैं उधर ही जा रहा हूँ और आपको वहाँ तक छोड़ दूँगा। यह कहकर वह वृद्ध उनके आगे-आगे चल पड़े। भाई लहणा जी घोड़े पर ही सवार रहे। एक खुले प्रांगण वाले घर के आगे पहुँचने के पश्चात् वह वृद्ध कहने लगे कि आप अपना घोड़ा यहाँ बांध दें और भीतर चले जाएँ। श्री गुरू नानक देव जी शायद सिंघासन पर ही विराजित होंगे। भाई लहणा जी दरबार में दाखिल हुए तो सिंघासन पर बिराजमान एक अलौकिक हस्ती को आसीन देखा तो उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि सिंघासन पर वही वृद्ध सुशोभित थे, जो उन्हें यहाँ तक लेकर आए थे। भाई लहणा जी ने आगे बढ़कर श्री गुरू नानक देव जी के चरणों में डंडवत वंदन किया। उनके नेत्रें से पश्चाताप के अश्रु बह रहे थे। उनकी जिह्ना से शब्द नहीं फूट रहे थे। उन्होंने अपनी संपूर्ण शक्ति एकत्र करते हुए कहा-हे सच्चे पातशाह! हे इलाही नूर! मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया है। मैं मूढ बुद्धि आप के समक्ष घोड़े पर सवार रहा और आप पैदल चलते रहे। मेरी गलती क्षमा के योग्य नहीं है। आप मुझे सजा दें। श्री गुरू नानक देव जी उनकी बातें सुनकर मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा-हे महापुरुष! आपका नाम क्या है? भाई लहणा जी ने झेंपते हुए कहा-मेरा नाम लहणा है, मैं संघर गाँव से आया हूँ। श्री गुरू नानक देव जी ने मुस्कुराते हुए कहा-‘वाह भाई! तू लैणा (लेना) है एवं हमने देना है। अपना लेना आप ही लैण (लेने) आ गया। आप बिलकुल भी पश्चाताप न करें! आपने कोई गुनाह नहीं किया।’ 

इसे भी पढ़ें: श्री गुरु तेग बहादुर जी: एक ऐसी हस्ती जिनकी दरकार हर एक युग को रहती है

भाई लहणा ने गुरू घर का मुरीद होने की ठान ली थी। गुरूदेव से आज्ञा लेकर वह अपने गाँव वापिस आ गए। कुछ दिनों में कारोबार के बारे में अपने पुत्रें को समझाकर, वे वापिस करतारपुर आ गए। जब वे दरबार में आए तो उन्हें पता चला कि गुरू साहिब जी खेतों की ओर गए हैं, तो वे भी गुरू जी के दर्शन प्राप्त करने के लिए उधर ही चल दिए। खेतों में श्री गुरू नानक देव जी ने घास की पोटली बांध कर रखी हुई थी। बारिश के कारण वह घास गीली हो गई थी। मिट्टी से सनी घास की पोटली उन्होंने भाई लहणा जी के सिर पर रख दी। भाई लहणा जी ने रेशमी वस्त्र पहने हुए थे। चीकड़ के छीटों ने उनके वस्त्रें को खराब कर दिया। घर पहुँचने पर माता सुलक्षणी जी गुरू नानक देव जी से कहने लगीं कि ये आपने क्या कर दिया? इस गभरू (नवयुवक) के सारे कपड़ों को खराब कर दिया। गुरू साहिब मुस्कुराते हुए कहने लगे-‘गभरू के वस्त्रें पर कीचड़ नहीं, केसर का छिड़काव किया है।’ 

दिन गुजरते जा रहे थे, लहणा जी भक्ति के अनेकों पड़ावों को पार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। वे दिन-रात सेवा में ही जुड़े रहते। गुरू घर में झाडू लगाना, पंखा झुलाना, खेतों का काम, मवेशियों के चारा डालना, संगत के जोड़े साफ करने, उन्हें लंगर-पानी देना व योग ध्यान करना, यही उनका नित्य नियम बन चुका था। इस प्रकार सेवा करते-करते उन्हें 7 साल बीत गए। गुरू जी ने उनकी अनेकों बार परीक्षा ली। वे प्रत्येक परीक्षा से उतीर्ण हुए। फिर चाहे गंदगी भरे नाले से कटोरा निकालना हो, बरसात के दिनों में धर्मशाला की दीवार बनाना हो या फिर रात को रावी दरिया से कपड़े धो कर लाना हो।

उन्होंने गुरू जी के मुखारविंद से निकले हर एक वचन को हृदयस्थ किया। भाई लहणा जी की सेवा से प्रसन्न होकर एक दिन गुरू जी ने उन्हें अपने गले लगा लिया, एवं कहा-अब मेरे और आपके बीच कोई अंतर नहीं रहा, तू लहणा नहीं अंगद है, मेरे ही शरीर का अंग। श्री गुरू नानक देव जी ने 1539 ई- में भाई लहणा जी का नाम गुरू अंगद देव रखकर उन्हें गुरियाई सौंप दी। ऐसे लग रहा था कि गुरू नानक देव जी ने उन्हें गुरू बनाकर अपना ही रूप दुबारा प्रगट कर लिया हो-

प्यार की भट्ठी में तपा कर, उन्हें कुंदन किया।

लहणे से अंगद बना, अंगद से अल्लाह कर दिया।।

श्री गुरू अंगद देव जी महाराज जी ने जाति-पाति को खत्म कर संगत-पंगत की रीति चलाई। जिसमें हर जाति, वर्ग का व्यक्ति पंगत (कतार) में बैठकर लंगर छकता था। गुरू साहिब ने खडूर साहिब में अखाड़ों की शुरूआत की। आप गुरमुखी लिपि में भी सुधार लाए। सब विद्या हासिल कर सके इसके लिए आप ने पाठशालाओं का निर्माण करवाया। आप जी की बाणी के 63 श्लोक भी श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी में अंकित हैं। इस प्रकार लोगों को सच्चाई के रास्ते पर चलाते हुए, दुखियों के दुःख दूर करते हुए अहंकारियों के अहंकार का नाश करते हुए व प्रभु भक्तो के भक्ति के रंग में रंगते हुए आप 1552 ई- को श्री गुरू अमरदास जी को गुरू गद्दी देकर ज्योति ज्योत समा गए। आपकी सेवा, समर्पण व संगत-पंगत की रीति सदैव चलती रहेगी।

- सुखी भारती

प्रमुख खबरें

US Iran Peace Talks: अमेरिका में रह रहे ईरानी मूल के लोगों पर कार्रवाई - ट्रंप प्रशासन ने ग्रीन कार्ड छीने

Hormuz जलडमरूमध्य में US Navy का एक्शन, Trump बोले- दुनिया के लिए हम कर रहे हैं रास्ता साफ

Land for Jobs Scam: लालू यादव ने Delhi High Court को दी चुनौती, अब Supreme Court में होगी सुनवाई

इस्लामाबाद मीटिंग के बाद चीन का बड़ा खेल, तेहरान में सैकड़ों टन बम और मिसाइल!