चुनाव प्रचार के दौरान राहुल के आरोप कितने सही कितने गलत

By अभिनय आकाश | May 22, 2019

गली-गली में शोर है... कैमरा भीड़ की तरफ मुड़ता है और कोलाहल ध्वनि में आवाज फूट पड़ती है "चौकीदार चोर है" जगह थी उत्तर प्रदेश की अमेठी, राहुल गांधी की अमेठी, राजीव गांधी की अमेठी और अब आरोपों की अमेठी। ढीले-ढाले सफेद कुर्ते और जीन्स में अलग-अलग भाव-भंगिमा के साथ अपने मनमाफ़िक जवाब को सुनकर मंद-मंद मुस्कान लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आरोपों की वैतरणी के सहारे चुनावी नैया पार करने के लिए अगले सियासी सफ़र पर निकल पड़ते हैं। तीखे तेवर और चुटीले अंदाज़ में कांग्रेस अध्यक्ष और देश के 48 वर्षीय ऊर्जावान युवा नेता राहुल गांधी पूरे चुनाव, रैली दर रैली रोड शो दर रोड शो एक सूत्री कार्यक्रम पर चले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा और करारा हमला। वो उनका मज़ाक उड़ाते, उन्हें नाकाम बताते, भ्रष्टाचारी बताते रहे और देश को उनसे मुक्ति दिलाने की बात करते रहे। कांग्रेस अध्यक्ष ने पूरे चुनाव मोदी सरकार पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ा चाहे वो राफेल डील का मामला हो या जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताना हो या नोटबन्दी को देश का सबसे बड़ा घोटाला। तो आइए डालते है इन आरोपों पर एक नज़र की राहुल के आरोप वास्तविकता की कसौटी पर कितने खड़े उतरते हैं?

मोदी की जीएसटी बनाम राहुल का गब्बर सिंह टैक्स

भाजपा जिस जीएसटी को गुड एंड सिंपल टैक्स ठहराते हुए इसे अपनी उपलब्धि बता रही थी वहीं राहुल गांधी हर सभा, हर रैली में जीएसटी को नाकाम बताने की कोशिश में लगे रहे। राहुल ने जीएसटी का नया मतलब देश को बताते हुए उसे गब्बर सिंह टैक्स की संज्ञा दी। राहुल गांधी ने कहा कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो ‘गब्बर सिंह टैक्स’ की जगह रियल जीएसटी लागू होगा, जिसमें छोटे कारोबारियों को बड़ी पाहत और छूट दी जाएगी। हालांकि देश में नई सरकार की सियासी संभावनाओं पर तस्वीर अभी साफ नहीं हुई है, लेकिन उद्योग जगत में आशंका जताई जा रही है कि ऐसे बयानों से आम व्यापारियों में गलत संदेश जाएगा, जिसका असर जीएसटी के मौजूदा संग्रह पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने तो यहां तक कह दिया कि जीएसटी में ज्यादा बदलाव की गुंजाइश नहीं है, लेकिन इस दिशा में कोई भी पहल कारोबार जगत में भारी उथल-पुथल मचा सकती है। खैर ये तो हो गयी राजनीतिक संभावनाओं पर बात लेकिन अगर जीएसटी को वास्तविकता की कसौटी पर परखने की कोशिश करे तो राहुल जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बता रहे है लेकिन सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो अप्रैल माह में जीएसटी से 1.13 लाख करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर कर संग्रहित किया गया है। यह लगातार दूसरा महीना रहा है, जब जीएसटी प्राप्ति एक लाख करोड़ रुपए से अधिक रही है।

ये तो हुई बात आंकड़ों की लेकिन मार्च 2019 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जीएसटी काउंसिल को हिंदू बिजनेस लाइन चेंजमेकर ऑफ द ईयर अवॉर्ड दिया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बतौर जीएसटी काउंसिल के चेयरमैन इस अवॉर्ड को रिसीव किया था। देशभर में एक टैक्स लागू करने, उपभोक्ताओं पर टैक्स का बोझ कम करने और टैक्सेशन के नियम आसान बनाने के लिए जीएसटी काउंसिल को यह अवॉर्ड दिया गया है। थोड़ा इससे पहले जाएं तो साल 2017 में जब विपक्ष नोटबंदी को संगठित लूट व गुड्स एंड सर्विस टैक्स यानि जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताया था तब अमेरिकन रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की रेटिंग बढ़ा दी थी। यानि जिसे विपक्ष गब्बर सिंह कह रहे थे वह असल में ठाकुर और नोटबंदी और जीएसटी देश की अर्थव्यवस्था के जय और वीरू बनकर उभरे थे। मूडीज एक ग्लोबल रेटिंग एजेंसी है जिसने रेटिंग देने की शुरुआत वर्ष 1909 में की थी। इसका मकसद निवेशकों को एक ग्रेड देना है ताकि बाज़ार में उनकी साख बन सके। यह रेटिंग निवेशकों को किसी भी देश में निवेश करने से जुड़े हुए खतरे बताती है। जीएसटी की क्रियान्वयन को लेकर कुछ चीज़े हो सकती है जिसे समझने में व्यापारियों को थोड़ी बहुत जटिलता हुई लेकिन राहुल ने पूरी प्रणाली पर ही सवाल उठाते हुए अर्थव्यवस्था का विलेन घोषित कर दिया।

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राफेल को भाजपा का बोफोर्स बनाने की कोशिश

नरेंद्र मोदी उद्योगपतियों के चौकीदार है, राफेल डील में गड़बड़ी हुई है। भ्रष्टाचार हुआ है जैसे आरोप लगाते-लगाते राहुल गांधी ने इसमें सुप्रीम कोर्ट को भी घसीटते हुए कह दिया की कोर्ट ने भी कह दिया चौकीदार चोर है। नतीजतन मामला न्यायालय की अवमानना का बना और फिर राहुल कोर्ट से कहते दिखे 'हमसे भूल हो गई हमको माफी दे दो'। लेकिन जिस राफेल के बहाने राहुल राजनीतिक उड़ान भर रहे है और बीते बरस से अपनी राजनीति के पैंतरे तय किये, पीएम को झूठा, फरेबी और बेईमान बताने से भी नहीं चूक रहे, बोफोर्स के समानांतर राफेल को लाने की कवायद कर रहे हैं उसका धरातल पर कितना असर है।

कुछ महीने पहले इंडिया टुडे-एक्सिस के आये सर्वे में पाया गया कि देश के 70 फीसदी लोगों को राफेल डील के बारे में जानकारी ही नहीं है। 30 फीसदी लोगों ने कहा कि वे राफेल डील के बारे में जानकारी रखते हैं। देश के ग्रामीण इलाकों में ज्यादा लोग राफेल के बारे में नहीं जानते। बोफोर्स और राफेल के बीच एक खास अंतर है। बोफोर्स से अलग, राफेल के बारे में हर पक्ष इस बात पर सहमत है कि यह सबसे अच्छे लड़ाकू विमान का सौदा है क्योंकि इसका चुनाव कांग्रेस ने किया था। राफेल मामले में आरोप है कि मोदी सरकार 126 की जगह सिर्फ 36 विमान खरीद रही है। बोफोर्स मामले में वीपी सिंह स्पष्ट शब्दों में कहते थे कि जब सेना के जवानों ने पहली बार बोफोर्स दागा तो इसने बैक फायर किया और अपने ही कई जवानों की जान ले ली। राफेल के बारे में ऐसा कोई नहीं कह सकता। 30 साल पहले एक जटिल रक्षा सौदे को करिश्माई शैली और अंदाज में आम-जनमानस से रूबरू करवाया था।

वीपी सिंह ने गांव, गलियों और मैदान तक की यात्रा कर गले में गमछा लपेट हुए एक राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह प्रचार किया। वे गांव के लोगों से सरल सा सवाल पूछते थे। क्या आपको अंदाजा है कि राजीव गांधी ने आपके घर में सेंध लगा दी है? फिर वे अपने कुर्ते की जेब से एक माचिस निकालते थे और लोगों को दिखाते थे हुए कहते थे जब आप अपनी बीड़ी, हुक्का या चूल्हा जलाने के लिए चार आने की माचिस खरीदते हैं तो एक चौथाई टैक्स के रूप में सरकार को जाता है। सरकार इस पैसे से स्कूल, अस्पताल, सड़क और नहर बनाती है और सेना के लिए हथियार खरीदती है। यह आपका पैसा है। अगर कोई सेना के लिए हथियार खरीदने के नाम पर इसका कुछ हिस्सा चुरा ले तो क्या यह आपके घर में सेंध लगाना नहीं है? लेकिन राफेल अब तक कहीं भी वैसी खबर बन सका है जैसा बोफोर्स बना था कम से कम देश के नागरिकों के लिए खासकर ग्रामीण इलाकों में तो बिल्कुल भी नहीं।

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अब आरोपों के स्टाक राइटिंग की घंटी बज चुकी है, पर्चा लिया जा चुका है और अंक पत्र जनता के हाथों में जा चुका है। नेताओं के चुनावी इम्तिहान की घड़ी ईवीएम पर जा टिकी है। ऐसे में धारणाओं के इस युद्ध में राहुल गांधी की पार्टी जीतती है या आरोपों की कचहरी से निकल कर प्रधानमंत्री, भावी प्रधानमंत्री और निरंतर प्रधानमंत्री जैसे विशेषणों के तिराहे में खड़ें मोदी मूर्धन्य की तरह स्थापित होते हैं!

- अभिनय आकाश

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