By एकता | Sep 24, 2026
सितंबर की पूर्णिमा को खास माना जाता है और इसे ‘हार्वेस्ट मून’ यानी फसल का चांद कहा जाता है। यह नाम उस पूर्णिमा के लिए इस्तेमाल होता है जो शरद ऋतु की शुरुआत के समय पड़ने वाली विषुव तिथि के सबसे करीब होती है। पुराने समय में किसान फसल काटने के लिए चांदनी का सहारा लेते थे। पूर्णिमा की तेज रोशनी से सूर्यास्त के बाद भी खेतों में काम करना आसान होता था।
इसलिए भारत में इसे 26 सितंबर की रात देखा जा सकता है। 25 सितंबर की रात भी चांद लगभग पूरा दिखाई देगा और 27 सितंबर की रात भी यह काफी हद तक पूर्ण नजर आएगा। दिल्ली के आंकड़ों के अनुसार 25 सितंबर को चांद करीब 98.9 प्रतिशत रोशन होगा और 27 सितंबर को करीब 99.9 प्रतिशत।
हार्वेस्ट मून का नाम खेती से जुड़ी पुरानी परंपरा से आया है। शरद विषुव के आसपास आने वाली पूर्णिमा कई रातों तक सूर्यास्त के कुछ समय बाद दिखाई देती है। पुराने समय में इससे किसानों को फसल काटने के लिए शाम के समय अतिरिक्त रोशनी मिलती थी।
लेकिन आध्यात्मिक साधना करने वाले लोगों के लिए पूर्णिमा का महत्व केवल आसमान में दिखाई देने वाले चांद तक सीमित नहीं है। वर्ल्ड प्राणिक हीलिंग के निदेशक और वर्ल्ड प्राणिक हीलिंग फाउंडेशन, इंडिया के ट्रस्टी श्रीराम राजगोपाल ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि आध्यात्मिक साधना में पूर्णिमा के दिनों को खास महत्व दिया जाता है।
राजगोपाल के अनुसार, आध्यात्मिक साधना करने वाले लोग पूर्णिमा के दिन को ऐसा समय मानते हैं जब धरती पर ऊर्जा का स्तर बढ़ जाता है। ध्यान करने वाले लोग इस समय को ध्यान और दूसरी आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि साधक इस समय का इस्तेमाल आध्यात्मिक विकास, सेवा और धरती के कल्याण पर ध्यान देने के लिए कर सकते हैं।
अगर आप किसी आध्यात्मिक साधना का पालन करते हैं तो पूर्णिमा को खुद के साथ कुछ शांत समय बिताने के मौके के तौर पर लिया जा सकता है। ध्यान, मनन और सामूहिक आध्यात्मिक साधना इस दिन की दिनचर्या का हिस्सा हो सकती है।
राजगोपाल के अनुसार, कई आध्यात्मिक परंपराओं में पूर्णिमा के दिन सामूहिक ध्यान को खास महत्व दिया जाता है। साधक इस समय को उस बढ़ी हुई मानी जाने वाली ऊर्जा के साथ रचनात्मक तरीके से काम करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
राजगोपाल के अनुसार, प्राणिक हीलिंग में ट्विन हार्ट्स मेडिटेशन का खास महत्व है। इस साधना में हृदय और सिर के ऊपरी हिस्से से जुड़े ऊर्जा केंद्रों को सक्रिय करने के बाद धरती और उसके लोगों के लिए प्रेम, शांति, दया, क्षमा, उम्मीद, विश्वास, खुशी और सद्भावना की भावना के साथ आशीर्वाद देने की प्रक्रिया शामिल है।
उनके मुताबिक, नियमित अभ्यास से शरीर को शांत करने, विचारों और भावनाओं को स्थिर करने और जागरूकता व अंदरूनी शांति बढ़ाने में मदद मिलती है। यह साधना व्यक्ति को अपनी निजी जरूरतों से आगे बढ़कर परिवार, समाज और धरती के प्रति सद्भावना रखने के लिए भी प्रेरित करती है।
‘वर्ल्ड प्राणिक हीलिंग’ की साधना में सामूहिक ध्यान को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। राजगोपाल ने बताया कि पूर्णिमा के दौरान साथ मिलकर ध्यान करना आध्यात्मिक विकास और दुनिया की सेवा का एक अवसर माना जाता है।
मॉडर्न प्राणिक हीलिंग और आर्हटिक योग के संस्थापक ग्रैंड मास्टर चोआ कोक सुई के अनुसार, जब सात या उससे ज्यादा लोग साथ में ध्यान करते हैं तो वे उतनी ऊर्जा पैदा कर सकते हैं, जितनी 100 लोग अलग-अलग ध्यान करके पैदा करते हैं। हालांकि, यह प्राणिक हीलिंग परंपरा की एक मान्यता है और इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित माप के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
हार्वेस्ट मून के लिए किसी खास या जटिल पूजा-पाठ की जरूरत नहीं है। आप किसी शांत जगह पर बैठकर कुछ मिनट ध्यान या मनन कर सकते हैं। इस दौरान दया, क्षमा, शांति और सद्भावना जैसी भावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। अगर आप ट्विन हार्ट्स मेडिटेशन या किसी दूसरी आध्यात्मिक साधना का अभ्यास करते हैं तो अपनी परंपरा या किसी योग्य प्रशिक्षक द्वारा बताए गए तरीके का ही पालन करें।