कैसे Crypto बना ब्लैक मनी का नया ठिकाना, नियमों की कमी ने बनाया बॉर्डर पार वाले Gateway वाला सफर सुहाना

By अभिनय आकाश | Nov 17, 2025

क्रिप्टोकरेंसी का प्रचलन वर्ष 2009 में हुआ था और भारत में इसकी पहुंच 2010 से शुरू हुई। लेकिन आरबीआई की ओर से अभी भी इसमें निवेश को कानूनी जामा नहीं पहनाया गया। क्रिप्टोकरेंसी के संबंध में मुख्य समस्या यह है कि भारतीयों में इसके तकनीकी पक्ष की कोई जानकारी नहीं है। डर्टी मनी यानी काले धन को बॉर्डर पार ले जाने के लिए क्रिप्टो एक नया गेटवे और हब बन चुकी है। वहीं अब न्यू यॉर्क टाइम्स, सुड्डॉश्चे त्साइटुंग, ले मोंडे और मलेशियाकिनी जैसे बड़े नामों सहित 113 पत्रकारों ने 10 महीनों तक चली एक संयुक्त जांच में दिखाया है कि दुनिया भर के क्रिप्टो एक्सचेंजों ने एक ऐसी छाया अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है जहाँ अवैध लेनदेन पहले से कहीं ज्यादा आसानी से हो रहे हैं। पिछले 9 सालों में क्रिप्टो एक्सचेंजों पर कम से कम 5.8 अरब डॉलर के जुर्माने और दंड लगाए गए हैं। यह बताता है कि यह समानांतर वित्तीय दुनिया कितनी बड़ी और कितनी अपारदर्शी बन चुकी हैवही दुनिया, जो कभी मुख्य रूप से टैक्स हेवन्स में सिमटी होती थी।

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क्रिप्टो और इसके ग्लोबल रिस्क

क्रिप्टो एक ऐसा शब्द जो सुना तो सबने है लेकिन तकनीक की दुनिया का नया पैसा है क्या भला ये कम ही लोग जानते हैं। जिन्होंने इस खेल में पैसा बनाया उन्हें देखकर उन्हें देखकर क्रिप्टो की दुनिया में एक अंधी दौड़ शुरू हो गई। रोज नई डिजिटल करेंसी लॉन्च होती है और रोज क्रिप्टो की परिभाषा में एक नया पहलू जुड़ जाता है। जानकारी की अति अब जानकारी का आभाव बन गई है। हालांकि दुनिया में क्रिप्टो के नियम अभी भी एक जैसे नहीं हैं। जापान, सिंगापुर और यूरोपीय संघ जैसे कुछ देश सख्त नियम और लाइसेंसिंग मांगते हैं, लेकिन कई जगहों पर निगरानी काफी कमजोर है। इस वजह से एक आम समस्या पैदा हो गई हैजहाँ नियम कड़े नहीं हैं, वहाँ से पैसा आसानी से फिसलकर दूसरे देशों में चला जाता है। यह वही पैटर्न है जैसा ICIJ की जांचों में पारंपरिक ऑफ़शोर फाइनेंस में देखा गया था। रैंसमवेयर समूह, ड्रग सिंडिकेट, साइबर-धोखाधड़ी नेटवर्क और प्रतिबंधों से बचने वाले लोग इसकी गति और गुमनामी के कारण क्रिप्टो को तेज़ी से पसंद कर रहे हैं। धन मिनटों में वॉलेट, एक्सचेंज और "मिक्सर" के बीच से गुज़र सकता है, और अक्सर उन क्षेत्रों में गायब हो जाता है जहाँ विनियमन सबसे कमज़ोर है। भारत का अनुभव इस वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाता है।

भारत में क्रिप्टो को लेकर नियमों की कमी

खुदरा निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद, सरकार क्रिप्टो को लेकर अभी भी बहुत सतर्क है। अधिकारियों के अनुसार, मुश्किल यह है कि अगर सरकार क्रिप्टो को नियमों में बांधती है, तो इसे क्रिप्टो का समर्थन माना जा सकता है। इससे और ज्यादा लोग इस ऐसी परिसंपत्ति में निवेश कर सकते हैं, जिसे अस्थिर और जोखिमपूर्ण माना जाता है। अभी के लिए, वित्त मंत्रालय सिर्फ एक “चर्चा पत्र” तैयार कर रहा है। यह बस शुरुआती स्तर की पड़ताल हैकोई ठोस नीति या नियमों का मसौदा नहीं। एजेंसियों को एक अजीब समस्या का सामना करना पड़ रहा हैवे ज़ब्त की गई क्रिप्टो को आखिर कहाँ रखें। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, एक बड़ी जांच एजेंसी ने करीब 40 लाख डॉलर की डिजिटल संपत्ति फिलहाल एक निजी कस्टडी और वॉलेट कंपनी के पास रखी है, क्योंकि कोई सरकारी व्यवस्था मौजूद नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय सुरक्षित भंडारण के लिए गृह मंत्रालय से स्पष्ट दिशानिर्देशों का इंतज़ार कर रहा है। लाखों भारतीय जो अपनी बचत क्रिप्टो में लगा रहे हैं, उनके लिए यह नियामक खालीपन बड़ी समस्या है। अगर कभी कोई क्रिप्टो एक्सचेंज निकासी रोक दे या अचानक बंद हो जाए, तो उनके पास मदद लेने के लिए कोई रास्ता नहीं है।

इंडस्ट्री पर बढ़ता दबाव

भारतीय क्रिप्टो एक्सचेंजों का कहना है कि नियमों की अनिश्चितता उनके कामकाज को सीधे प्रभावित कर रही है। इसके उलट, भारत के बाहर के ऑफशोर प्लेटफॉर्म बिना किसी रुकावट के भारतीय उपयोगकर्ताओं को सेवाएँ देते जा रहे हैं। कर व्यवस्था भी उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैहर लेनदेन पर 1% टीडीएस और 30% पूंजीगत लाभ कर। उद्योग के प्रतिनिधियों ने सरकार को बताया है कि इन नीतियों ने पूरे सेक्टर को “अस्थिर” बना दिया है। अप्रैल 2022 से जुलाई 2023 के बीच भारतीय एक्सचेंजों पर ट्रेडिंग वॉल्यूम में 97% की गिरावट आई, और लगभग ₹35,000 करोड़ के लेनदेन ऑफशोर प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो गए।

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