कालापानी पर नेपाल के दावे में कितना दम, जानें पूरे मामले का सच

By अभिनय आकाश | Jan 06, 2020

भारत का नया मानचित्र आने के बाद से ही नेपाल में सियासत तेज है। नेपाल कालापानी बॉर्डर के मुद्दे पर भारत से बात करना चाहता है। नेपाली पीएम ने बीते दिनों एक बयान देते हुए कहा कि कालापानी नेपाल, भारत और तिब्बत के बीच का ट्रिजंक्शन है और यहां से भारत को तत्काल अपने सैनिक हटा लेने चाहिए। भारत सरकार ने जोर देकर कहा कि जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद जारी किए गए भारत के नए राजनीतिक नक्शे में सीमाओं का सही चित्रण किया गया है। नए नक्शे में नेपाल के साथ लगी हमारी सीमा में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है। 

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भारत और नेपाल दोनों ‘कालापानी’ को अपना अभिन्न अंग कहते हैं। भारत कहता रहा है कि ‘कालापानी’ उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले का भाग है। उधर नेपाल दावा करता रहा है कि कालापानी उसके दार्चुला ज़िले का हिस्सा है। यह क्षेत्र 1962 से इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस के पास है। 

नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच सुगौली समझौता साल 1816 में हुआ था। इसमें कालापानी इलाके से होकर बहने वाली महाकाली नदी भारत-नेपाल की सीमा मानी गई है। हालांकि, सर्वे करने वाले ब्रिटिश ऑफिसर ने बाद में नदी का उद्गम स्थल भी चिह्नित कर दिया था जिसमें कई स्थलों पर सहायक नदियां भी मिलती हैं। नेपाल का दावा है कि विवादित क्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र से गुजरने वाली जलधारा ही वास्तविक नदी है, इसलिए कालापानी नेपाल के इलाके में आता है। वहीं, भारत नदी का अलग उद्गम स्थल बताते हुए इस पर अपना दावा करता है।

भारत ने काफी पहले ही कालापानी को भारत का अंग बनाते हुए उसे अपने नए नक़्शे में जगह दी थी। घटना ने न सिर्फ नेपाल सरकार बल्कि स्थानीय लोगों तक को प्रभावित किया था जिसके बाद जमीन के अधिकार को लेकर नेपाल में प्रदर्शन तेज हो गया था। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के बाद भारत ने नया नक्शा जारी किया था। जारी हुए इस नक़्शे में भारत ने न सिर्फ कालापानी बल्कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान और कुछ हिस्सों को शामिल पूरे विश्व को अपनी शक्ति का अहसास कराया था।

दरअसल, कालापानी इलाके का लिपुलेख दर्रा चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिहाजे से बेहद महत्वपूर्ण है। 1962 से ही कालापानी पर भारत की इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस की पहरेदारी है। इस लिहाजे से कालापानी भारत के लिए बेहद ही महत्वपूर्ण है। 1962 युद्ध के दौरान भारतीय सेना यहां पर थी। इस क्षेत्र में चीन ने भी बहुत हमले नहीं किए थे क्योंकि भारतीय सेना यहां मजबूत स्थिति में थी। इस युद्ध के बाद जब भारत ने वहां अपनी पोस्ट बनाई, तो नेपाल का कोई विरोध नहीं था। ये अलग बात है कि उस वक्त भारत और नेपाल के संबंध भी अब जैसे तनावपूर्ण नहीं थे। भारत का डर ये है कि अगर वो इस पोस्ट को छोड़ता है, तो हो सकता है चीन वहां धमक जाए और इस स्थिति में भारत को सिर्फ नुकसान हासिल होगा। इन्हीं बातों के मद्देनज़र भारत इस पोस्ट को छोड़ना नहीं चाहता है। लेकिन नेपाल में जैसे-जैसे मधेश का मुद्दा बढ़ता गया, नेपाल में ऐंटी-इंडिया भावनाएं बढ़ीं और नेपाल ने इस मसले को और जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया।

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जहां तक इस इलाके के इतिहास की बात है तो मूल तौर पर कालापानी नेपाल के पश्चिमी सीमाई इलाके में आता है। 1815 में जब ब्रिटिश सेनाओं का युद्ध गोरखाओं से हुआ था तो उन्होंने ये इलाका जीत लिया था। इसके बाद ये भारतीय भूमि का हिस्सा बन गया था। उस समय ब्रिटिश सरकार और नेपाल के बीच संधि हुई, जिसमें नेपाल के महाराजा ने ये इलाका ब्रिटिश भारत को सौंप दिया।

नेपाल का दावा है कि कालापानी और लिपु लेख को उसने ईस्ट इंडिया कंपनी से हासिल किया था। यहां वो 1961 में जनगणना भी करा चुका है, तब भारत ने कोई आपत्ति नहीं की थी। लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय का कहना है कि उसने नक्शे में कुछ भी नहीं बदला है। जो नक्शा दशकों से जारी हो रहा है, ये हू-ब-हू वैसा ही है।

नेपाली प्रधानमंत्री के जो तेवर हैं यदि उनका अवलोकन किया जाए तो लगता है कि कहीं न कहीं वो जो भी कर रहे हैं उसके पीछे चीन का हाथ है। माना जा रहा है कि इस जमीन को लेकर भारत के खिलाफ जाने के लिए चीन लगातार नेपाल पर दबाव बना रहा है। भारत के इस नए नक़्शे का सीधा असर चीन पर हुआ है। अलग अलग मोर्चों पर पाकिस्तान का समर्थन करने के कारण चीन पहले ही आलोचना का शिकार हो रहा है।

- अभिनय आकाश

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