Delhi में कड़े सुरक्षा पहरे के बीच Jantar Mantar प्रदर्शन, बंद रास्तों से परेशान रहे लोग

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 10, 2026

(शशि रंजन ठाकुर) नयी दिल्ली, 10 अक्टूबर गाजियाबाद में वैशाली स्थित अपने घर से बड़ा आशंकित होकर निकला था कि पता नहीं आज ऑफिस कैसे पहुंचा जाएगा। हमारा कार्यालय तो मुख्य प्रदर्शन स्थल जंतर मंतर के बेहद करीब ही स्थित है जहां कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन होना था। पूरी दिल्ली सुरक्षाकर्मियों के घेरे में थी और सुरक्षा की ऐसी चाकचौबंद व्यवस्था कि परिंदा भी पर न मार सके।

स्टेशन के प्रवेश और निकास द्वार बंद थे तथा समस्या थी कि बाहर कैसे निकला जाए। हम लोगों ने सुरक्षाकर्मियों से संपर्क किया और उन्हें अपने परिचय पत्र दिखाए कि हम लोग पीटीआई (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया) से हैं तथा हम लोगों का ऑफिस पंहुचना बहुत जरूरी है। पहले उन्होंने मना कर दिया, लेकिन बाद में उनकी मदद से ही हम सभी राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से बाहर निकले।

राजीव चौक से बाहर निकलते ही सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक असर साफ दिखने लगा। कनॉट प्लेस, संसद मार्ग, जंतर मंतर, जनपथ, टालस्टाय मार्ग, अशोक रोड, खड़ग सिंह मार्ग, पंचकुइयां रोड, मिंटो रोड, बाराखंभा रोड-जिधर देखो, भारी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात थे। जगह-जगह दंगा रोधी वाहन दिख रहे थे।

इसी गहमागहमी के बीच दिल्ली पुलिस का एक मानवीय चेहरा भी सामने आया, जिसने गर्मी और ऑफिस नहीं पहुंचने की परेशानी से जूझ रहे हम पत्रकारों को न केवल पानी पिलाया, बल्कि दफ्तर पहुंचने के लिए आगे जाने का रास्ता भी सुझाया। जब हम जनपथ बाजार से ससंद मार्ग की तरफ बढ़ने लगे तो वहां पुलिसकर्मियों ने हमें आगे जाने से रोक दिया और वापस जाने को कहा। हमारी परेशानी से सहानुभूति जताते हुए पुलिसकर्मियों ने टिप्पणी की कि देखो “कल से नवरात्र शुरू हो रहा है और आज बाजार बंद है।

लोगों का काफी नुकसान हुआ है… बेहद दुखद है।’’ उन्होंने हमारी ओर देखते हुए कहा ‘‘हम भी नहीं चाहते कि लोगों को परेशानी हो और बाजार बंद हों।’’ हमें लग रहा था कि दफ्तर ज्यादा दूर नहीं है लेकिन हर बैरिकेड पर पुलिसकर्मियों का लगभग एक ही जवाब मिलता कि ‘‘यह रास्ता बंद है, आपको इस तरफ से जाने की अनुमति नहीं मिलेगी।’’ राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के निकट तो एक पुलिसकर्मी ने कहा कि आज तो सभी कार्यालय बंद हैं, और संसद मार्ग पर ऐसा कौन सा ऑफिस है, जो आज खुला है, कोई कार्यालय खुला नहीं है। हम समझ गए कि इन्हें समझाना बेकार है। हम निराश होते उससे पहले जनपथ मार्ग पर एक पुलिसकर्मी से बातचीत हुई।

पुलिस अधिकारी ने हमारी परेशानी समझी, हम सभी के परिचय पत्र देखे, हमें पानी पिलाया और आगे जाने की अनुमति दे दी। अब तक रास्ता तलाशते-तलाशते करीब एक घंटा बीत चुका था। जब हम लोगों के परिचय पत्र और बैग की जांच की जा रही थी तो हमारे एक साथी ने पुलिसकर्मियों से कहा कि आप अपनी गाड़ी से ही हमें हमारे कार्यालय पहुंचा दें, तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि ‘‘हमारी गाड़ी में तो आप सीधे छत्रसाल स्टेडियम पंहुचेंगे।’’ उनकी इस टिप्पणी ने समस्या तो कम नहीं की पर कुछ देर के लिए तनाव जरूर कम किया।

नेहरू विहार से ऑटो से आ रहे हमारे एक अन्य साथी रविकांत का अनुभव और भी खराब रहा। जब वह नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के निकट पहुंचे, तो पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पहचान पत्र देखने के बावजूद उन्हें पैदल निकलने की भी अनुमति नहीं दी। जब उन्होंने कहा कि उनका ऑफिस जल्दी पहुंचना जरूरी है तो अधिकारी ने लगभग चेतावनी वाले अंदाज में कहा कि “अगर अधिक बहस करोगे, तो हम तुम्हें हिरासत में ले लेंगे।’’ रविकांत ने इस पर भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी से कहा कि आपको लगता है कि “मैं कोई अपराधी हूं या असामाजिक तत्व हूं, आप बैग, परिचय पत्र आदि की जांच कर लें” तो उन्होंने कहा कि “एक बार मैंने कह दिया कि बहस मत करो, हम इधर से जाने की अनुमति नहीं देंगे।’’ कुछ पुलिसकर्मियों ने बताया कि वे स्वयं दूर से आए हैं और उन्हें भी आगे की स्थिति की पूरी जानकारी नहीं है।

रास्तों को लेकर समस्या का सामना करने वाले एक बजुर्ग ने कहा, ‘‘सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक हो सकती है, लेकिन उसका उद्देश्य नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होना चाहिए। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें संवेदनशीलता व्यक्तिगत प्रयास तक सीमित न रहे, बल्कि पुलिस के समन्वय, यातायात प्रबंधन और सार्वजनिक सूचना व्यवस्था में भी दिखाई दे।

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