By अभिनय आकाश | Nov 07, 2026
क्या कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने की एक सरकारी कोशिश खुद एक बड़े विवाद की वजह बन गई? 13 जनवरी 2026 को यूजीसी ने एक नए नियम का ऐलान किया, लेकिन 29 जनवरी आते-आते सुप्रीम कोर्ट ने इस पर ब्रेक लगा दिया। आज आलम यह है कि केंद्र सरकार को खुद इन नियमों की समीक्षा के लिए कमेटी बनाने की बात कहनी पड़ रही है। आखिर इन गाइडलाइंस में ऐसा क्या था जिसने दोनों पक्षों सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग को एक साथ नाराज कर दिया? सुप्रीम कोर्ट की वो कौन-सी सख्त टिप्पणियां थीं जिन्होंने सरकार को दोबारा सोचने पर मजबूर किया? आइए, इस पूरे विवाद की इनसाइड स्टोरी को समझते हैं।
इनका मकसद कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जातिगत भेदभाव की शिकायतों को सुनने और उन पर कारवाई करने की व्यवस्था मजबूत करना था। यह नियम देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होने थे। इन नियमों के तहत हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक समता कमेटी बनाना जरूरी किया गया था। इसके अलावा समान अवसर केंद्र बनाने की भी बात कही गई थी। इनका काम भेदभाव की शिकायतें सुनना और वंचित वर्गों के छात्रों को मदद देना था। कमेटी में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल करना जरूरी था। नए नियमों में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों को जातिगत भेदभाव के खिलाफ शिकायत करने का अधिकार दिया गया। इससे पहले यह अधिकार एससी और एसटी वर्ग के छात्रों को था। लेकिन नए नियमों में ओबीसी वर्ग को भी शामिल किया गया। लेकिन जातिगत भेदभाव की परिभाषा पर सामान्य वर्ग के छात्रों ने सवाल उठाए। उनका कहना था कि अगर सामान्य वर्ग के किसी छात्र के साथ भी जाति के आधार पर भेदभाव होता है तो उसे शिकायत करने और सुरक्षा पाने का अधिकार क्यों नहीं है? यही नहीं नए नियमों में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ कारवाई करने का पुराना प्रावधान भी हटा दिया गया था। इसे लेकर भी विरोध हुआ। हालांकि नियमों में भेदभाव की एक अलग और व्यापक परिभाषा भी दी गई थी। जिसमें जाति के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ गलत व्यवहार को भेदभाव माना गया था। इन नियमों का विरोध सिर्फ सामान्य वर्ग की तरफ से नहीं हुआ। एससी और ओबीसी समुदाय के कुछ लोगों ने भी इन पर सवाल उठाए। उनका मानना था कि नियमों में कुछ बातें साफ नहीं है और इन्हें और बेहतर बनाने की जरूरत है। इस तरह कुछ नियमों के प्रावधानों पर सवाल उठे और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी। 5 नवंबर को इस मामले की कोर्ट में सुनवाई हुई। बार इन बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की बेंच को बताया कि सरकार चाहती है कि छात्रों की चिंताओं को दूर किया जाए और किसी भी वर्ग के छात्र को ऐसा ना लगे कि उसके साथ किसी तरह का कोई भेदभाव हो रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि सरकार को यूजीसी के इन नियमों पर दोबारा विचार करना चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आने वाली पीढ़ी के हर छात्र के हितों की रक्षा होनी चाहिए। नियम ऐसे होने चाहिए जिनसे किसी भी छात्र को डर या असंतोष महसूस ना हो। इससे पहले कोर्ट ने कहा था कि नियमों में कुछ बातें साफ नहीं है और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि क्या इन नियमों से एससी, एसटी और ओबीसी के सबसे पिछड़े वर्गों को पर्याप्त सुरक्षा मिल पाएगी? क्या हॉस्टल क्लासरूम और मेंटोरशिप ग्रुप में छात्रों को अलग-अलग रखने की व्यवस्था उनके बराबरी के अधिकार को प्रभावित कर सकती है? फिलहाल यूजीसी के 2026 के नए नियमों पर रुक जारी है। जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे फैसला नहीं लेता तब तक यूजीसी के 2012 वाले पुराने नियम लागू रहेंगे।