By दिव्यांशी भदौरिया | Jun 22, 2026
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब ग्रह उच्च राशि, मूल त्रिकोण राशि, स्वराशि आदि राशियों को प्राप्त होता है, तो वह उन्हीं की प्रवृत्ति के अनुसार ही रिजल्ट देता है। हर एक ग्रह किसी विशेष राशि में एक विशिष्ट अवस्था को प्राप्त करता है। जैसे कि- जब ग्रह अपनी उच्च की राशि में होता है, तो सर्वाधिक अनुकूल यानी के बलवान स्थिति को प्राप्त करता है और जब ग्रह अपनी नीच की राशि में होता है, तो सबसे ज्यादा प्रतिकूल मतलब कमजोर स्थिति को प्राप्त करता है।
ज्योतिष के मुताबिक, ग्रह अपनी उच्च राशि में होने पर उत्तम फल देते हैं, नीच राशि में होने पर इसके विपरीत फल देता है। नीच का ग्रह दुर्बल हो जाता है, इसलिए प्रभावहीन रहता है। वहीं, अशुभ ग्रह यानी नीच की राशि में है, तो यह अशुभ फल नहीं देगा और शुभ ग्रह यदि नीच की राशि में है, तो शुभ फल नहीं देता, क्योंकि नीच के होने पर ग्रह प्रभावहीन हो जाते हैं, इसलिए फलादेश के समय उसे समझकर फलादेश करना चाहिए। इस रहस्य जानने के बाद फलादेश की सटीकता बढ़ाई जाती है। इसका मतलब है कि उच्च ग्रह उच्च भावना या प्रवृत्ति दर्शाता है। वहीं, नीच का ग्रह नीचता की ओर प्रवृत्ति या सोच देता है।
ज्योतिषीय रिसर्च में ग्रहों की शक्ति और उनकी वास्तविक स्थिति का ज्ञान अत्यंत आवश्यक माना जाता है। यदि किसी ग्रह की सामर्थ्य, प्रभाव और परिस्थितियों का सही मूल्यांकन न किया जाए, तो सटीक भविष्यवाणी करना कठिन हो जाता है। फलित करते समय यह समझना जरूरी होता है कि कौन-सा ग्रह कब शुभ परिणाम प्रदान करेगा, कब प्रतिकूल प्रभाव डालेगा और किन अवस्थाओं में उसका असर कमजोर पड़ जाएगा। ग्रहों के इस गहन आकलन से भविष्यवाणी अधिक विश्वसनीय और सटीक बनती है।
उदाहरण के तौर पर सूर्य का सिंह राशि पर अधिकार है, यदि किसी की जन्मपत्री में सूर्य सिंह राशि में हो, तो कहा जाएगा सूर्य बली है, क्योंकि वह अपनी राशि में स्वग्री है। अगर किसी जातक की जन्मपत्री में सूर्य मेष राशि में है, तो फलादेश के समय कहेंगे कि सूर्य अपनी उच्च राशि में है, इसे सर्वाधिक बली है। वहीं, किसी जातक की जन्मपत्री में सूर्य तुला राशि में हो, तो कहा जाएगा कि सूर्य अपनी नीच राशि में है, इसलिए बलहीन है। इसी प्रकार हर एक ग्रह के समझना काफी जरुरी है।