बेबस, बेसुध, और बेमकसद (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jun 27, 2025

संतनगर का मुख्य चौक आज फिर सीना ताने खड़ा था, जैसे कह रहा हो—"बोल बेटा, अब किस नेता का भाषण झेलवाओगे?" चौक के चारों कोनों पर लगे लाउडस्पीकर ऐसे मुँह फाड़े पड़े थे जैसे उनके पेट में नाश्ते की जगह जनता की तालियों की भूख भरी हो। सामने मंच था, उस पर एक नेता जी धवल वस्त्र पहनकर ऐसे बैठे थे जैसे ताज पहनाकर किसी ने उन्हें गली के गेटमैन से राजमहल का राजा बना दिया हो। भीड़? अरे भीड़! नेता जी के चेहरे पर वही भाव था जो दूल्हा बारातियों के बगैर मंडप में बैठकर करता है—“पंडित जी, सिर्फ हवन करवा दो, फेरे घर जाकर ले लूँगा।”

नेता जी बोले—“हमने इस गाँव को चमका दिया! बिजली दी, पानी दिया, रोजगार दिया।” पास बैठे अफसर ने धीरे से टोका—“सर! ये गाँव तो दो किलोमीटर दूर है, यहाँ अभी न तो नाली है, न बिजली, न पानी।” नेता जी मुस्कराए—“भाई! राजनीति में दूर की सोच जरूरी है।” तालियाँ बजीं, क्योंकि स्कूल के बच्चों से बजवाई गई थीं। क्लास में ‘क्लैप’ के बाद ‘चुप’ सिखाया गया था, अब राजनीति ने सिखाया—‘पहले क्लैप, बाद में चुपचाप खिसको।’

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जब कोई नहीं आया, तो अफसरों ने स्कूलों की छुट्टी कर दी। मास्टरों से कहा—“आज लोकतंत्र को पास करवाना है।” मास्टर, जिनका लोकतंत्र से वही रिश्ता है जो दाल में पाए से होता है, अनमने होकर बैठे। एक शिक्षक बोले—“हम तो पढ़ाने आए थे, पंच बनने नहीं!” अफसर ने डपट दिया—“आज तुम पंच भी हो, पीठासीन भी, प्रस्तावक भी और तालियाँ भी बजाओगे।” इससे पहले कि मास्टर कोई विरोध करता, उसकी अनुपस्थिति में भी उपस्थिति भर दी गई।

तालियों की आवाजें गूँज रही थीं, पर दिलों की तन्हाई में सन्नाटा था। मंच पर प्रस्ताव रखे जा रहे थे—“गाँव में शौचालय निर्माण!” गाँव में कोई नहीं जानता था कि शौचालय क्या होता है, क्योंकि हरियाली ही उनका टॉयलेट था। लेकिन प्रस्ताव पास हुआ। “सर्वसम्मति से पास”—अर्थात सबने गर्दन झुकाई, क्योंकि उनकी रोज़ी मंच पर टँगी थी।

एक समय था जब भाषणों के लिए लोग दूर-दूर से आते थे, अब उन्हें देखकर लोग दूर-दूर भाग जाते हैं। नेता के भाषणों का हाल वैसा था जैसे बारिश के मौसम में छाते की दुकान—हर कोई देखता है, पर कोई खरीदता नहीं। नेता जी बोले—“हमें जन समर्थन मिला है।” भीड़ में खड़ा बच्चा बोला—“मुझे तो क्लास में गणित मिलना था, ये भाषण कैसे आ गया?” माँ-बाप हँसे, फिर रोए—“पढ़ाई गई राजनीति, राजनीति से पढ़ाई गई।”

उस दिन गाँव में अफसरों ने इतनी चतुराई से सबक सिखाया कि पंच न होते हुए भी पंचायत हो गई। स्कूल न होते हुए भी शिक्षा हो गई। और भाषण न होने के बावजूद तालियाँ हो गईं। गाँव के बुज़ुर्ग बोले—“ये लोकतंत्र है या लोकतमाशा?” नेता बोले—“तमाशा भी तो लोक का हिस्सा है।” और तालियाँ फिर से बजीं, क्योंकि अब तालियों के लिए पैसे बाँटे गए थे।

शाम को जब नेता जी वापसी के लिए गाड़ी में बैठे, तो पीछे से एक बच्चा चिल्लाया—“अंकल, आप हर बार आते हो, स्कूल क्यों बंद करवा देते हो?” नेता मुस्कराए, बोले—“बेटा! तुम्हें भाषण नहीं अच्छा लगता?” बच्चा बोला—“अच्छा लगता है पर तब, जब मम्मी टिफिन में पराठा देती है, और आप स्कूल बंद न करवाते।” नेता जी का दिल काँप गया। पहली बार किसी मासूम की आवाज़ से भाषण का लाउडस्पीकर फट गया। गाड़ी धीरे-धीरे चल पड़ी, और पीछे छोड़ गई एक स्कूल, जहाँ पढ़ाई का दरवाजा भाषणों के ताले से बंद था।

उस रात अफसर चैन से सो गए। नेता जी ने आत्मशांति के लिए रामायण पढ़ी। लेकिन स्कूल का बच्चा रोया, उसकी माँ रोई। किसी के घर चूल्हा नहीं जला, क्योंकि दिनभर स्कूल में बैठने के पैसे नहीं मिले थे। लोकतंत्र की डोरी भाषणों से ऐसे बँधी थी जैसे पतंग बिना डोर के आकाश में लहरा रही हो—बेबस, बेसुध, और बेमकसद।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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