Iran की किस्मत कैसे उत्तर प्रदेश के इस गांव ने पलट दी, जानें क्या है हिंदी और पश्चिम एशियाई मुल्क का कनेक्शन?

By अभिनय आकाश | May 22, 2024

एक तरफ पूरी दुनिया में ईरानी राष्ट्रपति की मौत से हड़कंप मचा हुआ है। लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरानी राष्ट्रपति को बड़ा गुनहगार बताया है। अमेरिका ने साफ किया कि इब्राहिम रईसी के हाथ खून से सने हुए थे। वहीं भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने ईरान की यात्रा की है। भारत के उपराष्ट्रपति ने शोक समारोह में हिस्सा लिया। उन्होंने राष्ट्रपति रईसी और विदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियन के निधन पर शोक व्यक्त किया। दिवंगत राष्ट्रपति और उनके साथियों के अंतिम संस्कार में हजारों लोग शामिल हुए। दुनियाभर के कई नेता तेहरान पहुंचे।

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कश्मीर से भी एक खबर आई जब ईरानी राष्ट्रपति की मौत पर लोग सड़क पर अपना दुख जताने के लिए सामने आए। लेकिन ईरान से ये जुड़ाव शिया होने, या मुस्लिम होने या फिर मित्र देश होने का नहीं है। आज के ईरान तका भारत से बहुत बड़ा कनेक्शन है। ईरान में इस्लामिक क्रांति के जनक रुहोल्ला खुमैनी अपने देश में बड़े हो रहे थे तब उनका मुल्क एक लिबरल देश था। बचपन से खुमैनी का झुकाव अध्यात्मिकता की तरफ था। उनका शिया वर्ग से जुड़ाव था। ये उनके अपने दादा सैय्यद अहमद मुसाबी हिंदी से विरासत में मिला था। यहीं से भारत के ईरान कनेक्शन की शुरुआत होती है। खुमैनी के दादा अहमद हिंदी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के पास हुआ। आगे चलकर वो ईरान गए। बाराबंकी में जन्में हिंदी और उनके शिक्षाओं ने ईरान को आकार देने में बेहद ही अहम भूमिका निभाई। उनके पोते खुमैनी ईरान के पहले सुप्रीम लीडर बने और इसे एक धार्मिक मुल्क में बदल दिया। 

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बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार मुसाबी ने भारत के साथ अपना जुड़ाव दिखाने के लिए सरनेम के रूप में हिंदी का इस्तेमाल किया। उनके पोते रुहोल्ला खुमैनी को आगे चलकर ईरान क्रांति का जनक कहा गया। उन्होंने पश्चिम एशियाई देश को हमेशा के लिए धर्म तंत्र में बदल दिया। अहमद मुसाबी का जन्म 1830 में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी  से ईरान गए थे। ये वो वक्त था जब ब्रिटिश हूकूमत मुगलों को हराकर भारत पर नियंत्रण हासिल कर रही थी। अहमद हिंदी उन मौलवियों में से थे जो इस्लामी पुनरुत्थान के विचार में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि मुसलमानों को समाज में अपना स्थान फिर से हासिल करना चाहिए। 

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