यूपी में हिन्दू वोटर नाराज न हो जाएं, इसलिए मुस्लिम सियासत से दूरी बना रही हैं पार्टियां!

By अजय कुमार | Oct 19, 2021

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। सत्तारुढ़ बीजेपी अपनी सत्ता को बरकरार रखने की जद्दोजहद कर रही है तो विपक्षी दलों के नेता सत्ता की चाबी अपने कब्जे में लाने को योगी सरकार के खिलाफ लगातार कौतुहल पैदा कर रहे हैं। सम्पूर्ण विपक्ष ने योगी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए मोर्चा खोल रखा है, लेकिन राजनीति के जानकार आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि क्यों विपक्षी दलों के नेता जनता के बीच अपना एजेंडा आगे बढ़ाने की बजाए बीजेपी द्वारा सेट किए गए एजेंडे पर ही आगे बढ़ रहे हैं। हालात यह हैं कि बीजेपी हिन्दू कार्ड खेल रही है तो विपक्ष भी हिन्दू-हिन्दू कर रहा है। बीजेपी नेता मंदिर-मंदिर परिक्रमा कर रहे हैं। हिन्दू धर्मगुरुओं की शरण में जा रहे हैं तो यही राह कांग्रेस और काफी हद तक समाजवादी पार्टी ने भी पकड़ रखी है। इस बार अल्पसंख्यकों के वोट पाने के लिए कोई नेता मुस्लिम धर्मगुरुओं की चौखट पर नहीं दिखाई दे रहा है। न ही मुस्लिम वोट बैंक को हथियाने के लिए अल्पसंख्यकों के सम्मेलन आयोजित कराए जा रहे हैं। इस बार नेतागण दरगाहों में चादर चढ़ाते भी नहीं दिखाई दे रहे हैं। गैर बीजेपी दलों के नेताओं की बेरूखी से सियासी मौसम में भी मुस्लिम उलेमाओं और धर्मगुरुओं की मांग काफी घट गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के नेता असद्दुदीन ओवैसी जरूर अपवाद हैं जो मुस्लिम वोटों की खुल कर सियासत करने में लगे हैं।

अबकी बार एक नया ट्रैंड यह भी देखने को मिला कि कांग्रेस-समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी तक ने नवरात्रों में ही अपने चुनावी सभाओं का शंखनाद किया है। प्रियंका गांधी से लेकर अखिलेश यादव, मायावती और जयंत चौधरी तक ने अपने चुनावी शंखनाद की शुरुआत नवरात्र के महीने से करके हिन्दू वोटरों को बड़ा संदेश देने की कोशिशें की हैं। सूबे में चुनावी मंच चाहे अखिलेश यादव का हो, प्रियंका गांधी का या फिर बसपा सुप्रीमो मायावती का, सभी मंचों पर प्रमुखता से जो मुस्लिम चेहरे या मुस्लिम प्रतीक पहले दिखाई देते थे, वो इस बार लगभग गायब हैं। प्रियंका गांधी मंच पर बाबा विश्वनाथ के चंदन के साथ हुंकार भरती हैं। भाषण की शुरुआत के पहले दुर्गा सप्तशती के मंत्र पढ़ती हैं। समाजवादी पार्टी के गठन से लेकर पिछले विधानसभा तक की चुनावी जनसभाओं और सपा के पोस्टरों में कई मुस्लिम चेहरे और मुस्लिम टोपी लगाए नेता नजर आते थे, लेकिन अब सब नदारद हो गया है। इस बार सपा नेताओं की तस्वीर हो या खुद नेता मौजूद हों मुस्लिम प्रतीक वाली टोपी नजर नहीं आती है। हिन्दू वोटरों के बीच गलत मैसेज न जाए इसलिए आजम खान जैसे पुराने समाजवादी नेता के पक्ष में खड़े होने से पार्टी परहेज कर रही है। ऐसा ही हाल कांग्रेस की सभाओं का भी है, कांग्रेस की सभाओं में भी मुसलमान तो दिखते हैं लेकिन वह अपनी मुस्लिम पहचान को बढ़ावा देने के चक्कर में नहीं रहते हैं।

मुस्लिम सियासत पर पैनी नजर रखने वाले कहते हैं कि यूपी में सपा, बसपा और कांग्रेस मुस्लिमों को वोट तो लेना चाहती हैं, लेकिन मुस्लिम लीडरशिप को आगे नहीं बढ़ने देना चाहती है। ये तथाकथित सेक्युलर दलों के चुनावी एजेंडे में भी इस बार मुस्लिम शामिल नहीं हैं। इसीलिए न तो मुस्लिमों के मुद्दे पर कोई बात कर रहा है और न ही मुस्लिम नेताओं को अपने साथ लेकर चल रहे हैं। उन्हें लगता है कि मुस्लिमों के साथ खड़े नजर आए तो हिंदू वोटर के छिटकने का डर रहता है। ऐसे में विपक्षी दल के एजेंडे से मुस्लिम सियासत घटती जा रही है। उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनाव के पहले तमाम पार्टियां मुस्लिमों के इर्द-गिर्द अपनी सियासत करती रहती थीं। मुस्लिम वोटों को साधने के लिए तमाम बड़े वादे करने के साथ-साथ मौलाना और उलेमाओं का भी सहारा पार्टियां लेती रही हैं, पर बीजेपी के सियासी पटल पर मजबूत होने के बाद मुस्लिम सियासत हाशिए पर खड़ी नजर आ रही है। असदुद्दीन ओवैसी जरूर मुस्लिम वोटों के सहारे सूबे में सियासी जमीन मजबूत करने में लगे हैं।

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गौरतलब है कि यूपी में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जो सूबे की कुल 143 सीटों पर अपना असर रखते हैं। इनमें से 75 सीटों पर मुस्लिम आबादी बीस से तीस फीसद के बीच है। 78 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान तीस फीसद से ज्यादा हैं। सूबे की करीब तीन दर्जन ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत दर्ज कर सकते हैं जबकि करीब 107 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मतदाता चुनावी नतीजों को खासा प्रभावित करते हैं। इनमें ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई वाले इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश की हैं। आजादी के बाद से नब्बे के दशक तक उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता कांग्रेस का परंपरागत वोटर माना जाता था, लेकिन राममंदिर आंदोलन के चलते मुस्लिम समुदाय कांग्रेस से दूर हुआ तो सबसे पहली पसंद मुलायम सिंह यादव के चलते सपा बनी और उसके बाद मुस्लिम समाज ने मायावती की बसपा को अहमियत दी। इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच मुस्लिम वोट बंटता रहा, लेकिन इस बार मुस्लिम सियासत पूरी तरह से हाशिये पर खिसकती नजर आ रही है।

-अजय कुमार

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