हैट्रिक तो ज़रूरी होता है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jul 23, 2021

शान बढ़ाऊ तैयारियां हो चुकी हैं। महा प्रबंधन, ऊपर से नीचे, दाएं से बाएं तक पूरा चौकस हो चुका है। लाखों स्वास्थ्य सेवा और मेवा केंद्र खुल चुके हैं। खाने पीने और दवाइयों का इंतजाम भरपूर है। जिन संस्थानों, हस्पतालों का शुभारम्भ रह गया था करवा लिया गया है। स्वास्थ्य घोषणाएं दोहराई, तिहराई जा रही हैं। लहर नंबर तीन से ज़ोरशोर से टकराने का संकल्प लिया जा चुका है। सख्त क़ानून साथ है यह दीगर बात है कि कुछ लोगों ने अनुशासन संभालने के लिए नई जेबें सिलवा ली हैं। अब तो उसे आना ही चाहिए। इतिहास रचा जाएगा कि हमारे देश में तीन बार आया था कहर। हमारे आंगन में एक बार फिर से आकर देखे तो सही कि स्वागत के लिए कितने सही तरीके से करोड़ों कमरें कस ली गई हैं।

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पहली लहर में एक मास्क ही लटकाया, संभवत किसी ने दो मास्क पहनने की सलाह भी नहीं दी थी। वो अलग किस्से हैं कि दो मास्क अभी भी लटकाए जा रहे हैं लेकिन यह सुनिश्चित है कि यदि कोरोनाजी की टीम के साथ तीसरा मैच हुआ तो तीन मास्क पहनने की सलाह दी जाएगी। वैसे भी ‘तीन’ का हमारे सांस्कृतिक जीवन में बहुत महत्व रहा है। जिन यशस्वी व अनुभवी दर्शकों को ‘क’ वर्ण से शुरू होने वाले सीरियल याद होंगे उन्हें यह भी याद होगा कि एक थप्पड़ की गूंज तीन बार दिखाई जाती थी। कई फ़िल्में तीसरी के नाम पर बनी हैं, तीसरी कसम, तीसरी मंजिल। शिवजी की तीसरी आंख के खुलने से कयामत आ जाने बारे सब जानते हैं। तीन बहुत महत्वपूर्ण है।


तीसरी बार हार्दिक स्वागत के लिए साफ़ सफाई उच्च कोटि पर विराजमान है। लगभग सभी फ्रंट लाइन योद्धाओं को सम्मानित कर लाखों संस्थाओं ने यश अर्जित कर लिया है। बाज़ार का कोना कोना इम्युनिटी बेच रहा है। नए बिस्तर व उपकरण प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कोई तो आए और उन्हें मेवा का मौक़ा दे। राजनीतिजी बेताब हैं कि अब तीसरी बार भी आना ही चाहिए ताकि ज़िंदगी बचाने का सुपरिचित आयोजन किया जाए। तीसरी लहर की बातें करते करते भाषण थक चुके हैं। उसका डर सबके भीतर ठीक उसी तरह से पैठ बना चुका है जैसे पहली और दूसरी बार हुआ था लेकिन सतर्कता हमें कभी अच्छी नहीं लगी। सतर्कता छोड़ने के मामले में हम बेहद सतर्क रहते हैं। तीसरी बार भी छोड़ने को बेकरार हैं।

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लापरवाही हमारा राष्ट्रीय पहनावा है। आशंकाएं लाख खतरा जताएं हम खुद मरने और दूसरों को मरवाने से कहां बाज आते हैं। हमें अनुशासन से नफरत, नफरत, नफरत है। हम भारत के लोग, स्वार्थों में डूबी स्वतंत्रता चाहते हैं। देश के अस्तित्व पर उगे संकट को जानते हैं लेकिन स्वीकृत नहीं करते। हमें फर्क न पड़ने का रुतबा हासिल है। ‘हमें क्या लेना?’, हमारा जीवन मूल्य है। कानून की सख्ती दिखाना और उसे तीन बार नहीं बार बार तोड़ना मजेदार है। काफी लोग तंग आ चुके हैं क्या उन्हें संसार से जाना चाहिए। यदि ऐसा है तो उनकी मदद होनी चाहिए। परिवर्तन के लिए ज़रूरी, लहर पर लहर आनी चाहिए। एक तरह से यह तीसरी बार सुधार की सहर मानी जाएगी। एक बार हैट्रिक पूरी हो जाए तो हम विजयी हो कहेंगे, हैट्रिक तो ज़रूरी होता है। 


- संतोष उत्सुक

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