खोदा पहाड़ और निकली... (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Aug 19, 2019

दस दिन पहले शर्माजी के घर गया था, तो उनकी प्रसन्नता ऐसे छलक रही थी, जैसे उबलता हुआ दूध। उन्होंने चाय पिलाई और मिठाई भी खिलाई। लेकिन परसों फिर गया, तो लगा मानो दूध के उबलने से चूल्हा ही बुझ गया हो। दूध भी इतना उबला कि अब भगोने में कालिख के अलावा कुछ शेष नहीं था। शर्माजी का हाल ‘‘रोने की खबर लाये और मरते की खबर लेकर लौटे’’ जैसा हो गया था।

असल में कुछ दिन पहले की खबर ये थी कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में नये अध्यक्ष का निर्णय हो जाएगा। शर्माजी इससे बहुत खुश थे।

- वर्मा, अब देखो कांग्रेस के दिन बहुरने वाले हैं। जल्दी ही पार्टी जवान हो जाएगी और पहले जैसी रौनक लौट आएगी।

- आपको बधाई हो शर्माजी। ऐसी कोई क्रीम हो, जिससे चेहरे की रौनक वापस आ जाए, तो मुझे भी बताना। 

- बेकार की बात मत करो। बस ये समझ लो कि नया अध्यक्ष बनते ही कार्यकर्ताओं का जोश दोगुना हो जाएगा। और यह तो तुम्हें पता ही है कि हर पार्टी की सफलता का आधार उसके जुझारू कार्यकर्ता ही होते हैं। ये कार्यकर्ता ही आगे चलकर नेता बनते हैं।

- शर्माजी, आप जिस पार्टी की बात कर रहे हैं, वहां नेता कभी कार्यकर्ताओं के बीच से उभर कर नहीं आता। वह जन्मजात होता है। पिछले 50 साल का इतिहास तो यही है। 

- हमारी महान पार्टी की प्रगति तुमसे सही नहीं जा रही, इसलिए तुम ऐसा कह रहे हो।

- शर्माजी, जो हाल आपकी पार्टी का है, यदि वह प्रगति है, तो भगवान से प्रार्थना है कि कर्नाटक और गोवा के बाद म.प्र. और राजस्थान में भी आपकी पार्टी प्रगति करे। 

- तुम जले पर नमक मत डालो वर्मा। नया अध्यक्ष बनते ही सब ठीक होने लगेगा। राहुलजी ने साफ कह दिया है कि नया अध्यक्ष युवा होगा और उसके नाम के पीछे गांधी नहीं लगा होगा।

- शर्माजी, राहुल बाबा चाहे जो कहें; पर अध्यक्ष पद इसी परिवार में रहेगा।

- जी नहीं। पार्टी में कई युवा लोग हैं। उनमें से किसी को चुना जाएगा।

- और आप भी देख लेना। युवा को तो बिल्कुल नहीं चुना जाएगा। भला मैडम यह कैसे बर्दाश्त करेंगी कि कोई युवा नेता राहुल या प्रियंका से आगे निकल जाए। कोई मां अपने बच्चों के पेट पर लात लगते नहीं देख सकतीं। शर्माजी, इस परिवार को गलतफहमी है कि वे तो पैदा ही राज करने के लिए हुए हैं। अब देश का राज तो जनता ने छीन लिया, तो क्या पार्टी का राज भी छोड़ दें ? पार्टी की सम्पत्ति किसी और को नहीं दी जा सकती।

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और सचमुच पिछले दिनों ऐसा ही हुआ। कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष फिर सोनिया मैडम ही बन गयीं। यानि घर की दौलत घर में ही रही। इसी से शर्माजी दुखी हैं। कल मैं मिठाई लेकर रक्षाबंधन और स्वाधीनता दिवस की बधाई देने उनके घर गया, तो वे मलीन वस्त्रों में हताश होकर ऐसे बैठे थे, जैसे कैकेयी कोपभवन में बैठी हो। उन्होंने मिठाई की तरफ मुंह उठाकर भी नहीं देखा।

- शर्माजी, दुखी न हों। दिन सदा एक से नहीं रहते। व्यक्ति की तरह पार्टियों के जीवन में भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं।

- नहीं वर्मा, जब ढाई महीने की मगजमारी से कुछ नहीं निकला, तो अब आगे क्या होगा ? हमारी पार्टी की हालत तो ऐसी हो गयी है कि खोदा पहाड़ और निकली..।

वे आगे कुछ और बोलना चाहते थे; पर मैंने उनके मुंह पर हाथ रख दिया।

-विजय कुमार

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