By अभिनय आकाश | Aug 20, 2026
दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल पर रोक लगाना या पाबंदी लगाना पॉलिसी का मामला है और इसे सरकार पर ही छोड़ देना बेहतर है। जस्टिस वी कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने एक जनहित याचिका (PIL) का निपटारा किया। इस याचिका में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट (CSAM) के प्रसार को रोकने के उपाय करने की मांग की गई थी। बेंच ने कहा कि केंद्र सरकार याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार करेगी और याचिकाकर्ताओं के सुझावों तथा सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज़ समेत सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करने के बाद उचित फैसला लेगी। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि वह इन मुद्दों पर सरकार के फ़ैसले के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं कर रहा है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि हालाँकि भारत में ऑनलाइन सुरक्षा, डेटा सुरक्षा और बच्चों की सुरक्षा से निपटने के लिए कई कानूनी प्रावधान हैं - जिनमें इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी रूल्स, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ़्रॉम सेक्सुअल ऑफ़ेंसेज़ (POCSO) एक्ट शामिल हैं - फिर भी ज़्यादा मज़बूत और व्यापक तरीके से लागू करने और सुरक्षा उपायों की ज़रूरत है।
PIL में माँगे गए उपायों में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को सीमित करने वाली बाध्यकारी गाइडलाइंस या कानून, उम्र की पुष्टि करने वाले मज़बूत सिस्टम, माता-पिता की सहमति की ज़रूरत और नाबालिगों को हानिकारक कंटेंट तक पहुँचने से रोकने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की ज़्यादा जवाबदेही शामिल थी।
याचिका में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और CSAM से जुड़े अदालती फ़ैसलों का भी हवाला दिया गया, साथ ही दूसरे देशों में हुए रेगुलेटरी बदलावों का भी ज़िक्र किया गया, जहाँ सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करने वाले नाबालिगों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं।