By योगेश कुमार गोयल | Jul 28, 2026
पूरी दुनिया में मौसम के तेजी से बिगड़ते मिजाज के कारण विभिन्न देशों में प्रकृति की मार अब स्पष्ट नजर आने लगी है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही परिणाम है कि अब हर साल देश के कई हिस्से भारी बारिश के कारण बाढ़ की वजह से त्राहि-त्राहि करते नजर आते हैं जबकि कई हिस्से मानसून के दौरान भी पर्याप्त बारिश के लिए तरसते रह जाते हैं। इस वर्ष भी कुछ ऐसे ही हालात हैं। दुनिया के कई ठंडे इलाके अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण तपने लगे हैं तो कई सूखे इलाके बाढ़ से त्रस्त हैं, जंगल झुलस रहे हैं। बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन और मौसम चक्र में आते बदलाव के कारण पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियों के अलावा जीव-जंतुओं की कई प्रजातियों के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पर्यावरण के तेजी से बदलते इस दौर में वैश्विक स्तर पर लोगों का ध्यान इन समस्याओं की ओर आकृष्ट करने के लिए ही प्रतिवर्ष 28 जुलाई को ‘विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस’ मनाया जाता है, जिसके माध्यम से वातावरण में हो रहे व्यापक बदलावों के चलते लगातार विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही जीव जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। विश्वभर में आधुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को जागरूक करने के लिहाज से आज के समय में प्रकृति संरक्षण दिवस की महत्ता बढ़ गई है।
लॉकडाउन के दौर ने पूरी दुनिया को यह समझने का बेहतरीन अवसर दिया था कि इंसानी गतिविधियों के कारण ही प्रकृति का जिस बड़े पैमाने पर दोहन किया जाता रहा है, उसी के कारण स्वर्ग से भी सुंदर हमारी धरती कराहती रही है। प्रकृति मनुष्य को ऐसा न करने के लिए बार-बार किसी न किसी बड़ी आपदा के रूप में चेतावनियां भी देती रही है लेकिन उन चेतावनियों को सदा दरकिनार किया जाता रहा है। प्रकृति के साथ मानवीय छेड़छाड़ का ही नतीजा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में मौसम चक्र में बदलाव स्पष्ट दिखाई दिया है। वर्ष दर वर्ष अब जिस प्रकार मौसम के बिगड़ते मिजाज के चलते समय-समय पर तबाही देखने को मिल रही है, ऐसे में हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि मौसम चक्र के बदलाव के कारण प्रकृति संतुलन पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, उसकी अनदेखी के कितने भयावह परिणाम होंगे। प्रकृति बार-बार मौसम चक्र में बदलाव के संकेत, चेतावनी तथा संभलने का अवसर देती रही है लेकिन हम आदतन किसी बड़े खतरे के सामने आने तक ऐसे संकेतों या चेतावनियों को नजरअंदाज करते रहे हैं, जिसका नतीजा अक्सर भारी तबाही के रूप में सामने आता रहा है।
पिछले तीन दशकों से पर्यावरण प्रदूषण के कारण जिस प्रकार मौसम चक्र तीव्र गति से बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाओं का आकस्मिक सिलसिला तेज हुआ है, उसके बावजूद यदि हम नहीं संभलना चाहते तो इसमें भला प्रकृति का क्या दोष? प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर जो छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय में भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने विस्तार से यह बताया है कि किस प्रकार पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के चलते लोग अब तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं। हमारे जो पर्वतीय स्थान कुछ सालों पहले तक शांत और स्वच्छ वातावरण के कारण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित किया करते थे, आज वहां भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और ठंडे इलाकों के रूप में विख्यात पहाड़ भी तपने लगने हैं, वहां भी जल संकट गहराने लगा है। दरअसल पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन, सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरे जाने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे इन खूबसूरत पहाड़ों की ठंडक अब लगातार कम हो रही है। पहाड़ों में बढ़ती इसी गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें भी सुनने को मिलती रहती हैं। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब वर्ष दर वर्ष बढ़ रहा है।
हालांकि प्रकृति बार-बार अपना रौद्र रूप दिखाकर स्पष्ट चेतावनी देती रही है कि यदि उसके साथ अंधाधुंध खिलवाड़ बंद नहीं हुआ तो उसके घातक परिणाम होंगे लेकिन विड़म्बना है कि लगातार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखते रहने के बावजूद प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज कर दुनिया अपने विनाश को आमंत्रित कर रही है। दरअसल हम समझना ही नहीं चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम कंक्रीट के जो जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं है बल्कि विकास के नाम पर हम अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें बारम्बार चेतावनी देती रही है कि हम यदि इसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है। यदि हम अभी भी नहीं संभले और हमने प्रकृति से साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया तो हमें आने वाले समय में इसके खतरनाक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण विषयों के जानकार और ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के लेखक हैं)