Guru Gobind Singhji Jayanti 2025: हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षक थे गुरु गोविन्द सिंह

By ललित गर्ग | Dec 27, 2025

भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में गुरु गोविंद सिंह जी का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी है। वे केवल सिख धर्म के दसवें गुरु ही नहीं थे, बल्कि एक महान योद्धा, दार्शनिक, समाज-सुधारक, हिन्दू धर्म-संस्कृति के रक्षक और राष्ट्र-चेतना के जाग्रत प्रतीक थे। उनकी महान् तपस्वी, महान् कवि, महान् योद्धा, महान् संत सिपाही साहिब आदि स्वरूपों में पहचान होती है। गुरु गोविंद सिंह की जयंती केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि मानवता को साहस, न्याय, आत्मसम्मान और धर्मरक्षा का संदेश देने वाला पर्व है। उनकी जीवन-यात्रा अन्याय के प्रतिकार, सत्य की स्थापना और मानव गरिमा की रक्षा के लिए समर्पित रही। वे संपूर्ण भारतीय समाज के आस्था के केंद्र हैं, उनके जीवन से हमें राष्ट्रप्रेम और मानवतावादी धर्म की प्रेरणा मिलती है। 

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1699 में बैसाखी के पावन अवसर पर गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर इतिहास की दिशा ही बदल दी। खालसा का अर्थ है-शुद्ध, निर्भीक और समर्पित जीवन। उन्होंने पाँच प्यारे बनाकर समानता, भाईचारे और त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। खालसा की दीक्षा के माध्यम से उन्होंने जाति, वर्ग और ऊँच-नीच के भेद को समाप्त कर दिया। उन्होंने खालसा पंथ के अनुयायियों को पंच ककार केश, कड़ा, कंघा, कृपाण, कच्छा धारण करने का निर्देश दिया। ये शौर्य, शुचिता तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के संकल्प के प्रतीक हैं। गुरु ने सिखाया कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं और सबका सम्मान समान है। गुरु गोविंद सिंह की शिक्षाओं का केंद्रबिंदु साहस और करुणा का संतुलन है। वे एक ओर शस्त्र धारण करने की प्रेरणा देते हैं, तो दूसरी ओर दया, प्रेम और सेवा को जीवन का आधार बताते हैं। उनका प्रसिद्ध कथन-“जब सब उपाय विफल हो जाएँ, तब धर्म के लिए तलवार उठाना न्यायोचित है”-यह स्पष्ट करता है कि हिंसा उनका उद्देश्य नहीं थी, बल्कि अत्याचार के विरुद्ध अंतिम विकल्प थी। 

गुरु गोविंद सिंह भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा और समाज को नए सिरे से संगठित एवं सशक्त करने वाले एक महापुरुष हैं, उनका व्यक्तित्व अलौकिक, साहसी एवं भारतीयता से ओतप्रोत था। उन्होंने आनंदपुर का सुख, माता पिता की छांव और बच्चों का मोह छोड़कर धर्म रक्षा का मार्ग चुना। उन्होंने दमन, अन्याय, अधर्म के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद 11 नवंबर 1675 को नौ साल की उम्र में गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें गुरु बने। दुनिया में देश व धर्म की रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले महापुरुष तो अनेक मिलेंगे किन्तु अपनी तीन पीढ़ियों, बल्कि यों कहें कि अपने पूरे वंश को इस पुनीत कार्य हेतु बलिदान करने वाले विश्व में शायद एकमेव महापुरुष गुरु गोविन्द सिंहजी ही है। जिन्होंने त्याग, बलिदान एवं कर्तृत्ववाद का संदेश दिया। भाग्य की रेखाएं स्वयं निर्मित की। स्वयं की अनन्त शक्तियों पर भरोसा और आस्था जागृत की। सभ्यता और संस्कृति के प्रतीकपुरुष के रूप में जिन्होंने एक नया जीवन-दर्शन दिया, जीने की कला सिखलाई। जिनको बहुत ही श्रद्धा व प्यार से कलगीयां, सरबंस दानी, नीले वाला, बाला प्रीतम, दशमेश पिता आदि नामों से पुकारा जाता है। भारत में फैली दहशत, डर और जनता का हारा हुआ मनोबल देखकर उन्होंने कहा ‘‘मैं एक ऐसे पंथ का सृजन करूँगा जो सारे विश्व में विलक्षण होगा। जिससे मेरे शिष्य संसार के असंख्य लोगों में पहली ही नजर में पहचाने जा सकेंगे। जैसे हिरनों के झुंड में शेर और बगुलों के झुंड में हंस। वह केवल बाहर से अलग न दिखे बल्कि आंतरिक रूप में भी ऊँचे, साहसी और सच्चे विचारों वाले हो।

गुरु गोविंद सिंह एक महान कवि और विद्वान भी थे। उनकी रचनाएँ ‘दसम ग्रंथ’ में संकलित हैं, जिनमें वीर रस, भक्ति, नीति और दर्शन का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनकी कविताएँ आत्मबल जगाती हैं और जीवन में धर्म व मर्यादा का बोध कराती हैं। उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति के माध्यम से समाज में जागरण का कार्य किया। उनका पारिवारिक जीवन भी त्याग और बलिदान की अनुपम गाथा है। उनके चारों पुत्र-साहिबजादे, धर्म और सत्य की रक्षा करते हुए शहीद हुए। छोटे साहिबजादों को दीवार में चुनवा दिया गया, फिर भी गुरु गोविंद सिंह जी विचलित नहीं हुए। उन्होंने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर मानवता को यह संदेश दिया कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए व्यक्तिगत दुख भी स्वीकार्य है। यह जीवन-चरित्र मानव इतिहास में दुर्लभ उदाहरण है।

गुरु गोविंद सिंह जी ने न केवल सिख समुदाय, बल्कि संपूर्ण मानवता को आत्मसम्मान और निर्भीकता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने स्त्रियों को समान सम्मान दिया और सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। उनका जीवन बताता है कि आध्यात्मिक व्यक्ति समाज से पलायन नहीं करता, बल्कि समाज को न्यायपूर्ण बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाता है। उनका एक अत्यंत क्रांतिकारी निर्णय था-गुरुगद्दी को किसी व्यक्ति के स्थान पर गुरु ग्रंथ साहिब को सौंपना। इससे उन्होंने यह स्पष्ट किया कि गुरु का स्वरूप शाश्वत ज्ञान है, न कि देह। यह निर्णय लोकतांत्रिक चेतना, विनम्रता और आध्यात्मिक परिपक्वता का प्रतीक है। आज जब विश्व हिंसा, असहिष्णुता, भेदभाव और नैतिक संकटों से जूझ रहा है, गुरु गोविंद सिंह की शिक्षाएँ पहले से अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। वे हमें सिखाते हैं कि साहस के बिना सत्य अधूरा है और करुणा के बिना शक्ति विनाशकारी। उनका जीवन संतुलित, मूल्यनिष्ठ और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

गुरु गोविन्द सिंहजी का जीवन एक कर्मवीर की तरह था। भगवान श्रीकृष्ण की तरह उन्होंने भी समय को अच्छी तरह परखा और तदनुसार कार्य आरम्भ किया। उनकी प्रमुख शिक्षाओं में ब्रह्मचर्य, नशामुक्त जीवन, युद्ध-विद्या, सदा शस्त्र पास रखने और हिम्मत न हारने की शिक्षाएँ मुख्य हैं। उनकी नजर में सत्ता से ऊंचा स्वराष्ट्र, स्व-अस्तित्व, समाज एवं मानवता का हित सर्वाेपरि था। यूं लगता है वे हिन्दू जीवन-दर्शन के पुरोधा बन कर आए थे। उनकी इच्छा थी कि प्रत्येक भारतवासी सिंह की तरह एक प्रबल प्रतापी जाति में परिणत हो जाये और भारत का उद्धार करें। गुरु गोविन्द सिंह जैसे महापुरुष इस धरती पर आये जिन्होंने सबको बदल देने का दंभ तो नहीं भरा पर अपने जीवन के साहस एवं शौर्य से डर एवं दहशत की जिन्दगी को विराम दिया। उनके कारण ही हिन्दू अपने अस्तित्व एवं अस्मिता को कायम रख पाये।

गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती पर देश और दुनिया के लिए उनका संदेश स्पष्ट है-डरो मत, झुको मत और अन्याय के सामने कभी समझौता मत करो। अपने भीतर की शक्ति को पहचानो, पर उसका प्रयोग सदैव धर्म, मानवता और न्याय के लिए करो। सत्य के मार्ग पर चलने वाले को ईश्वर स्वयं शक्ति देता है। आज आवश्यकता है कि हम उनकी शिक्षाओं को केवल स्मरण न करें, बल्कि अपने जीवन में उतारें। सत्यनिष्ठा, सेवा, साहस, समानता और त्याग-यदि ये मूल्य हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाएँ, तो समाज में स्वतः ही शांति और सद्भाव का वातावरण निर्मित होगा। उनकी जयंती हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम एक ऐसे विश्व के निर्माण में सहभागी बनें, जहाँ भय नहीं, बल्कि न्याय का शासन हो। उनका जीवन दीपस्तंभ की तरह है, जो अंधकार में भी मार्ग दिखाता है। उनकी शिक्षाएँ समय, देश और सीमाओं से परे हैं।

- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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