By नीरज कुमार दुबे | Mar 16, 2026
21वीं सदी की वैश्विक राजनीति का केंद्र तेजी से इंडो पैसेफिक क्षेत्र बनता जा रहा है। हम आपको बता दें कि यह वही भू क्षेत्र है जहां विश्व की लगभग 65 प्रतिशत आबादी रहती है, वैश्विक सकल उत्पादन का लगभग 62 प्रतिशत हिस्सा उत्पन्न होता है और दुनिया के करीब आधे समुद्री व्यापार का संचालन होता है। ऐसे रणनीतिक और आर्थिक महत्व वाले क्षेत्र में भारत की भूमिका पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। यह केवल संयोग नहीं बल्कि भारतीय विदेश नीति की दूरदर्शिता, संतुलन और आक्रामक कूटनीति का परिणाम है।
हम आपको बता दें कि इंडो पैसेफिक में भारत की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र वैश्विक समुद्री व्यापार की जीवन रेखा है। विश्व के प्रमुख समुद्री मार्ग इसी क्षेत्र से होकर गुजरते हैं। भारत के कुल विदेशी व्यापार का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा समुद्री मार्गों से संचालित होता है। इस कारण हिंद महासागर की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की स्थिरता भारत के लिए केवल रणनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि आर्थिक आवश्यकता भी है। भारत ने इसी दृष्टि से अपनी विदेश नीति को समुद्री शक्ति, समुद्री संपर्क और समुद्री सहयोग से जोड़ा है।
भारत की भौगोलिक स्थिति भी उसे इस क्षेत्र में स्वाभाविक शक्ति बनाती है। भारत हिंद महासागर के मध्य में स्थित है और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के निकट है। यह वही मार्ग है जिससे एशिया, अफ्रीका और यूरोप के बीच भारी मात्रा में व्यापारिक जहाज गुजरते हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित द्वीपों और समुद्री मार्गों की निगरानी करने की क्षमता भारत को इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका प्रदान करती है।
वैसे इंडो पैसेफिक में भारत की भूमिका के बढ़ने का एक बड़ा कारण चीन की बढ़ती आक्रामकता भी है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सैन्य और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार किया है। बंदरगाह निर्माण, समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और ऋण आधारित अवसंरचना परियोजनाओं के माध्यम से चीन ने इस क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया है। इस परिस्थिति में अनेक देशों ने भारत को संतुलन स्थापित करने वाली शक्ति के रूप में देखा है।
यही कारण है कि जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों ने भारत के साथ रणनीतिक सहयोग को मजबूत किया है। क्वॉड सुरक्षा संवाद जैसे मंचों के माध्यम से समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला सुरक्षा, प्रौद्योगिकी सहयोग और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में व्यापक सहयोग विकसित हुआ है। इससे भारत की सामरिक और कूटनीतिक क्षमता दोनों में वृद्धि हुई है।
भारतीय विदेश नीति की सफलता इस बात में भी दिखाई देती है कि भारत ने इंडो पैसेफिक को केवल सैन्य दृष्टिकोण से नहीं देखा बल्कि उसे आर्थिक और विकासात्मक सहयोग के मंच के रूप में भी विकसित किया। भारत ने आसियान देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है। एक्ट ईस्ट नीति के माध्यम से दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ व्यापार, निवेश और संपर्क के नए मार्ग विकसित किए गए हैं।
इसके अलावा, भारत ने क्षेत्रीय संगठनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। हिंद महासागर रिम संघ, बिमस्टेक और अन्य बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से भारत समुद्री सहयोग, व्यापार और संपर्क को बढ़ावा दे रहा है। इन मंचों के माध्यम से भारत क्षेत्रीय विकास और सामूहिक सुरक्षा की नीति को आगे बढ़ा रहा है।
साथ ही समुद्री अवसंरचना के क्षेत्र में भी भारत ने बड़े स्तर पर निवेश शुरू किया है। सागरमाला कार्यक्रम के अंतर्गत देश के बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, समुद्री परिवहन का विस्तार और तटीय आर्थिक क्षेत्रों का विकास किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत लगभग एक सौ बीस अरब डॉलर के निवेश की योजना बनाई गई है। इसके अलावा भारत ने दीर्घकालिक दृष्टि से समुद्री क्षेत्र के विकास के लिए विशाल निवेश योजनाएं तैयार की हैं जिनका उद्देश्य भारत को वैश्विक समुद्री शक्ति बनाना है।
इसके अलावा, भारत की नौसैनिक क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री निगरानी, मानवीय सहायता, आपदा राहत और समुद्री सुरक्षा अभियानों में भारत सक्रिय भूमिका निभा रहा है। अनेक अवसरों पर भारत ने संकट के समय पड़ोसी देशों की सहायता कर यह साबित किया है कि वह जिम्मेदार नेतृत्व भी प्रदान कर सकता है।
देखा जाये तो इंडो पैसेफिक के संदर्भ में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी संतुलित और समावेशी कूटनीति है। भारत किसी सैन्य गुट की राजनीति को बढ़ावा देने की बजाय मुक्त, खुले और समावेशी इंडो पैसेफिक की अवधारणा का समर्थन करता है। इस दृष्टिकोण में सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन केंद्रीय तत्व है।
आज स्थिति यह है कि इंडो पैसेफिक की किसी भी रणनीतिक चर्चा में भारत को नजरअंदाज करना संभव नहीं रहा है। वैश्विक शक्तियां भारत को इस क्षेत्र की स्थिरता और संतुलन का अनिवार्य स्तंभ मानने लगी हैं। यह परिवर्तन भारत की विदेश नीति की निर्णायक सफलता को दर्शाता है।
बहरहाल, यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इंडो पैसेफिक में भारत की बढ़ती भूमिका एक नए वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है। समुद्री शक्ति, आर्थिक क्षमता, सक्रिय कूटनीति और रणनीतिक साझेदारियों के संयोजन ने भारत को इस क्षेत्र की केंद्रीय शक्ति बना दिया है। आने वाले वर्षों में जब वैश्विक राजनीति का केंद्र और अधिक तेजी से इंडो पैसेफिक की ओर स्थानांतरित होगा, तब इस कहानी के केंद्र में भारत की भूमिका और भी निर्णायक होती दिखाई देगी।
-नीरज कुमार दुबे