आलूवादी नेता हर सरकार में जगह बना लेते हैं (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Apr 27, 2018

सिरदर्द के अनेक कारण होते हैं। कुछ आंतरिक होते हैं, तो कुछ बाहरी। पर मेरे सिरदर्द का एक कारण हमारे पड़ोस में रहने वाला एक चंचल और बुद्धिमान बालक चिंटू भी है। उसके मेरे घर आने का मतलब ही सिरदर्द है।

- तुम अभी छोटे हो। अभी से राजनीति और उसमें भी वाद के चक्कर में मत पड़ो।

- लेकिन हमारे स्कूल में परसों वाद-विवाद प्रतियोगिता है। उसमें बोलने के लिए यही विषय दिया गया है। 

- तो तुमने इस बारे में कुछ पढ़ा है ?

चिंटू ने समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद के बारे में मुझे वह सब कुछ बताया, जो उसकी किताबों में लिखा है। उसने एक-एक अक्षर मानो रट ही लिया था। 

- लेकिन बेटे चिंटू, ये सब किताबी परिभाषाएं हैं। अब इनके अर्थ और संदर्भ बदल गये हैं।

- इसीलिए तो मैं आपके पास आया हूं।

- लेकिन मैं जो परिभाषाएं बताऊंगा, उससे हो सकता है, तुम्हें प्रतियोगिता में कोई स्थान न मिले।

- कोई बात नहीं। आप तो नयी परिभाषाएं बताइये।

- देखो चिंटू, समाजवाद का अर्थ है, ‘नेता पहले, समाज बाद में।’ इसलिए समाजवादी सबसे पहले अपनी, फिर अपने परिवार की और फिर अपनी जाति-बिरादरी की चिन्ता करते हैं। इसके लिए चाहे घर टूटे या दल, इनकी बला से। इसलिए जितने समाजवादी नेता, उतने समाजवादी दल।  

- और साम्यवाद क्या होता है चाचा जी ?

- साम्यवादियों के माई बाप रूस और चीन में रहते हैं। भारत के साम्यवादी गरीबों की बात ज्यादा करते हैं। वे कहते हैं कि समाज में बराबरी होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए वे गरीबों को ऊपर उठाने की बजाय, अमीरों को नीचे गिराने का प्रयास करते हैं। हत्या, हिंसा और लूटपाट इनके प्रमुख साधन हैं। लूट के माल पर इनमें प्रायः झगड़ा हो जाता है। इसलिए साम्यवादियों के भारत में सैकड़ों गुट हैं। कभी वे जनता से लड़ते हैं, तो कभी सरकार से। और कोई न मिले, तो फिर एक-दूसरे को ही मारने लगते हैं।

- और पूंजीवाद क्या होता है चाचा जी ?

- पूंजी यानि धन और सम्पदा। इसलिए पूंजीवादी हमेशा पैसे के पीछे भागते रहते हैं। इनकी नीतियों का उद्देश्य होता है, पूंजी की वृद्धि। मजे की बात ये है कि अधिकांश राजनेता और दल ऊपर से तो पूंजीवाद का विरोध करते हैं; पर कुरसी मिलते ही वे अपनी पूंजी बढ़ाने लगते हैं।

- और राष्ट्रवाद ?

- राष्ट्रवादी लोग राष्ट्र को भगवान मानते हैं। उनकी नीतियों के केन्द्र में राष्ट्र और उसके नागरिक होते हैं। आजकल इन लोगों का बहुत जोर है। 

- क्या इनके अलावा कोई और वाद भी है ?

- हां, मेरी राय में एक प्रमुख वाद है आलूवाद।

- आलू तो सब्जी है चाचा जी। इसके नाम पर भी वाद ? 

- हां, पर ये पिछले कुछ सालों में ही बढ़ा है। जैसे आलू हर सब्जी में खप जाता है, ऐसे ही आलूवादी नेता भी हर सरकार में जगह बना लेते हैं। यदि सरकार बनने में कुछ लोग कम पड़ जाएं, तो इन राजनीतिक आलुओं के दाम रातोंरात बढ़ जाते हैं। ऐसे आलूवादी नेता हर राज्य में हैं। 

- तो इतने वादों के बीच देश चल कैसे रहा है चाचा जी ?

- चिंटू बेटे, देश किसी वाद से नहीं, बल्कि ‘वाद-विवाद’ से चल रहा है। संसद से लेकर सड़क तक, घर से लेकर बाजार तक, जहां देखो वहां बेसिर पैर के विवाद। 70 साल हो गये हमें आजाद हुए; पर हम अभी तक तय नहीं कर पाए हैं कि विकास का सही रास्ता क्या है ? इसलिए देश को अब वाद और विवाद की नहीं, विकासवाद की जरूरत है।

चिंटू तो छोटा है। उसकी समझ में शायद ये बात नहीं आयी होगी; पर काश ये बात हमारी, आपकी और देश के नेताओं की समझ में आ जाए। नेता और दल तो आते-जाते रहेंगे; पर देश तो अजर-अमर है। इसलिए वाद और विवाद छोड़कर सब विकासवाद का रास्ता पकड़ें, इसी में सबका कल्याण है।

-विजय कुमार

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