रोने में सुख बहता है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Feb 02, 2022

हालांकि हंसने हंसाने के प्रयास दिन रात चल रहे हैं वह अलग बात है कि उदास चेहरों से कहा जाता है कि आपके पेट की तरफ देखकर लगता है आपने खूब पकवान खाए हैं। यह बहुत प्रशंसनीय समानता की बात है कि उनसे भी तू तड़ाक कर बात नहीं की जाती। बड़े सलीके से आप कहकर पुकारा जाता है। खुश करने और खुश रहने के तरीकों पर रोज़ नई किताब बाज़ार में खड़ी होती है। आपदा में अवसर खोदकर हर दिशा में संतुष्टि के बाग़ लहलहा रहे हैं लेकिन इन विदेशियों को पता नहीं क्या क्या होता रहता है। उन्हें रोने में सुख ढूंढने की आदत सी पड़ गई है। जापानियों ने टीयर टीचर्स तैयार किए थे ताकि आंसु बहाकर तनाव भरी ज़िंदगी को कुछ राहत मिल सके।

मानसिक स्वास्थ्य के लिए वहां किए जा रहे अनेक प्रयोग हमारे यहां पहले से खूब सफल हैं। हमारे यहां रोना वैसे तो मना है हां रोने का दिखावा करने पर कोई बैन नहीं है। मगरमच्छ के आंसू बहुत प्रसिद्द हैं। हम तो अपनी दिमागी हालत सुधारने के लिए दूसरों को पीट देते हैं, हाथ पांव तोड़ देते हैं, रुलाते हैं और स्वर्गिक आनंद प्राप्त करते हैं। इस माध्यम से लोकतंत्र भी मजबूत और सुरक्षित रहता है। मजबूती ज़्यादा बढानी हो तो कत्ल तक कर देते हैं।

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दरअसल जो सुख रुलाने में है वह रोने में नहीं है। कितने ही तरह के गुरुओं ने मार पीट कर अपने चेलों का जीवन रोना रहित कर दिया है। ऐसे चेले हमेशा अपने गुरुओं के शुक्रगुजार रहते हैं कि अच्छा किया उचित समय पर पीटा, रुलाया तो जीवन सुधर गया। लेकिन अब व्यवस्था परिवर्तन के कारण सब उलट पलट हो गया है अब सभी का अपना अपना रोना है। अकेले न रोकर सबके सामने रोते हैं जिसमें नाटक ज़्यादा करना पड़ता है। ज़िंदगी ठीक से गुजारने के लिए रोना रुलाना एक आवश्यक तत्व हो गया है। इससे यह बात गलत साबित होती जा रही है कि हमेशा खुश रहना चाहिए।

इंसान अब फिर से समझ रहा है कि सुख के असली सूत्र तो अच्छी तरह, सही तरीके से कई शैलियों में रोने में छिपे हैं। कबीर भी तो जन्म लेते ही बच्चे को रुलाने की खरी बात कह गए हैं, बच्चा रोता है तभी घर परिवार वाले खुश होते हैं। दर्द के गीतों को ही तो ज़िंदगी का संगीत माना गया है। विदेशों में रोने पर हो रहा संजीदा काम हमारे लिए अधिक प्रेरक साबित हो सकता है।

- संतोष उत्सुक

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