By अभिनय आकाश | May 05, 2026
धोनी इज मोर पॉपुलर इन तमिलनाडु देन प्रशांत किशोर। नेक्स्ट ईयर व्हेन आई कंट्रिब्यूट एंड आई हेल्प यू विन देन आई विल बी टेकिंग ओवर धोनी इन इन पॉपुलैरिटी। प्रशांत किशोर का ओवर कॉन्फिडेंस वाला दावा जो आज तमिलनाडु का सच बन चुका है। यह भविष्यवाणी जो कल तक हवाबाजी लग रही थी। आज करोड़ों लोगों के जनादेश के जरिए थलापति को विजय बना चुकी है। सत्ता के सिंहासन की तरफ बढ़ा रही है और दशकों से तमिलनाडु की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले एमके स्टालिन को अपने ही घर में हरा चुकी है। क्या यह सिर्फ एक हार है या फिर द्रविडियन राजनीति के उस विशाल बरगद का गिरना जिसकी जड़े बहुत गहरी है और जयललिता के जाने के बाद उसे लेकर एक धारणा थी कि अब तो कोई इसे हिला नहीं सकता, हटा नहीं सकता। लेकिन वो हिली है तमिलनाडु की सड़कों पर विजय का उत्सव है। डीएमके के दफ्तरों में सन्नाटा है और यहीं से सवाल है कि क्या ये सिर्फ एक सुपरस्टार एक करिश्मे की जीत है या रणनीतिकार के ठंडे नपे तुले दिमाग का असर। क्या ये डीएमके की हार एंटी इनकंबेंसी है सालों के अहंकार की वजह है। जनता से दूरी की वजह या फिर विजय के वह लोक लुभावने वादे कि हम बिजली फ्री में देंगे, गाड़ी फ्री में देंगे, सोना फ्री में देंगे, पढ़ाई फ्री में देंगे, यह भी फ्री देंगे, वो भी फ्री देंगे, सब दे देंगे। बस वोट दे दो। कई सवाल हैं जो तमिलनाडु की जीत को लेकर आज सोशल मीडिया पर उठ रहे हैं और सबसे बड़ा सवाल जो उठ रहा है वो बिहारी अस्मिता को लेकर है क्योंकि प्रशांत किशोर ने बिहारियों के अपमान का बदला लिया है। स्टालिन की बिसात को उल्टा है। क्या धोनी की तरह उनका जो ये फिनिशर अंदाज है यह उनके करियर में एक नया ट्विस्ट लाएगा? बिहार में उनके रिवाइवल की वजह बनेगा? तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे सिर्फ एक चुनावी परिणाम नहीं है बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति में आए भूकंप की तरह है जिसने देश को हिलाया है।
प्रशांत किशोर और थलपति विजय का यह गठबंधन कोई रातोंरात हुआ चमत्कार नहीं था। तमिलनाडु की राजनीति दशकों से डीएमके और एआईए डीएमके की मजबूत बाइनरी में कैद रही है। इस द्रविड़ियन किले को सिर्फ फिल्मी स्टारडम से नहीं भेजा जा सकता था। रजनीकांत और कमल हसन जैसे दिग्गज इसका उदाहरण रहे हैं। विजय यह बात बहुत अच्छी तरह जानते थे कि सिर्फ फिल्मों की ब्लॉकबस्टर ओपनिंग के वोट में तब्दील करने के लिए उन्हें एक ऐसे माइंड की जरूरत है जो जमीन का गणित समझता हो और यहीं से शुरू हुआ पीके और थलपति का मिशन। 2025 में फरवरी के शुरुआती दिनों में इन दोनों की पहली मुलाकात हुई। राजनीति में कोई भी मुलाकात बेवजह नहीं होती। लेकिन मीडिया की नजरों से इसे बचाने के लिए शुरुआत में इसे महज एक शिष्टाचार भेंट बता दिया गया। पीके बहुत अच्छे से जानते थे कि अगर शुरुआत में ही यह मैसेज चला गया कि एक नॉर्थ इंडियन रणनीतिकार विजय की पार्टी चला रहा है तो तमिलनाडु की जनता जो अपनी भाषाई और क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर बेहद संवेदनशील है इसे खारिज कर देगी। इसलिए जब कुछ ही हफ्तों बाद फरवरी के अंत में एक बड़े कार्यक्रम के दौरान पीके और विजय पहली बार एक ही मंच पर सार्वजनिक रूप से खड़े हुए तो पीके ने माइक पकड़ते ही सबसे पहले इसी नैरेटिव को सेट किया। पीके ने कहा मैं यहां अपने भाई अपने दोस्त विजय को कोई चुनाव जिताने के लिए या मदद करने नहीं आया हूं। विजय को किसी मदद की जरूरत है ही नहीं। मैं यहां आया हूं क्योंकि वह तमिलनाडु के लिए नई उम्मीद है। यह महज एक बयान नहीं था। एक मास्टर स्ट्रोक था। पीके ने एक ही लाइन में विजय के ईगो को भी पुचकारा। उनके समर्थकों को यह मैसेज भी दे दिया कि उनका हीरो किसी बाहरी पर मोहताज नहीं है और साथ ही खुद को एक गाइड की सुरक्षित भूमिका में सेट कर लिया। यह पीके का वो ठेट स्टाइल है जिसमें वो क्रेडिट बैक सीट पर रखते हैं और और कैंडिडेट को फ्रंट सीट पर बिठाते हैं। इस पूरी जीत का एनालिसिस तब तक अधूरा है जब तक हम प्रशांत किशोर के उस भारी-भरकम पॉलिटिकल रिज्यूम को नहीं समझ लेते जिसने भारतीय राजनीति के पिछले एक दशक को आकार दिया है। पीके कोई साधारण चुनाव प्रचारक नहीं है। वह चुनाव को एक कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट की तरह हैंडल करते हैं।
बिहार राजनीति, कूटनीति और अर्थशास्त्र के पंडित माने जाने वाले चाणक्य की धरती है, जिसने चंद्रगुप्त मौर्य को पाटलिपुत्र पर राज करने के तरीकों और राजनीति के रहस्यों से रूबरू करवाया था। लेकिन वर्तमान में मगध के एक आधुनिक चाणक्य जिसने बचपन में चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी की चुनावी रणनीति की कमान को संभालते हुए लोकसभा चुनाव 2014 में उनका प्याला वोटों से भर दिया, फिर नीतीश कुमार को 'बिहार में बहार हो नीतेशे कुमार हो' के नारे के साथ फिर से राज्य के सर्वोच्च कुर्सी पर काबिज किया और अमरिंदर सिंह को पंजाब का कैप्टन बना दिया। साल 1977 में प्रशांत किशोर का जन्म बिहार के बक्सर जिले में हुआ था। उनकी मां उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की हैं वहीं पिता बिहार सरकार में डॉक्टर हैं। उनकी पत्नी का नाम जाह्नवी दास है। जो असम के गुवाहाटी की एक डॉक्टर हैं। राजनीतिक करियर की बात करें तो 2014 में मोदी सरकार को सत्ता में लाने की वजह से वह चर्चा में आए थे। उन्हें एक बेहतरीन चुनावी रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता है। हमेशा से वह पर्दे के पीछे रहकर अपनी चुनावी रणनीति को अंजाम देते आए हैं। इसी वजह से उन्हें सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता रहा है। चुनावी रणनीतिकार माने जाने वाले प्रशांत किशोर का मैजिक आंध्र प्रदेश के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में देखने को मिला जब राष्ट्रीय चाणक्य की भूमिका निभाने के ख्वाब संजोये चंद्रबाबू नायडू को निराशा हाथ लगी और जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश की 22 लोकसभा सीटें जीतीं और विधानसभा में 175 में से 150 सीटों पर कब्जा जमाया। अपने कॅरियर की शुरुआत यूनिसेफ में नौकरी से करने वाले किशोर ने वहां ब्रांडिंग का जिम्मा संभाला। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के चर्चित आयोजन ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की ब्रांडिंग का ज़िम्मा संभालते हुए प्रशांत ने इसे सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इसी दौरान उनकी जान-पहचान नरेंद्र मोदी से हुई और प्रशांत किशोर ने टीम मोदी के लिए काम करना शुरू किया लेकिन पीके की मज़बूत पहचान बनी 2014 के चुनाव से जिसमें उनके प्रचार-प्रसार के पेशेवर तरीकों ने नरेन्द्र मोदी की जीत को काफी हद तक आसान बना दिया। ‘चाय पर चर्चा’ और ‘थ्री-डी नरेंद्र मोदी’ के पीछे प्रशांत का ही दिमाग था।
2017 में पंजाब में कांग्रेस के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह का कैप्टन द नवा पंजाब कैंपेन हो। 2019 में आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के लिए पद यात्रा का डिजाइन हो या 2020 में अरविंद केजरीवाल के लिए लगे रहो केजरीवाल का नारा हो। पीके ने हर राज्य हर नेता और हर हालात के हिसाब से एक नई राजनीतिक चाबी घड़ी। सबसे बड़ी परीक्षा 2021 में बंगाल में हुई जब बीजेपी ने ममता बनर्जी को हराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। तब पीके ने ही बंगाल निजेर में कई चाय यानी बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है का वो इमोशनल नैरेटिव गढ़ा था जिसने प्लास्टर चढ़े पैर वाली ममता बनर्जी को एक ऐसी सिंपैथी और ताकत दी कि बीजेपी का किला वहीं रह गया। पीके की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनका डाटा कलेक्शन हर बूथ की माइक्रो मैनेजमेंट और वोटर के दिमाग में पल रहे एंटी इनकंबेंसी को एक सधे हुए स्लोगन में बदल देने की कला है। विजय की टीवी के साथ मिलकर दर्ज की गई 2026 की इस ताजा जीत में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू कुछ और ही है। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि आपको अपने दुश्मनों से ज्यादा अपने उन दोस्तों से डरना चाहिए जो आपके सारे राज जानते हो। पीके ने इस बार उसी सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंका जिसे उन्होंने खुद 5 साल पहले अपने हाथों से स्थापित किया था। याद कीजिए 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव तब डीएमके 10 सालों से सत्ता से बाहर थी। एमके स्टालिन के सामने एआईए डीएमके को हराने की चुनौती थी। तब स्टालिन ने प्रशांत किशोर और उनकी टीम आईपैक को हायर किया था। पीके ने ही तब डीएमके के लिए ओंद्री नाइवोम वा यानी आईए एकजुट होकर जबरदस्त कैंपेन चलाया था।
पीके ने डीएमके के ब्लॉक और बूथ लेवल के स्ट्रक्चर को एक मशीन की तरह सेट किया और स्टालिन को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था। अब 5 साल बाद 2026 के अखाड़े में कहानी पूरी तरह पलट गई। पीके अब विजय के साथ खड़े थे और उनका निशाना थी वही डीएमके। वेडीएमके के हर कमजोर बूथ संगठन की हर खामी स्टालिन की कैबिनेट के खिलाफ सुलग रहे सत्ता विरोधी गुस्से और द्रविड़ राजनीति के उस लूप होल को बखूबी जानते थे जहां से एक नया युवा नेता की एंट्री करवाई जा रही थी। उन्होंने डीएमके के उस अभेद किले को उसी के ब्लूप्रिंट का इस्तेमाल करके ढहा दिया। तमिलनाडु में मिली यह जीत विजय से भी कहीं ज्यादा प्रशांत किशोर के लिए एक जीवनदान है। इस जीत को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटकर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के पन्ने को पलटना होगा। दूसरों को राजा बनाने वाले पीके के मन में भी खुद सत्ता संभालने की महत्वाकांक्षा जागी थी। उन्होंने जन स्वराज नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। बिहार की राजनीति में बुरी तरह फ्लॉप हो गए। इस करारी हार के बाद राजनीतिक पंडितों ने उनके करियर का मर्सिया पढ़ने में देर नहीं लगाई। कहा जाने लगा कि पीके का गुब्बारा फूट गया। चुनाव लड़ना मुश्किल। हार से जूझ रहे पीके ने आखिरकार तय किया कि वह वापस उसी काम पर लौटेंगे, जिसमें उनका कोई सानी नहीं है। धोनी की ही तरह पीके ने भी जड़ दिया है।