गुरु ठनठनलाल हुए अपडेट (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Nov 09, 2022

गुरु ठनठनलाल ने चेले ढुलमुलदास से कहा– सुनो चेला! अब हमारे अपडेट होने का समय आ गया है। कब तक अधनंगे कपड़ों में अपना नंगापन दिखाते फिरेंगे। खुद को हाई-फाई करना होगा। नहीं तो हमारे चेले-चपाटे दूर हो जायेंगे। 

गुरु जी– चेला! हम तुम्हारी गुरुभक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। नहीं तो हमारे आसपास ऐेसे भी चेले हैं जो गुरु जी की अंगुली पकड़ देश के प्रधान बन जाते हैं। बाद में गुरु जी केवल हाथ मलते रह जाते हैं। ऐसा मलना टू इन वन होता है। देखने वालों को ईश वंदना सा प्रतीत होता है और स्वयं को पछतावे का।

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चेला– वह तो ठीक है गुरु जी! आप अपडेट कैसे होंगे? आपके पास तो किताबें भी नहीं हैं? 

गुरु जी– चेला! किताबें पढ़ने के दिन लद गए हैं। दुनिया भर की धूल उन्हीं पर लदी पड़ी है। कमाल की बात तो यह है कि शीशे की बंद अलमारियों में धूल का बोझा उठाते हुए उन्होंने वीरता बहादुरी पुरस्कार के लिए मोबाइल पाठकों को आवेदन किया है। वैसे उनकी आकांक्षा न्यायोचित है। किताबें छोड़ो। बाजार से वीएफएक्स ग्राफिक्स के दो तीन सीडी उठा लाओ। एक ब्लेजर और स्टाइलिश चश्मा भी। 

चेला– यह सब क्यों गुरुजी? इससे क्या होगा? आपके पास वेदों का ज्ञान भी नहीं है।

गुरु जी– चेला! यह पुराण-वुराण का शुद्ध ज्ञान जल्दी लोगों को हजम नहीं होता। इसके साइड इफेक्ट बहुत होते हैं। इसलिए मैंने ट्रकों के ज्ञान से मोटिवेशनल गुरु बनने का विचार किया है।

चेला– ट्रकों से? 

गुरु जी– हाँ चेला ट्रकों से! मैंने अपने जीवन के कई बरस ट्रकों के पीछे लिखी लाइनों को पढ़ने में लगा दिया। इस पर ऐसे-ऐसे वाक्य लिखे मिले कि हृदय झूम उठा। जन्म से लेकर मृत्यु तक, प्यार से लेकर दुश्मनी तक, कीड़े-मकौड़ों से लेकर भगवान तक, नैतिकता से लेकर अनैतिकता तक के सभी मोटिवेशनल लाइनें मेरे मन-मस्तिष्क पर अंकित हैं। इसमें ऐसे-ऐसे पंच होते हैं कि सामने वाले के चारों खाने चित्त हो जाते हैं।

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चेला– गुरु जी! यह सब तो ठीक है। फिर ये वीएफएक्स, ब्लेजर और स्टाइलिश चश्मा क्यों? आप चाहें तो ऐसे ही मोटिवेशन गुरु बन सकते हैं। 

गुरु जी– चेला! तुम निरा मूरख हो निरा मूरख। वीएफएक्स ग्राफिक्स मेरे पीठ के पीछे अलग-अलग तरह की रंगों और किरणों को दिखाएगा। मैं बैठे बिठाए लोगों की आँखों में धूल झोंक सकूँगा। यह दुनिया रंग और किसी न किसी किरण की कमी की मारी है। मैं उनकी कमी को अपनी ताकत बनाऊँगा। ब्लेजर से बहुत पढ़ा लिखा दिखूँगा। चश्मे से मेरी धूर्तता भरी आँखों को छिपाने में लाभ मिलेगा। कुल मिलाकर थोखा देने में बाहरी दिखावे का भीतरी दिखावे से बड़ा हाथ होता है। 

चेला– वाह! गुरु जी वाह! क्या आइडिया निकाला है। मैं आपके नक्शे कदम पर चलकर मोटिवेशन गुरु न सही फेंकू चेला तो बन ही जाऊँगा। मैं भी लोगों की भावना वाली बहती गंगा में हाथ-पैर न सही अंगुलियाँ डुबोना चाहता हूँ। आप अपना आशीर्वाद मुझ पर बनाए रखिए।

गुरु जी– यह हुई न बात। मुझे तुम पर गर्व है। 

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

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