By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Sep 26, 2023
हे मेंढ़कलाल! आपकी फुदकियों को शत-शत प्रणाम।
पिछले कुछ दिनों से देशभर के मोहल्लों में आपके कानफाड़ू भोंपुओं की कृपा से हमारे कान केवल आपको ही सुन पा रहे है। यही वह समय होता है जब जनता अपना मुँह और मेंढ़कलाल जैसे नेता अपने कान से दिव्यांग हो जाते हैं। यह दिव्यांगपन आगे चलकर हम जैसों पर शासन करने की चमत्कारिक शक्ति प्रदान करता है। आपके चुनावी वादों का कागजी रिम इतना भारी भरकम था जिसके डुबोने से समुद्र का पानी खाली हो जाता है। आपके नाम वाले बटन पर हमारी तर्जनी अंगुली की नीली स्याही उफान मारने में कोई कोताही न बरते इसके लिए हमारे बदन को मधुशाला का समुंदर बना डाला, जिसमें डूब तो सकते हैं, किंतु जी नहीं सकते।
हमने देखा कि जिस मेंढ़कलाल के पास खुद की खुजली खुजलाने भर की फर्सत नहीं थी, वे पिछले कई दिनों से हमें नहलाने, पोंछने, खिलाने, पिलाने और यहाँ तक कि हमारे सामने कत्थक करने के लिए भी उतारू हो गए। इतने उतारूपन को देखते हुए एक बार के लिए लगा कि क्यों न हम आपके मुँह पर थूक दें, लेकिन हमें हमारा वोटर धर्म याद आ गया। हम चाहकर भी यह नहीं कर सकते थे। बकरा केवल कसाई बदल सकता है, मौत नहीं। जब हमने आपके मेनिफेस्टो पर नजर डाली तो लगा कि आपने तो पृथ्वी ग्रह पर सारे ग्रह उतार डाले हों। कभी लगा ही नहीं कि आप धरती पर चुनाव लड़ रहे हैं। आप तो सारे ग्रहों को एक साथ जीतने के लिए जेब में सूरज जैसे बड़े-बड़े वायदे रूपी नक्षत्र लिए घूम रहे थे।
सबसे पहले आपका वह वादा पढ़ा जिसमें आपने बताया कि पहाड़ी पर समुंदर, नल से पानी के बजाय मधुशालाा बहाने और दिन को रात, रात को दिन करने की आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति अवश्य हमें भेड़ बनाकर छोड़ेगा। सच भी है कि जिसका जन्म शोषित होने के लिए हुआ हो उसे शोषण करने वाले के तलवे चाटना चाहिए। तभी महंगाई, बेरोजगारी, लाचारी में भी मेंढ़कलाल जैसों की सरकार मक्खन जैसी लगेगी।
- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,
(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)