अतिवृष्टि से खुल गई देश के विकास की तस्वीर की पोल

By योगेंद्र योगी | Sep 09, 2025

देश के विकास की असली तस्वीर इस बार मानसून में दिल्ली में देखने को मिली है। देश की राजधानी बारिश और यमुना के जलस्तर बढऩे से हाल-बेहाल हो गई। राजधानी की जिंदगी पर ब्रेक लग गया। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि बारिश से देश के अन्य राज्य कितने हाल-बेहाल होंगे। यह समस्या नई नहीं है। देश में हर साल मानसून के दौरान लगभग सभी राज्यों में यही हाल होता है। विकास का वादा और दावा करने वाली सरकारें और राजनीतिक दल सिर्फ हवाई किले बना कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं। इसमें कोई भी दल पीछे नहीं हैं। ऐसे मौकों पर नेता गिरगिट की तरह रंग बदलने लगते हैं और जिम्मेदारी को पूववर्ती सरकारों के पाले में डाल कर बरी हो जाते हैं। बाढ़ और उसके जैसे हालात से साबित हो गया है कि नेताओं को देश के आम लोगों की जिन्दगी और मौत की फिक्र नहीं है। यह हालत हुई है देश में वोट बैंक की राजनीतिक के कारण। इसके कारण अतिक्रमण और प्रकृति से छेड़छाड़ की कीमत हर साल चुकानी पड़ रही है। यह समस्या विकराल होती जा रही है।   

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देश में बाढ़ के हालात को लेकर सरकारें नींद में गाफिल हैं। सुप्रीम कोर्ट सरकारों को जगाने का प्रयास कर रहा है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड समेत उत्तर भारत के कई राज्य बीते कुछ दिनों से बाढ़ की चपेट में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर भारत के बाढ़ प्रभावित राज्यों में अवैध पेड़ कटाई के प्रथम दृष्टया प्रमाण पर चिंता जताई है। कोर्ट ने पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की सरकारों को तीन सप्ताह में जवाब देने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान कहा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह ऊपरी पहाड़ी इलाकों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की अवैध कटाई का संकेत है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और के विनोद चंद्रन की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वे संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर इसके कारणों का पता लगाएं। गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों से उत्तर भारत के कई राज्यों में आसमान से आफत बरस रही है। फ्लैश फ्लड यानी बादल फटने की घटनाओं, भारी बारिश और लैंडस्लाइड जैसी आपदाओं में सैकड़ों जानें गई हैं। ये आफत थमने का नाम नहीं ले रही हैं। भारतीय मौसम विभाग ने चार राज्यों में फ्लैश फ्लड की चेतावनी जारी की है। इन राज्यों में उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं। अगस्त 2025 में उत्तर-पश्चिम भारत में 265 मिमी बारिश हुई, जो 2001 के बाद सबसे ज्यादा है। आईएमडी ने सितंबर में 109 प्रतिशत ज्यादा बारिश की चेतावनी दी है। अगस्त 2025 में उत्तर-पश्चिम भारत में वर्ष 2001 के बाद सबसे ज्यादा 265 मिमी बारिश हुई, जो रिकॉर्ड तोडऩे वाली है।   

भारतीय मौसम विभाग ने सितंबर 2025 के लिए सामान्य से 109 प्रतिशत ज्यादा बारिश की चेतावनी दी है, जिससे और तबाही का खतरा बढ़ गया है। अतिवृष्टि से हिमाचल प्रदेश में 320 मौतें, 788 सड़कें बंद, 2174 ट्रांसफॉर्मर डैमेज हुए। कुल 23 फ्लैश फ्लड, 19 क्लाउडबस्र्ट, 16 भूस्खलन हुए। उत्तराखंड में धराली, उत्तरकाशी में फ्लैश फ्लड हुआ। जम्मू-कश्मीर में वैष्णो देवी रूट पर भूस्खलन से 30 से अधिक मौतें और 20 लोग घायल हुए। जम्मू में तवी नदी का ब्रिज गिर गया। पंजाब में ब्यास, सतलुज, रावी उफान पर हैं। इससे 3 लाख एकड़ फसल बर्बाद हो चुकी है। पंजाब के 7 जिले बाढग़्रस्त हैं।   

अतिवृष्टि के मौजूदा हालात के लिए मौसम की मार नहीं बल्कि विकास की गलतियां जिम्मेदार हैं। मौसम पूर्वानुमान बेहतर हो रहा है, लेकिन चेतावनियों पर प्रतिक्रिया न देना बड़ी समस्या है। वेल डिफाइंड सिस्टम (जैसे चक्रवात) पर 2-4 दिन पहले अलर्ट संभव, लेकिन मेजोस्केल सिस्टम (10-100 किमी) में बादल 15 किमी ऊपर बनकर 1 घंटे में भारी बारिश कर देता है। रडार-सैटेलाइट से पता चलने पर सिर्फ 10-15 मिनट मिलते हैं। वक्त रहते चेतावनी के लिए ऑल वेदर कम्युनिकेशन सिस्टम, हैम रेडियो से कम्युनिटी रेडियो, स्थानीय ट्रेनिंग और ज्यादा रडार लगाने पड़ेंगे। बाढ़ जैसी प्राकृतिक कम और मानवजनित ज्यादा जैसी आपदा का प्रमुख कारण देश के विकास मॉडल का प्रकृति से खिलवाड़ करके बनाया जाना है। राजनीतिक दलों को इसकी परवाह नहीं है। दीर्घकालीन नीतियों के बाद अल्पकालीन नीतियों से विनाश हो रहा है। नीतियां बनाते वक्त दूरदर्शिता का इस्तेमाल नहीं किया गया। देश का एक भी राज्य ऐसा नहीं है जहां नदी-नालों के प्राकृतिक स्त्रोतों का अतिक्रमण नहीं किया गया हो। गंगा सहित देश की हर नदी आधुनिक विकास की नाकामियों से उपजे प्रदूषण की मार झेल रही हैं। सरकारी आकंडों में देश में वनों का विकास दर्शाया जाता है। इसके विपरीत जंगलों की कटाई का खेल जारी है।   

बर्बादी का यह आलम राजनीतिक दलों की स्वार्थ नीति से उत्पन्न हुआ है। सत्ताधारी दलों ने वोट बैंक की राजनीति में विकास की दौड़ को अंधा बना दिया है। जब कभी अदालतों के आदेश पर अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाए जाते हैं, तो नेता बीच में आ जाते हैं। यही वजह है कि देश में एक भी बड़ा शहर अतिक्रमण से अछूता नहीं रहा है। अतिक्रमियों ने नदियों, जंगल बल्कि पहाड़ों तक को नहीं छोड़ा है। देश के प्राकृतिक संसाधनों पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ अतिक्रमण और दूसरी तरफ अतिदोहन का सिलसिला थम नहीं रहा है। इसके अलावा शहरों के अनियोजित विकास ने हालत करेला और नीम चढ़ा जैसी कर दी है। आश्चर्य यह है कि इतना विनाश हर साल होने के बावजूद नेताओं की नींद नहीं खुल रही है। वोट बैंक के लिए बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जान-माल का होने वाला नुकसान अभी भी राजनीतिक दलों के एजेंडे से बाहर है। राजनीतिक दलों को शायद समझ तभी आएगी, जब देश के आम लोग सड़कों पर उतर कर विरोध करेंगे।

- योगेन्द्र योगी

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