भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद चाहिए तो चले आइए केरल के गुरुवायुर मंदिर

By नीरज कुमार दुबे | Jun 24, 2019

दक्षिण की द्वारिका के नाम से विख्यात गुरुवायुर मंदिर अनेकों शताब्दियों से श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित इस अति प्राचीन मंदिर का पौराणिक ग्रंथों में विशेष महत्व बताया गया है। गुरुवायुर मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप गुरुवायुरप्पन की पूजा की जाती है। गुरुवायुर मंदिर में सिर्फ हिंदुओं को ही प्रवेश की इजाजत है और प्रवेश के लिए पहनावा भी निर्धारित है। गुरुवायुर मंदिर में पुरुष केरल की पारंपरिक लुंगी मुंडू पहन कर ही जा सकते हैं और महिलाओं को साड़ी अथवा सलवार सूट में ही जाने की इजाजत है। पुरुषों को कमीज या अन्य कोई परिधान पहनने के लिए इसलिए मनाही है ताकि भगवान की नजर सीधे उनके हृदय पर ही पड़े।

भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप वाली मूर्ति का इतिहास

गुरुवायुर मंदिर में भगवान विष्णु के दस अवतारों को भी बड़ी खूबसूरती के साथ दर्शाया गया है। गुरुवायुर मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा की मूर्तिकला अपने आप में बेजोड़ है। गर्भगृह में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के चार हाथ हैं जिनमें से भगवान ने एक हाथ में शंख, दूसरे में सुदर्शन चक्र और तीसरे तथा चौथे हाथ में कमल धारण कर रखा है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की यह प्रतिमा भगवान विष्णु जी ने भगवान ब्रह्माजी को सौंपी थी। इस मूर्ति के बारे में यह भी कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं यह मूर्ति द्वारका में स्थापित की थी लेकिन जब द्वारका में भयंकर बाढ़ आयी तो यह मूर्ति गुरु बृहस्पति को तैरती हुई अवस्था में मिली। गुरु बृहस्पति ने वायु की सहायता से भगवान श्रीकृष्ण की इस मूर्ति को बचाया और इसे स्थापित करने के लिए पृथ्वी पर उचित स्थान की खोज में लग गये। गुरु बृहस्पति जब केरल पहुँचे तो वहां उनकी मुलाकात भगवान शंकर और माता पार्वती से हुई। जब गुरु बृहस्पति ने भगवान शिव को अपने आने का प्रयोजन बताया तो भोले शंकर ने कहा कि यह स्थान ही सबसे उपयुक्त है मूर्ति स्थापना के लिए। तब गुरु बृहस्पति और वायु ने भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति का अभिषेक कर उसकी स्थापना की और इस मंदिर को 'गुरुवायुर' का नाम दिया गया। इस मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता यह भी है कि इसके भवन का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था। गुरुवायुर मंदिर का निर्माण इस प्रकार हुआ है कि सूर्य की प्रथम किरणें सीधे भगवान गुरुवायुर के चरणों पर गिरती हैं।


गुरुवायुर मंदिर की पूजन विधि

गुरुवायुर मंदिर में आदिशंकराचार्य द्वारा तय की गयी विधि से ही भगवान का पूजन होता है। गुरुवायुर मंदिर में कई तरह की विशेष पूजाएं भी कराई जाती हैं जिनके लिए शुल्क निर्धारित है। गुरुवायुर मंदिर में अनेकों अवसरों पर उत्सव भी आयोजित किये जाते हैं और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का यहाँ खास महत्व है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए तमाम सुविधाओं की व्यवस्था है क्योंकि यहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनों के लिए आते हैं। गुरुवायुर मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए दिन में दो बार प्रसाद वितरण निःशुल्क भोजन का भी आयोजन होता है जिसके लिए अच्छी खासी भीड़ होती है। गुरुवायुर मंदिर परिसर में केरल के पारंपरिक नृत्य और गायन का आयोजन भी होता है। गुरुवायुर मंदिर में लगभग हर दिन शादियां भी कराई जाती हैं जिसके लिए आपको पहले से पंजीकरण कराना होता है। 

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पौराणिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि गुरुवायुर में पूजा के पश्चात् मम्मियुर शिव की आराधना का विशेष महत्व है। यह कहा जाता है कि मम्मियुर शिव की पूजा किए बिना भगवान गुरुवायुर की पूजा को संपूर्ण नहीं माना जाता है। यदि आप भी गुरुवायुर मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनों के लिए आ रहे हैं तो इस बात का जरूर ध्यान रखें कि दर्शनों में कम से कम तीन से चार घंटे का समय लग सकता है।

क्या है तुलाभरम की रस्म ?

गुरुवायुर मंदिर में तुलाभरम की रस्म भी निभाई जाती है। शास्त्रों में दान के जितने प्रकार बताये गये हैं उनमें तुलाभरम सर्वश्रेष्ठ है। तुलाभरम यदि आप भी करना चाहते हैं तो उसके लिए मंदिर प्रशासन में पहले पंजीकरण करा कर समय लेना होता है। तुलाभरम की रस्म के तहत कोई भी व्यक्ति फूल, अनाज, फल और ऐसी ही वस्तुओं के साथ तराजू में खुद को तौलता है और अपने वजन के बराबर वस्तुएं दान कर देता है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जब गुरुवायुर मंदिर का दौरा किया था तो अपने वजन के बराबर कमल के फूलों का दान किया था।

-नीरज कुमार दुबे

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