होली फिर आ रही है, पूरे देश को नए परिवेश में खेलना सिखा रही है

By प्रभात कुमार | Mar 16, 2022

रघुबीरा, अवध में कई युगों से होली खेल रहे हैं और राजनीति की करवटें पूरे देश को नए परिवेश में होली खेलना सिखा रही हैं। अनंत प्रार्थनाओं के बावजूद कृष्ण जन्म लें, न लें, उनकी अनूठी होली के किस्से आज भी प्रचलित हैं। बरसाने की लट्ठ बरसाने वाली होली दुनिया भर से पर्यटक बुलाती रही है। वह अलग बात है कि रंग बनाने और बेचने वालों ने केमिकल के बहाने पैसा बनाना अभी भी बंद नहीं किया। बाज़ार का चरित्र चालाकी, धोखा आधारित लाभ पर आधारित होता है। पिछले दो बरस के कटू अनुभवों से प्रेरित होकर चतुर बाज़ार ने अनेक उत्पादों पर ‘प्राकृतिक’ लिखकर ग्राहकों को लुभाना जारी रखा है। सौन्दर्य प्रसाधन का बाज़ार हमेशा तैयार रहता है कि नए आकर्षक विज्ञापन का गुलाल फेंककर भक्तों को कैसे पटाया जाए। इस बार फिर अनेक लेख छपेंगे कि होली में गुलाल क्यूँ लगाते हैं, किस तरह से रंग लगाया जाए और कौन से उपायों से रंग छुड़ाया जाए। अच्छा गुलाल ढूँढने पर मिल तो जाएगा लेकिन वह उस पपीते की तरह होगा जिसके बारे में बताया जाएगा कि वृक्ष पर पकाया गया है लेकिन आशंका है मसाला लगाकर ही पकाया होगा और मीठा भी नहीं होगा। 

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होली भी कई पाटों में पिसते हुए दम तोड़ रही है। आम आदमी को राजनीतिक होली के रंगों से सराबोर किया जा रहा है उसे मुफ्त राशन खाने की नई आदतें विकसित की जा रही है जो उसकी मेहनत करने की आदत बिगाड़ रही है। यह तो त्यौहार हैं जिनकी आत्मा कई सुनियोजित हमलों के बावजूद अभी तक पूरी तरह बिदकी नहीं तभी जीवन में उत्सव और उल्लास जीवित रहता है नहीं तो उदास रहने के बहुतेरे बहाने हैं यहाँ। टेसू (पलाश) के फूल, करोड़ों कलियाँ वसंत का आंचल ओढ़ फूल बन चुकी हैं और ज़िंदगी में रौनक बढ़ा रही हैं, काली कोयल अपने सुरीले तराने तैयार कर रही है, आम की फुगनियों पर बौर निकलने को लालायित है और सरसों ने उम्र अख़्तियार कर ली है। होली फिर आ रही है। 

- प्रभात कुमार

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