जातिगत जनगणना सम्बन्धी कांग्रेस-भाजपा के सियासी दांव-पेचों को यूँ जानिए

By कमलेश पांडे | Aug 26, 2026

जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का भाजपा के खिलाफ मौजूदा हमला केवल “जाति गिनी जाए या नहीं” का सवाल नहीं है, बल्कि असली लड़ाई अब डेटा की विश्वसनीयता, सामाजिक न्याय की राजनीति और उससे बनने वाले नए राजनीतिक समीकरण की है। यही वजह है कि अगस्त 2026 में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मौजूदा जाति-जनगणना पद्धति पर आपत्ति जताई है। इसलिए जातिगत जनगणना सम्बन्धी कांग्रेस-भाजपा के सियासी दांव-पेचों को ऐसे जानिए।

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चाहे लालू प्रसाद हों या नीतीश कुमार, इन्होंने सबके लिए कम और अपनी जातियों और उससे पहले दोस्तों के लिए बहुत कुछ सोचा। इसलिए डेढ़-दो दशक बाद ही सही, लेकिन दोनों को सत्ता से बेदखल होना पड़ा। यही वजह है कि जब केंद्र सरकार ने पिछले साल जब जाति जनगणना कराने की तारीखों का ऐलान किया, तभी स्पष्ट था कि यह काम चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। देश की राजनीति में जाति हमेशा अहम रही है, लेकिन इसे निश्चित करना उतना ही मुश्किल। अभी जनगणना की प्रक्रिया शुरू ही हुई है और जाति की गणना दूसरे चरण में की जाएगी, लेकिन सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि जाति जनगणना में अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) का कॉलम नहीं है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आंकड़े जुटाने के सरकारी तरीकों पर भी अंगुली उठाई और कहा कि जाति जनगणना में जाति का कॉलम खुला रखकर एक सवाल छोड़ दिया गया है, यानी यहां सभी को अपनी जाति खुद लिखनी है। अब चूंकि देश के विभिन्न हिस्सों में एक ही जाति को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, तो आंकड़े उलझे हुए मिल सकते हैं। इससे कोई निष्कर्ष निकालना बहुत मुश्किल होगा।

वाकई, इस आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना में भी इसी फॉर्मेट का इस्तेमाल किया गया था। तब 46 लाख से ज्यादा जातियां, उपजातियां, उपनाम दर्ज हो गए थे। इन आंकड़ों में इतनी विसंगति थी कि सरकार ने इनको जारी ही नहीं किया। इसलिए कांग्रेस का ताजा सुझाव है कि लोगों पर छोड़ने के बजाय जातियों की पहले से एक तय सूची/लिस्ट होनी चाहिए। इससे एक जाति एक ही नाम से दर्ज होगी और स्पेलिंग की भी गलती नहीं होगी।

उल्लेखनीय है कि जाति जनगणना का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं है कि देश में कितनी जातियां और उनकी कितनी आबादी है, बल्कि यह जानना भी आवश्यक है कि अलग-अलग सामाजिक समूहों की वास्तविक स्थिति क्या है। अबतक असमानता दूर करने के लिए लागू की गई नीतियां कितनी कारगर रहीं और आगे उनमें किन बदलावों की दरकार है, इसकी सही तस्वीर जानने के लिए आंकड़ों की शुद्धता मायने रखती है। 

इसी से शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। और अगर किसी तरह का सवाल या संदेह है, तो उसे पहले ही दूर कर लिया जाना चाहिए। इसके लिए जो भी सुझाव आते हैं, उन पर विचार-विमर्श करने में हर्ज नहीं है। साथ ही, यह भी स्पष्ट रहना बहुत जरूरी है कि जुटाए गए आंकड़ों का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा। 

चूंकि जाति जनगणना का देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर गहरा असर पड़ने वाला है। इसलिए प्रक्रिया पूरी तरह भरोसेमंद और सवालों के परे होनी चाहिए। अब आइए सबसे पहले इस जातिगत जनगणना के लाभ-हानि को समझने की कोशिश करते हैं। 

# जातिगत जनगणना के संभावित फायदे इस प्रकार हैं:-

पहला, नीति पहली बार वास्तविक सामाजिक आंकड़ों पर टिक सकती है। किस जाति की कितनी आबादी है, उसकी शिक्षा, रोजगार, आय और सरकारी योजनाओं तक पहुंच कैसी है—इसका बेहतर आधार मिल सकता है। इससे कल्याणकारी योजनाओं को अधिक लक्षित किया जा सकता है।

दूसरा, आरक्षण पर बहस अधिक तथ्य आधारित हो सकती है। अभी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की वास्तविक जनसंख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। इसलिए विश्वसनीय आंकड़े मिलने पर प्रतिनिधित्व और आरक्षण की समीक्षा का आधार मजबूत हो सकता है।

तीसरा, “जिसकी जितनी संख्या...” राजनीति को आंकड़ों की परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। कांग्रेस लंबे समय से इसी तर्क को आगे बढ़ा रही है। लेकिन आंकड़े आने के बाद यह नारा भी चुनौती में बदल सकता है—क्योंकि हर जाति अपने वास्तविक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व का हिसाब मांगेगी।

# जातिगत जनगणना के संभावित नुकसान भी कम गंभीर नहीं होंगे

पहली बड़ी समस्या जाति की पहचान को स्थायी राजनीतिक पहचान बना देने का खतरा है। अगर आंकड़ों का इस्तेमाल केवल चुनावी टिकट, आरक्षण और वोट-बैंक की राजनीति के लिए हुआ तो सामाजिक विभाजन और तीखा हो सकता है।

दूसरी बड़ी समस्या डेटा की गुणवत्ता है। भारत में हजारों जातियां और उपजातियां हैं; एक ही समुदाय के अलग-अलग स्थानीय नाम और वर्तनी हैं। 2011 के सामाजिक-आर्थिक एवं जाति आंकड़ों में ऐसी तकनीकी समस्याओं का हवाला सरकार पहले भी दे चुकी है। 

इसलिए कांग्रेस की मौजूदा आपत्ति पूरी तरह खारिज करने लायक भी नहीं है। सवाल यह है कि जाति गिनने के बाद उसे सही ढंग से वर्गीकृत और सत्यापित कैसे किया जाएगा।

# फिर भाजपा पर कांग्रेस इतनी आक्रामक क्यों है?

यहीं इस विवाद का राजनीतिक अर्थ सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। चूंकि 2024 के बाद कांग्रेस ने “जाति जनगणना + सामाजिक न्याय + प्रतिनिधित्व” को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनाया। भाजपा ने अप्रैल 2025 में आगामी जनगणना में जाति को शामिल करने का निर्णय लिया और इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। अर्थात कांग्रेस की पुरानी मांग को स्वीकार करके भाजपा ने कांग्रेस का एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा अपने हाथ में ले लिया। 

इसलिए अब कांग्रेस की रणनीति है: “जाति जनगणना हुई तो सही, लेकिन ऐसी हो कि उसका आंकड़ा ही भरोसेमंद न रहे—तो इसका क्या फायदा?” यही कारण है कि कांग्रेस अब जनगणना कराने के फैसले का विरोध नहीं, बल्कि उसकी पद्धति पर हमला कर रही है। हालिया रिपोर्टों में कांग्रेस ने बिहार और तेलंगाना की तरह पूर्व-निर्धारित जाति सूची और बेहतर कोडिंग/सत्यापन की मांग की है। 

# भाजपा के लिए असली राजनीतिक चुनौती को ऐसे समझिए

भाजपा के सामने दिलचस्प स्थिति है। अगर जातिगत जनगणना से पता चलता है कि OBC आबादी और उसकी आंतरिक संरचना बहुत बड़ी है, तो OBC प्रतिनिधित्व और आरक्षण की मांग और मजबूत हो सकती है। लेकिन भाजपा के पास इसका दूसरा राजनीतिक रास्ता भी है—वह कह सकती है कि जाति की संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन गरीब, महिला, युवा, किसान और वंचित व्यक्ति की आर्थिक-सामाजिक स्थिति उससे भी महत्वपूर्ण है। यानी भाजपा की राजनीति “OBC पहचान” को व्यापक “गरीब/वंचित कल्याण” के नैरेटिव में समाहित करने की कोशिश कर सकती है।

# कांग्रेस के लिए भी यह दोधारी तलवार है

कांग्रेस यदि जातिगत जनगणना को अपनी बड़ी राजनीतिक जीत बनाती है, तो उसे आगे यह भी बताना पड़ेगा कि जाति के आंकड़े आने के बाद वह वास्तव में करेगी क्या? क्या आरक्षण की सीमा बदलेगी? क्या OBC के भीतर अति-पिछड़ों को अलग लाभ मिलेगा? क्या निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की मांग उठेगी? क्या आर्थिक पिछड़ेपन को भी समान महत्व मिलेगा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या जातिगत आंकड़ों के आधार पर संसाधनों का पुनर्वितरण होगा? इन सवालों का ठोस जवाब देना आसान नहीं होगा।

अलबत्ता, मेरी दृष्टि में असली मुद्दा यह है कि जातिगत जनगणना अपने-आप में न लाभ है, न नुकसान। उससे निकले आंकड़ों का इस्तेमाल किस नीति के लिए होता है, यही निर्णायक होगा। एक अच्छी व्यवस्था में: जाति की गणना - सामाजिक-आर्थिक स्थिति - शिक्षा/रोजगार - सरकारी प्रतिनिधित्व - योजनाओं का वास्तविक लाभ समयबद्ध समीक्षा, इन सभी को जोड़ना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण बात—जातिगत जनगणना को जातिगत संघर्ष की जनगणना नहीं, सामाजिक असमानता की वैज्ञानिक मैपिंग बनाना होगा। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस का भाजपा पर हमला राजनीतिक रूप से समझ में आता है, लेकिन भाजपा की ओर से उठाया गया “हमने तो जाति जनगणना कराने का निर्णय कर ही दिया” वाला पलटवार भी उतना ही प्रभावी हो सकता है। 

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कांग्रेस का वर्तमान हमला केवल जातिगत जनगणना के खिलाफ नहीं, बल्कि “कौन सही आंकड़ा देगा और उस आंकड़े की राजनीतिक व्याख्या कौन करेगा”—इस लड़ाई का हिस्सा है। आने वाले वर्षों में यही डेटा आरक्षण, परिसीमन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और OBC राजनीति की दिशा बदल सकता है। याद दिला दें कि कांग्रेस नेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि जाति खत्म होनी चाहिए, पर जब तक यह है तब तक जानना जरूरी है कि इससे प्रभावित लोगों की हालत वास्तव में कैसी है। 

लेकिन उनके अनुयायी कांग्रेसी राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, न्यायविदों और उद्योगपतियों ने, उनके नाम पर सियासत करने वाले समाजवादियों व राष्ट्रवादियों ने जाति गत पहचान को, इससे जुड़ी व्यवस्थाओं को खत्म तो नहीं ही किया, बल्कि ऐसी-ऐसी नीतियां बना डालीं जिससे कि यह व्यवस्था खूब फल फूल रही है और नेताओं के वोट बैंक बन चुकी है। एक ओर तो दो अलग-अलग जातियों के स्त्री-पुरूष के सहयोग से पैदा हुए वर्णसंकर बच्चे की जाति क्या होगी, स्पष्ट कानून नहीं है, जिससे यह जमात फल फूल रही है। वहीं, दूसरी ओर विभिन्न जातियों में आरक्षण वाली जो अंधी प्रतियोगिता पैदा हो गई, उसने जाति व्यवस्था को और अधिक मजबूती प्रदान कर दी। 

इससे अंतरजातीय/अंतर्धार्मिक विवाह को मिला प्रोत्साहन भी निरर्थक साबित हुआ। आलम यह है कि आज विभिन्न जातियों  के बीच गठबंधन बनाकर एक दूसरे को सियासी व सामाजिक मात देने की रणनीति बनने लगी है। दलितों, आदिवासियों और ओबीसीज के लोग एक दूसरे में शामिल होने की होड़ मचाये हुए हैं। वहीं, इनके लोग सत्तागत नाकामियों, और प्रशासनिक उदासीनता का सारा ठीकरा सामान्य यानी सवर्ण जातियों पर फोड़ देते हैं।

शायद इसलिए कि समाज का इंजन समझे जाने वाले सवर्ण लोगों ने भी ऐसी नीतियां नहीं बनवाई, जिससे सबको फायदा पहुंचे। उन्होंने ऐसे उपाय किए कि उनके राजनीतिक वंशवाद की तरह दलितों, आदिवासियों और ओबीसीज में भी परिवार विशेष को बढ़ावा मिला और पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का फायदा ऐसे लोग उठाते रहें। इससे उनके ही कोटि के अन्य लोग वंचित रह गए और सामाजिक न्याय व आरक्षण की नीति अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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