By सुखी भारती | Apr 02, 2026
याज्ञवल्क्यजी अत्यंत मधुर और भावपूर्ण स्वर में श्रीरामकथा का वर्णन करते हुए महर्षि भरद्वाज को आनन्दित कर रहे हैं। भरद्वाज मुनि प्रभु के विविध अवतारों की दिव्य लीलाओं को एकाग्रचित्त होकर श्रवण कर रहे हैं। नारद प्रसंग के उपरांत याज्ञवल्क्यजी मनु और शतरूपा के महान तप तथा उस तप से प्राप्त दिव्य वरदान की कथा सुनाते हैं।
मनु ने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य का संचालन किया। वे सामान्य मनुष्यों की भाँति जीवन के सुख-दुःख का अनुभव करते हुए वृद्धावस्था को प्राप्त हुए, परंतु उनके मन को कहीं भी स्थिरता प्राप्त न हुई। अंततः उनके भीतर वैराग्य जाग्रत हुआ। उन्होंने अपने पुत्र को राज्य सौंपकर, पत्नी सहित वनगमन का निश्चय किया।
नैमिषारण्य और गोमती के पावन तटों से होते हुए वे अनेक संत-महात्माओं के आश्रमों में पहुँचते रहे। निरंतर कठोर तप और वन के कष्ट भी उनके संकल्प को विचलित न कर सके। उनके हृदय में एक ही व्याकुलता थी—कहीं यह नश्वर जीवन प्रभु के दर्शन के बिना ही व्यर्थ न बीत जाए।
धीरे-धीरे उनकी तपस्या और भी कठोर होती गई। उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल जल का सेवन किया, फिर वायु पर जीवन यापन किया, और अंततः वायु का भी त्याग कर एक पैर पर खड़े रहकर कठोर तप में लीन हो गए। उनकी इस अद्वितीय तपस्या को देखकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अनेक बार उनके समीप आए और विभिन्न प्रकार से उनकी परीक्षा ली, किंतु वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित न हुए।
उनकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर अंततः आकाशवाणी हुई—“वर मांगो।”
प्रभु की वाणी सुनते ही उनका क्षीण शरीर पुनः तेजस्वी और पुष्ट हो उठा। अत्यंत भावविभोर होकर मनु ने विनम्र वाणी में कहा—
“हे प्रभु! जिनका निरंतर वेदों द्वारा गुणगान किया जाता है, जिनके सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों का मुनिजन ध्यान करते हैं, हम उन आपके दिव्य रूप का साक्षात् दर्शन करना चाहते हैं। कृपा कर हमारे इस दुःख का निवारण कीजिए।”
उनकी सरल और निष्कपट प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान ने अपना मनोहर स्वरूप प्रकट किया। उनका श्यामवर्ण शरीर नीलकमल, नीलमणि और मेघ के समान सौम्य एवं मनोहर था। उनके रूप की छटा देखकर असंख्य कामदेव भी लज्जित हो जाएँ। उनका मुख शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान शीतल और प्रसन्न था। अधरों की लाली, दाँतों की उज्ज्वलता और मधुर मुस्कान अद्वितीय शोभा बिखेर रही थी।
प्रभु ने स्नेहपूर्वक कहा—“हे मनु! मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ। जो भी इच्छा हो, निःसंकोच वर मांगो।”
मनु ने विनम्रता से उत्तर दिया—“प्रभु! आपके दर्शन से अब कोई इच्छा शेष नहीं रही। तथापि एक अभिलाषा है—मुझे आपके समान एक पुत्र प्राप्त हो।”
भगवान मुस्कराए और बोले—“हे मनु! मेरे समान कोई दूसरा नहीं है, अतः मैं स्वयं तुम्हारे यहाँ पुत्र रूप में अवतार ग्रहण करूँगा।”
यह सुनकर मनु और शतरूपा अत्यंत प्रसन्न हुए। शतरूपा ने भी प्रभु से अटूट भक्ति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम का वरदान माँगा। प्रभु ने दोनों को इच्छित वर प्रदान कर अंतर्धान हो गए।
कुछ समय पश्चात मनु और शतरूपा ने अपने शरीर का त्याग किया। अगले जन्म में वे त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के रूप में अवतरित हुए, जहाँ स्वयं प्रभु श्रीराम ने उनके पुत्र रूप में प्रकट होकर अपनी दिव्य नरलीला की।
।।श्रीराम।।
- सुखी भारती