हिंदवी स्वराज्य की नींव रखने वाले छत्रपति क्यों अपनी मौत के 400 साल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने वक्त में हुआ करते थे

By अभिनय आकाश | Feb 19, 2026

1658 का साल जब औरंगजेब ने बादशाह बनने के लिए अपने पिता शाहजहां को आगरा के किले में कैद करवाया। अपने भाई मुराद को धोखे से मरवाया दूसरे भाई दारा शिको का सर कलम करके खुद को आलमगीर की उपाधि से नवाजा। । गद्दी पर बैठने के 5 साल के अंदर-अंदर उसने अपना साम्राज्य विस्तार कर लिया था और उसकी सीमाएं उत्तर में लद्दाख तक उत्तर पश्चिम में काबुल कंधार तक, पूर्व में बंगाल तक, पश्चिम में गुजरात, सिंध और राजपूताना तक फैल चुकी थी। लेकिन दक्षिण में कुछ ऐसा था जो उसके सारे मंसूबों पर पानी फेर रहा था। जो शख्स इस मराठा सेना का नेतृत्व कर रहा था वो कोई और नहीं बल्कि मुगलों की जुबान में वो पहाड़ी चूहा था जिसकी छापेमार गोरिल्ला युद्ध नीति बड़ी से बड़ी फौज को भी परास्त कर सकती थी। और जिसकी वजह से औरंगजेब कभी दिल्ली में काबिज होकर भी चैन की नींद नहीं सो पाया था। मुगलिया सल्तनत के लिए वो एक पहाड़ी चूहा हो सकता है लेकिन वो असल में मराठों का शेर था। आज बात शिवाजी की करेंगे जिन्होंने ता उम्र मुगलों से लोहा लिया और वक्त के साथ खुद को छत्रपति शिवाजी महाराज के रूप में स्थापित किया। हिंदुत्व को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचाया जहां से इस शब्द के नए मायने तलाशे गए और जो अपनी मौत के 400 साल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने वो अपने वक्त में हुआ करते थे।

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धोखा देकर शिवाजी को मारने वाला था अफज़ल

अफजल खान बीजापुर के सबसे ताकतवर कमांडर में से एक थे। 7 फुट का विशालकाय अफजल खान अब तक एक भी जंग नहीं हारा था। भोंसले परिवार के साथ उसकी पुरानी अदावत थी। शिवाजी के बड़े भाई संबाजी की मौत में बड़ा रोल था। बीजापुर के बुलावे पर वो दक्कन से लौटकर वो शिवाजी से जंग लड़ने पहुंचा। उसके पास 20 हजार घुड़सवार, 15 हजार पैदल सैनिक, 100 तोपें और कई हाथी थे। शिवाजी का सामना अब तक इतनी बड़ी सेना से नहीं हुआ था। उन्हें इल्म था कि सीधी लड़ाई में हार की संभावना ज्यादा है। शिवाजी सेना सहित प्रतापगढ़ के किले में घुस गए। शिवाजी को उकसाने के लिए अफजल खान ने मंदिरों और आसपास के गांवों पर हमला किया। फिर अफजल खान ने संधि के लिए संदेशा भेजा। वादा किया कि संधि होने पर बीजापुर को उनके हिस्से का इलाका देने की बात भी कही। शिवाजी ने मुलाकात की पेशकश स्वीकार कर ली। प्रतापगढ़ किले के नीचे मिलने और फौज लेकर कोई नहीं आने की बात तय हुई। लेकिन अफजल ने गांव के आसपास अपनी सेना को तैनात कर दिया। शिवाजी ने भी अपनी सेना से तैयार रहने को कहा। 

स्वराज्य और नौसेना का महत्व

विदेशी आक्रांताओं से आजादी की दृष्टि से फोर्स बनाने का काम शुरू किया गया। उन्होंने कोकण तट पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया और 4 मई के अपने नए विचार के साथ स्वाभाविक रूप से नौसेना के बारे में सोचा जब उनका विस्तारित साम्राज्य समुद्र की सीमा से लगी शक्ति के संपर्क में आया। नौसेना को प्रोत्साहन आर्थिक के बजाय राजनीतिक था। शुरुआत में कोकण तट अंग्रेजी, पुर्तगाली और डचों से प्रभावित था। इन विदेशी शत्रुओं को रोकने और उन्हें अपनी मातृभूमि से उखाड़ फेंकने के लिए नौसेना आवश्यक थी। मराठा नौसेना के गठन का यही प्रत्यक्ष कारण था। 

शिवाजी की समाधि कहाँ स्थित है?

1680 में शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद रायगढ़ के किले में उनका अंतिम संस्कार किया गया। बाद में वहां उनकी एक समाधि बनाई गई। हालांकि शिवाजी की मृत्यु के तुरंत बाद समाधि की उपस्थिति का विवरण देने वाला कोई समकालीन रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन कहा जाता है कि एक दशक के अंतराल के बाद किले पर मुगलों का कब्जा हो गया और 1689 से 1733 तक उनके नियंत्रण में रहा। मराठों ने 1733 में किले पर पुनः कब्ज़ा कर लिया और यह 1818 तक उनके नियंत्रण में रहा, जब तक की ब्रिटिश सेना ने आक्रमण नहीं किया था। कहा जाता है कि किले पर कब्जे के दौरान अंग्रेजों ने लगातार गोलाबारी की, जिससे समाधि सहित अंदर की कई संरचनाओं को नुकसान पहुंचा। 

ब्रिटिश रिकॉर्ड में क्या कहा गया? 

ऐसे दावे किए जाने हैं कि पेशवा शासन के तहत समाधी पहले से ही अच्छी स्थिति में नहीं थी। बाद में ब्रिटिश शासन के तहत और अधिक खंडहर हो गई। लेखक जेम्स डगलस ने अपनी 1883 की पुस्तक ए बुक ऑफ बॉम्बे में किले की अपनी यात्रा का वर्णन करते हुए कहा कि अब किसी को भी शिवाजी की परवाह नहीं है। डगलस ने किले और समाधि की उपेक्षा के बारे में बाद के मराठा शासकों से भी सवाल किया। 

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