होलाष्टक लगते ही रूक जाते हैं सभी मांगलिक कार्य

By अजय कुमार | Mar 02, 2020

होली का नाम सुनते ही हम अपने चारों ओर रंग बिरंगे चेहरे, उल्लास, उमंग व खुशी से सराबोर लोग दिखाई देने लगते हैं। रंग बिरंगी होली से पहले दिन होलिका का दहन किया जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इतनी उमंग व उल्लास से भरे इस पर्व से आठ दिन पहले ही लोग शुभ कार्य क्यों नहीं करते? जी हां होली से ज्योतिष शास्त्र में होली से आठ दिन पूर्व शुभ कार्यों के करने की मनाही होती है। होली से पूर्व के इन आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। इस वर्ष होलाष्टक (03 मार्च) से शुरु हो रहा है जो कि होलिका दहन (09 मार्च 2019) के दिन तक रहेगा। 

होलाष्टक में दो शब्दों का योग है। होली और अष्टक यहां पर होलाष्टक का अर्थ है होली से पहले के आठ दिन। इन आठ दिनों में विवाह हो या ग्रह प्रवेश या फिर अन्य कोई भी ऐसा शुभ कार्य जिसे करने के लिये शुभ समय देखने की आवश्यकता आपको पड़ती है, नहीं किया जाता। मान्यता है कि हरिण्यकशिपु ने अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद को भगवद् भक्ति से हटाने और हरिण्यकशिपु को ही भगवान की तरह पूजने के लिये अनेक यातनाएं दी लेकिन जब किसी भी तरकीब से बात नहीं बनी तो होली से ठीक आठ दिन पहले उसने प्रह्लाद को मारने के प्रयास आरंभ कर दिये थे। लगातार आठ दिनों तक जब भगवान अपने भक्त की रक्षा करते रहे तो होलिका के अंत से यह सिलसिला थमा। इसलिये आज भी भक्त इन आठ दिनों को अशुभ मानते हैं। उनका यकीन है कि इन दिनों में शुभ कार्य करने से उनमें विघ्न बाधाएं आने की संभावनाएं अधिक रहती हैं।

वाराणसी के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार फागुन शुक्ल एकादशी तिथि पांच मार्च को सुबह 7.52 बजे लग रही है जो छह मार्च को सुबह 6.51 बजे तक रहेगी। काशी में रंगों की शुरूआत रंगभरी एकादशी से हो जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव गौरा पार्वती का गौना करा कर अपनी नगरी काशी ले आए थे। इससे पहले वसंत पंचमी पर तिलक व महाशिवरात्रि पर विवाह की रस्में निभाई गई थीं। काशी में इस दिन श्रीकाशी विश्वनाथ विश्वेश्वर का अबीर-गुलाल से विधिवत पूजन-अभिषेक किया जाता है।सायंकाल शिवालयों में माता पार्वती संग भगवान शिव की गुलाल-पुष्प से होली होती है  और होलिकोत्सव आरंभ हो जाता है। 

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होलाष्टक में शुभ कार्य न करने की ज्योतिषीय वजह भी बताई जाती है। ज्योतिषियों का कहना है कि इन दिनों में वातावरण में नेगेटिव एनर्जी काफी रहती है। होलाष्टक के अष्टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा तक अलग-अलग ग्रहों की नेगेटिविटी काफी बढ़ी रहती है। जिस कारण इन दिनों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है। इनमें अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चुतर्दशी को मंगल तो पूर्णिमा को राहु की ऊर्जा काफी नकारात्मक रहती है। इसी कारण यह भी कहा जाता है कि इन दिनों में जातकों के निर्णय लेने की क्षमता काफी कमजोर होती है जिससे वे कई बार गलत निर्णय भी कर लेते हैं जिससे हानि होती है।

होलाष्टक में भले ही शुभ कार्यों के करने की मनाही है लेकिन इन दिनों में अपने आराध्य देव की पूजा अर्चना कर सकते हैं। व्रत उपवास करने से भी आपको पुण्य फल मिलते हैं। इन दिनों में धर्म कर्म के कार्य, वस्त्र, अनाज व अपनी इच्छा के अनुसार जरुरतमंदों को धन का दान करने से भी आपको लाभ मिल सकता है। 

- अजय कुमार

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