स्वर्ग से नरक तक बना अमरीका (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Jun 20, 2020

शर्माजी आजकल बहुत दुखी हैं। वैसे कोरोना काल में दुखी तो सब हैं; पर उनका दुख जरा गहरा है। असल में उनका एक भतीजा पिछले 20 साल से अमरीका में है। उसने और बहू ने अमरीकी नागरिकता भी ले ली है। पति-पत्नी दोनों की नौकरी अच्छी है। मोटा वेतन मिलता है। वे भी खुश हैं और भारत में उनके माता-पिता भी।

भतीजे के आने पर वे अपने मित्रों के लिए एक ‘हाई टी पार्टी’ रखते थे। उसमें नाश्ते की तरह कम खाएं या भोजन की तरह भरपेट, ये आपकी इच्छा। खानपान और फोटोग्राफी के बाद पार्टी तो समाप्त हो जाती थी; पर एक महीने तक शर्माजी का ‘अमरीका राग’ चलता ही रहता था। हर मित्र और परिचित को वे उस दिन वाली एलबम जरूर दिखाते थे।

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शर्माजी मानते थे कि अमरीका धरती पर साक्षात स्वर्ग है। कश्मीर रहा होगा किसी समय; पर अब तो अमरीका ही है। वहां का मौसम, सफाई, अनुशासन, स्वास्थ्य प्रणाली, शिक्षा, भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण, लोकतंत्र, सबको समान अवसर, मजबूत डॉलर, धरती से आकाश तक पक्की सुरक्षा...और न जाने क्या-क्या ? उनके हावभाव से ये लगता था कि वे अगला जन्म अमरीका में ही लेना चाहते हैं।

पर अब उनकी धारणा बदल गयी है। अमरीका में कोरोना के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं; पर वहां के बड़बोले राष्ट्रपति ट्रंप सुधरने को तैयार नहीं हैं। उनके लिए दुनिया में भगवान के बाद वे ही हैं। इसलिए उनकी बात केवल अमरीका ही नहीं, पूरी दुनिया को माननी चाहिए। इस अहंकार ने मृतक संख्या को एक लाख से ऊपर पहुंचा दिया है; पर ट्रंप महोदय गोल्फ खेलने में व्यस्त हैं।

इस चक्कर में शर्माजी का भतीजा इस बार भारत नहीं आ सका। कोरोना के चक्कर में वहां लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं। उनकी बहू भी उनमें से एक है। अमरीका में जैसे मोटे वेतन हैं, वैसे भारी खर्चे भी हैं। अब खर्च तो बरकरार है; पर वेतन घट गया। इससे पूरा शर्मा परिवार बहुत दुखी है। शर्माजी के भाई की इच्छा है कि उनका बेटा और बहू अमरीका छोड़कर अब भारत ही आ जाएं। बहुत पैसा कमा लिया। अब यहीं कोई नौकरी या कारोबार कर लें। कम से कम सुख-दुख में पूरा परिवार साथ तो रहेगा; पर इसमें भी एक फच्चर है। बेटे और बहू ने अमरीकी नागरिकता ली है, अतः वे उसे छोड़ सकते हैं; पर बच्चों के जन्म से अमरीकी नागरिक होने के कारण यह काम कठिन है। जहां तक कोरोना की बात है, अब उन्हें अमरीका से अधिक सुरक्षित भारत लग रहा है।

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रही-सही कसर अश्वेत जार्ज फ्लायड की हत्या ने पूरी कर दी। एक गोरे पुलिस वाले ने जैसे उसका गला दबाया, उससे वहां फैले रंगभेद की कलई खुल गयी। असल में भेदभाव वहां सिर्फ कालों से ही नहीं, अधिकांश विदेशियों से भी होता है। यद्यपि भारतीयों ने वहां कई महत्वपूर्ण संस्थान संभाल रखे हैं। उनके बिना वहां काम नहीं चल सकता; पर अंदरखाने अमरीकी उनसे घृणा तो करते ही हैं। उन्हें लगता है कि ये हमारी नौकरियां छीन रहे हैं। इन्हें भी यहां से जाना चाहिए।

बस इसीलिए शर्माजी दुखी हैं। दुखी तो हम भी हैं, चूंकि इस बार ‘हाई टी पार्टी’ नहीं हुई। उनकी एलबम में हमारा एक ताजा फोटो लगने से रह गया। महीने भर चलने वाले शर्माजी के ‘अमरीका राग’ से भी हम वंचित हो गये। अब पिछले कुछ दिन से शर्माजी अमरीका को धरती का नरक बताने लगे हैं। जो चीजें पहले उन्हें अच्छी लगती थीं, अब उन्हें ही वे खराब कहते हैं। अब उन्हें न मजबूत डॉलर अच्छा लगता है और न ही वहां की शिक्षा, अनुशासन, स्वास्थ्य प्रणाली, भ्रष्टाचारहीनता, लोकतंत्र, समानता, सुरक्षा...आदि। उन्हें भारत से प्यार उमड़ आया है। वे फिर से इसी देश में जन्म लेना चाहते हैं।

आप चाहे जो कहें; पर कोरोना महामारी की इस उपलब्धि को भी नोट किया जाना चाहिए।

-विजय कुमार

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