Yes Milord: हाउसवाइफ को मिलेंगे ₹30,000 हर महीने? सुप्रीम कोर्ट के फैसले को समझें

By अभिनय आकाश | Jun 13, 2026

स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि राष्ट्र का निर्माण केवल पुरुषों से नहीं होता। महिलाओं का योगदान ही उसे स्थायित्व और संस्कार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वामी विवेकानंद के इस वाक्य को अपने शब्दों में परिभाषित किया। कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि महिलाएं हाउसवाइफ नहीं राष्ट्र निर्माता हैं। यानी देश के निर्माण में जितना योगदान आपके और हमारे जैसे नौकरी करने वाले लोगों का है उतना ही योगदान घर में काम करने वाली एक सामान्य गणी का भी है। सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना में घरेलू कामकाजी महिला की मौत और मुआवजे के मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि सड़क दुर्घटना में घरेलू कामकाजी महिला की मौत या कामकाज में अक्षम होने पर मुआवजे का निर्धारण अलग तरीके से होगा। मुआवजा तय करने में महिला की तरफ से परिवार को दी जाने वाली घरेलू देखभाल के नुकसान को भी आधार माना जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि घरेलू देखभाल का नुकसान मोटर दुर्घटना मामलों में अब मिलने वाली अन्य मुआवजों से अतिरिक्त होगा। सरल शब्दों में कहें तो देश की सबसे बड़ी कोर्ट ने अब गणियों के श्रम को भी मुआवजे का आधार माना है। केस 25 नवंबर 2001 को सिरसा के फतेहाबाद में हुए एक हादसे से जुड़ा था। हादसे में महिला की मौत हो गई। उनके तीन बच्चे थे। परिवार को मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल से 2 लाख का मुआवजा उसको मिला। बीमा कंपनी ने मुआवजे की गणना में उसके घरेलू कार्य का मूल्य शून्य माना। असंतुष्ट परिवार हाईकोर्ट। सितंबर 2024 में पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर ₹8,43,000 कर दिया। परिवार ने मुआवजा बढ़ाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने महिला के घरेलू योगदान को ध्यान में रखते हुए कुल मुआवजा 62,77,900 तय किया। 

कामकाजी महिला पर भी लागू होगा... कोई महिला नौकरी के साथ घर संभालती है। हादसे में मृत्यु पर मुआवजा तय करते समय 'लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर' का घटक उसकी आय में अतिरिक्त जुड़ेगा। होममेकर हो सकते हैं। इसे मान्यता मिलनी चाहिए। हालांकि, 30 हजार रुपए मासिक का मानक अभी महिलाओं तक सीमित रहेगा। 

जीडीपी में 17% तक योगदान... कोर्ट ने कहा, महिलाओं के घरेलू कार्यों का जीडीपी में 17% तक योगदान आंका जाता है। 15 से 59 साल की महिलाएं रोज 7 घंटे से अधिक अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं। 

न्याय के लिए 15 से 18 साल तक इंतजार... मुआवजा केस वर्षों लंबित रहने पर कोर्ट ने ध्यान दिया। 120 से अधिक मामलों के विश्लेषण में पाया कि हाई कोर्ट में ऐसे मामले औसतन 8 साल और ट्रिब्यूनलों में 6 साल लंबित रहते हैं। कई मामलों में पीड़ितों को न्याय के लिए 15 से 18 वर्ष तक इंतजार करना पड़ा। कोर्ट ने कहा कि ये पेंडेंसी न्यायसंगत और उचित मुआवजे की अवधारणा को कमजोर करती है। 

अर्थव्यवस्था में भागीदारी

श्रम बल की गणना करते हुए अधिकतर यह पक्ष नजरअंदाज हो जाता है। विकसित देशों की तुलना में भारत की महिला श्रम भागीदारी दर (LFPR) कम होने की एक वजह यह भी है। 2025 की जुलाई-सितंबर तिमाही में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 33.7% थी। पिछली तिमाही के मुकाबले इसमें मामूली बढ़त दर्ज की गई थी, पर विकसित देशों से तुलना करने पर भारत अब भी पीछे दिखता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने जब घरेलू काम की कीमत को मापने का एक पैमाना दिया है, तो उम्मीद है कि देश की अर्थव्यवस्था में होममेकर्स का योगदान भी आधिकारिक रूप से दर्ज होगा। 

नीतियों में जगह 

अदालत ने पहले भी कहा है कि महिलाओं की घरेलू सेवाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। उनके काम का एक निश्चित आर्थिक मूल्य होता है। ताजा फैसले से आधी आबादी के योगदान को लेकर अधिक स्पष्टता आती है। जरूरत है कि समाज भी इस बात को समझे। नीतियां बनाते समय होममेकर्स का भी ध्यान रखा जाए।

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