By नीरज कुमार दुबे | Sep 21, 2026
अक्सर विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहने वाले पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हालिया बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और कांग्रेस की वैचारिक दिशा को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। नई दिल्ली में एजी नूरानी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में अंसारी ने नूरानी की 2019 में प्रकाशित पुस्तक The RSS: A Menace to India का हवाला देते हुए जवाहरलाल नेहरू की एक कथित टिप्पणी दोहराई थी। अंसारी के अनुसार, नेहरू ने कहा था कि भारत के लिए खतरा कम्युनिज्म नहीं, बल्कि “हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता” है। इसी संदर्भ में उन्होंने नागरिक राष्ट्रवाद की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार पर भी सवाल उठाए थे।
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लेकिन अंसारी के बयान का दूसरा और अधिक गंभीर राजनीतिक पहलू भी है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे रुझान उभरे हैं जो नागरिक राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा को चुनौती देकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाते हैं। उनके मुताबिक इसमें चुनावी बहुमत को धार्मिक बहुमत के रूप में प्रस्तुत करने और राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह महज इतिहास का संदर्भ नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर सीधा वैचारिक आरोप है।
इसी मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पर और तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति से पद की गरिमा बनाए रखने की अपेक्षा होती है। योगी ने अंसारी के बयान को भारतीय परंपराओं और सनातन संस्कृति के प्रति अपमानजनक बताया तथा आरोप लगाया कि इससे भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश होती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बयान में हिंदू परंपरा को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
उधर, भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन ने भी अंसारी से माफी की मांग की और दावा किया कि उनकी टिप्पणी से मुस्लिम समुदाय के भी अनेक लोग असहज हुए हैं। साथ ही भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने विभाजन के बाद भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ रहने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश सफल नहीं होगी। यही नहीं, कई अन्य मुस्लिम धार्मिक नेताओं द्वारा भी अंसारी की टिप्पणियों से दूरी बनाने और सामाजिक सौहार्द पर जोर देने की खबरें सामने आई हैं।
बहरहाल, अब असली राजनीतिक बहस यही है कि क्या भारत को समझने के लिए हिंदू बनाम कम्युनिज्म की पुरानी वैचारिक तुलना पर्याप्त है? क्या हिंदू राष्ट्रवाद को स्वतः “खतरा” मानना उचित है? क्या नेहरू के दशकों पुराने कथन को आज की राजनीतिक परिस्थितियों का निर्णायक प्रमाण माना जा सकता है? देखा जाये तो इस विवाद ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि भारत की राजनीति में राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सनातन परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की चर्चा अब केवल इतिहास की बहस नहीं रही, यह मौजूदा सत्ता-संघर्ष के केंद्र में है।