आधी आबादी पर अब भी हावी है पुरूष प्रधान समाज

By राजेश कश्यप | Sep 02, 2016

देश में बढ़ते लिंगानुपात की समस्या चरम पर पहुँच चुकी है। कई राज्यों में तो लड़कियों का अनुपात बेहद चिंताजनक एवं बदतर स्थिति में पहुँच चुका है। देश में बेटियों की संख्या बेटों के बराबर लाने के लिए ठोस पहल करने की सख्त आवश्यकता है। आम तौर पर कन्या-भ्रूण हत्या के लिए दो मुख्य कारकों को ही उत्तरदायी माना या समझा जाता रहा है। इसमें पहला मुख्य कारक लोगों की यह मानसिकता है कि ‘सिर्फ लड़के से ही वंश चलता है’ और दूसरा यह कि ‘लड़कियाँ पराया धन होती हैं।’ इन दो मुख्य कारकों के अलावा भी अन्य कई कारक हैं, जो बेटियों को कोख में ही कत्ल करवाने के लिए उत्तरदायी हैं। उन कारकों पर भी गम्भीर विचार-मन्थन करना बेहद अनिवार्य है। अन्य कारकों पर चर्चा से पहले इस यक्ष प्रश्न का जवाब दिया जाना चाहिए कि क्या इन दो मुख्य कारकों का समाधान ढ़ूंढ़ा जा चुका है? क्या समाज में व्याप्त दोनों मानसिकताओं से छुटकारा पाने के लिए कारगर उपाय ढ़ूंढ़ लिए गए हैं? विडम्बना का विषय है कि इसका जवाब नहीं है।

यह पहल समाज में लड़की पक्ष को दिए गए अपेक्षाकृत छोटे दर्जे पर कड़ा प्रहार करने वाली होगी। समाज में जब वैवाहिक रीति-रिवाज एवं अन्य सामाजिक संस्कारों का निर्वहन किया जाता है तो उसमें लड़के के पिता व परिवार को सर्वोच्च स्थान पर रखा जाता है और उनके कृपा पात्र के रूप में लड़की के पिता एवं परिवार को रखा जाता है। चारपाई के सिरहाने पर लड़के के पिता को स्थान मिलता है और चारपाई की पांत की तरफ अथवा नीचे लड़की के पिता को स्थान दिया जाता है। अपनी लड़की के सुख और सम्मान के लिए लड़की के पिता एवं परिवार के हाथ सदैव लड़के के पिता एवं परिवार के आगे भिखारियों की तरह पसरे रहते हैं अथवा समर्पण की मुद्रा में बंधे रहते हैं। उन्हें यह अहसास होने लगता है कि मानो बेटी पैदा करके उन्होंने कोई अपराध कर दिया हो। आखिर, ऐसा क्यों? लड़के वालों की सभी जायज-नाजायज माँगों को आँख बन्द करके स्वीकार करने के सिवाय कोई अन्य विकल्प ही नहीं छोड़ा गया है। यदि कोई विकल्प है तो सिर्फ कानूनी कार्यवाही का है। लड़की के मान-सम्मान व परिवार की इज्जत की खातिर कितने मामले थानों में दर्ज हो पाते हैं और जो दर्ज हो पाते हैं, उनमें कितनों को समुचित समय पर सही न्याय मिल पाता है? देश की अदालतों में महिला उत्पीड़न, दहेज, बलात्कार, छेड़खानी, अपहरण मामलों की लंबित सूची इसका साक्ष्य कही जा सकती है। इन्हीं सबके चलते महिलाओं को ससुराल में घोर घरेलू-हिंसा का सामना करना पड़ता है और प्रतिदिन असहनीय मारपीट, गाली-गलौच, धमकियाँ, ताने सहन करने को विवश होना पड़ता है। कहीं न कहीं लचर कानूनी व्यवस्था भी बेटियों के लिए अभिशाप सिद्ध हो रही है।

अजीब बात यह है कि ‘पुरूष-प्रधान समाज’ ने लड़कियों एवं महिलाओं के लिए हर तरह की अमिट मर्यादाएं एवं लक्ष्मण रेखाएं भी खींच रखी हैं। क्या खाना है, कब खाना है, कितना खाना है, क्या पहनना है, क्या ओढ़ना है, कहाँ जाना है, कब जाना है, कहाँ नहीं जाना है, किसके साथ बात करनी है, किसके साथ नहीं करनी है आदि-आदि। महिलाओं के लिए पुरूष ही परमेश्वर हैं। उनके हर वचन का पालन करना महिला का परमधर्म है। पुरूष पर हाथ उठाना महापाप है। उसके साथ जुबान लड़ाना अथवा उसके कहे में न चलना ‘आवारापन’ एवं ‘बदचलनी’ है। समाज में विवाह के दौरान सात फेरों की रस्म अदा की जाती है और सातवां फेरा लेते ही महिलाएं गीत की अंतिम पंक्ति गाती हैं ‘लाडो हुई-ए परायी’। सातवाँ फेरा लेते ही लाडो को परायी घोषित कर दिया जाता है और उसके सुख-दु:ख की डोर पति के रहमोकर्म पर छोड़ दी जाती है। इसके साथ ही लड़की को यह भी कंठस्थ कराया जाता है कि लड़की की डोली हमेशा पिता के घर से उठती है और उसकी अर्थी पति के घर से। क्या है यह सब? क्या इन पुरूष-सत्ता की थोपी हुई रस्मों-रिवाजों के चलते नारी समाज को बराबरी का हक कभी मिल सकेगा? कदापि नहीं।

जब किसी के घर लड़की का जन्म होता है तो माता-पिता को वह भार महसूस होती है। इसकी कई सामाजिक वजह एवं विवशताएं होती हैं। एक सामान्य परिवार में एक लड़की के पैदा होने पर उतना शोक नहीं होता है, जितना कि लड़के की चाहत में दूसरी, तीसरी अथवा चौथी लड़की पैदा होने पर होता है। लड़की को खुलकर खाने-पीने, घूमने-फिरने और पढ़ने-लिखने का सहज मौका नहीं मिल पाता है। एक अजीब विडम्बना है कि लड़की को उच्च शिक्षित करो तो उसके बराबर अथवा उससे अधिक शिक्षित वर ढ़ूंढ़ने और कम शिक्षित की अपेक्षाकृत अधिक दहेज देने की शर्तों का न चाहते हुए भी लड़की के पिता एवं परिवार को पालन करना पड़ता है। लड़की से सवाया लड़का होने की सोच पुरूष-प्रधान समाज की ही देन है। लड़की को ससुराल में भारी दहेज के साथ न भेजा जाए तो उसे शारीरिक एवं मानसिक यातनाओं से लेकर अकाल मौत तक का सामना करना पड़ता है। समाज में ‘न दहेज लेंगे और न दहेज देंगे’ की दोयम दर्जे की कसमें खाई जा रही हैं। जब दहेज लेने की बारी आती है तो कसम को भुला दिया जाता है। शादी के बाद हर व्रत-त्यौहार एवं मांगलिक अवसर पर कीमती उपहार एवं अन्य सामान ले जाने की परम्पराएं लड़की के परिवार पर ही थोपी गई हैं। एक पिता एवं परिवार कर्ज उठाकर अपनी बेटी के सुख एवं सम्मान के लिए हर रिवाज का पालन मन-मसोस कर करता है। इसीलिए, बेटियाँ ‘बोझ’ की संज्ञा में कैद होकर रह गई हैं।

विडम्बना का विषय है कि बेटियों से छुटकारा पाने की ललक उच्च घरानों और उच्च शिक्षित लोगों में सर्वाधिक देखने को मिलती है। घर की सम्पत्ति कहीं कम न हो जाए, इसके लिए धनाढ्य लोग किसी भी सूरत में बेटी पैदा ही नहीं होने देते। असीम पीड़ा की बात तो यह है कि ‘जीवनदाता’ एवं ‘भगवान’ की श्रेणी में शामिल डॉक्टर पैसे के लालच में गैर-कानूनी रूप से धड़ाधड़ ‘लिंग-परीक्षण’ एवं ‘कन्या-भ्रूण हत्या’ जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। दूसरी माँ का दर्जा प्राप्त दाई-माँ, आंगनवाड़ी वर्कर आदि भी इस महापाप एवं जघन्य अपराधों में संलिप्त हैं। ‘शर्तिया लड़का ही होगा’ के दावे करके देशी दवा देने वालों की दुकानें भी धड़ल्ले से चल रही हैं। कुल मिलाकर इन सब जघन्य अपराधों, कुरीतियों, भेदभावों और संकीर्ण मानसिकताओं का एक ही समाधान है, ‘महिला-पुरूष समानुपात समाज’ की स्थापना। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हर किसी को, हर स्तर पर, हरसंभव प्रयास पूर्ण ईमानदारी एवं निष्ठा के साथ करने ही होंगे। तभी ‘कन्या-भ्रूण हत्या’ रोकने की मुहिम सफल हो पायेगी।

- राजेश कश्यप

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