Pakistan और Bangladesh में हिंदू लहूलुहान हो रहे हैं और दुनिया खामोशी से तमाशा देख रही है

By नीरज कुमार दुबे | Jan 10, 2026

पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आई एक खबर ने पूरे दक्षिण एशिया की अंतरात्मा को झकझोर दिया है। एक गरीब हिंदू किसान को केवल इसलिए गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि उसने अपनी जमीन पर झोपड़ी बनाने का साहस कर लिया था। यह हत्या किसी अंधेरी गली में नहीं बल्कि खुले आम ताकत और दहशत के प्रदर्शन के रूप में हुई। मृतक किसान वर्षों से उसी जमीन पर रह रहा था, लेकिन स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने रसूख और हथियार के बल पर कानून को कुचल दिया। इस निर्मम हत्या के बाद सिंध के कई इलाकों में भारी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। सड़कों पर उतरे हजारों लोगों ने नारे लगाए, रास्ते जाम किए और इंसाफ की मांग की। यह आक्रोश केवल एक व्यक्ति की हत्या का नहीं बल्कि दशकों से दबे हुए भय और अपमान का विस्फोट था।

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पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों ही देशों से आ रही ये खबरें यह साफ करती हैं कि वहां हिंदू अल्पसंख्यक होना आज भी एक खतरे के साथ जीने जैसा है। यह केवल कानून व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि देश और समाज दोनों की नैतिक हार है।

देखा जाये तो सिंध के उस किसान की लाश और छत्तोग्राम की उस किशोरी का शव सिर्फ दो खबरें नहीं हैं। वे दक्षिण एशिया के उस आईने की तरह हैं जिसमें कट्टरता, असहिष्णुता और सत्ता के संरक्षण में पनपती हिंसा साफ दिखाई देती है। पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है। जबरन धर्म परिवर्तन, जमीन हड़पना, झूठे मुकदमे और अब खुलेआम हत्या। यह सब उस देश में हो रहा है जो खुद को इस्लामी गणराज्य कहता है और बराबरी का दावा करता है। सवाल यह है कि क्या वहां हिंदू की जान की कोई कीमत है?

बांग्लादेश की कहानी भी अब अलग नहीं रही। कभी जिसे धार्मिक सहिष्णुता का उदाहरण बताया जाता था, वही देश आज अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए असुरक्षित होता जा रहा है। एक के बाद एक हत्याएं, महिलाओं के साथ बर्बरता और प्रशासन की कमजोर प्रतिक्रिया यह बताती है कि समस्या केवल अपराधियों की नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी है।

सबसे चिंताजनक पहलू अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी है। मानवाधिकार की दुहाई देने वाले वैश्विक मंच, शक्तिशाली देश और संस्थाएं इन घटनाओं पर या तो औपचारिक बयान देकर चुप हो जाते हैं या पूरी तरह नजरें फेर लेते हैं। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है। यह दर्शाती है कि मानवाधिकार अब नैतिक मूल्य नहीं बल्कि सुविधा के अनुसार इस्तेमाल होने वाला हथियार बन चुके हैं। जहां आर्थिक हित, सामरिक समीकरण या राजनीतिक लाभ आड़े आते हैं, वहां इंसानी जान की कीमत शून्य हो जाती है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह चुप्पी पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों को और दुस्साहसी बनाती है। जब उन्हें पता होता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस दबाव नहीं बनेगा, तो अल्पसंख्यकों पर अत्याचार एक नियमित प्रक्रिया बन जाती है। वहीं भारत के लिए यह मुद्दा केवल भावनात्मक या धार्मिक नहीं है बल्कि रणनीतिक भी है। सीमापार अस्थिरता, कट्टरता और अल्पसंख्यकों का दमन क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित करता है। भारत को इस विषय पर स्पष्ट, कठोर और निरंतर रुख अपनाना होगा। केवल बयान देना पर्याप्त नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को बार बार उठाना होगा, तथ्यों के साथ और दबाव के साथ। कूटनीति में शिष्टता जरूरी है लेकिन अन्याय के सामने नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। भारत को यह भी साफ कहना होगा कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा किसी देश का आंतरिक मामला नहीं बल्कि सभ्य समाज की कसौटी है।

-नीरज कुमार दुबे

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