Gyan Ganga: अंगद को किस तरह बहलाने-फुसलाने में लगा हुआ था रावण?

By सुखी भारती | Jun 20, 2023

रावण के हृदय पर ऐसे तीक्षण शब्द बाण इससे पूर्व किसी ने भी नहीं लगाये थे। बाहरी बाण किसी अंग को भेदें, तो उसका उपचार तो वैद्य कर सकता है। लेकिन अगर केई घाव, किसी अंग पर न होकर, हृदय पर हो, तो उसका उपचार तो गुरु की शरणागति व अपना अहंकार त्यागने पर ही होता है। रावण का यह दुर्भाग्य है, कि उसके जीवन में न तो गुरु भक्ति है, और न ही अहंकार की शून्यता। ऐसे में वीर अंगद के तीक्षण बाण उसे असहणीय पीड़ा प्रदान कर रहे हैं। लेकिन क्योंकि रावण अहंकार के विषैले दंश से पीड़ित है, ऐसे में वह गुरु की शरणागति रूपी उपचार को भी नहीं अपना पा रहा है।

‘हँसि बोलउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक।

जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक।।’

रावण ने कटाक्ष करते हुए कहा, कि बंदर में एक बड़ा सुंदर गुण होता है, कि जो उसे पालता है, वह उसका अनेकों प्रकार से भला करने की चेष्टा करता है। केवल यहीं तक ही सीमित नहीं। वह अपने स्वामी के लिए लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है। नाच-कूदकर, लोगों को रिझाकर, अपने स्वामी का हित करता है। यह उसके धर्म की निपुणता है। अरे बंदर! मैं तेरे इसी स्वामी भक्ति वाले गुण के चलते, तेरी खरी-खोटी बक-बक पर ध्यान नहीं दे रहा हूँ।

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रावण ने सोचा, कि वीर अंगद को मैं सर्वप्रथम तो, उसके मान-सम्मान से शून्य कर देता हूँ। उसके पश्चात उसे यह अहसास करवाता हूँ, कि मैंने फिर भी उसके गुण का मूल्य डाला, वह उसकी पहचान की। रावण की यह प्रबल धारणा थी, कि ऐसे वीर अंगद मेरे प्रति सकारात्मक भावों से भर जायेगा। और मैं उसे धीरे-धीरे श्रीराम के प्रति भी नकारात्मक भावों से कूट-कूट कर भर दूँगा। लेकिन रावण बार-बार मानो, वीर अंगद द्वारा अपमान करवाने का प्रण कर लेकर डटा था। कारण कि यहाँ भी वीर अंगद, रावण को टूट कर पड़ गए। वीर अंगद रावण को बोलते हैं, कि मैंने ऐसो निर्लज्ज व्यक्ति आज तक नहीं देखा। भला इसे भी कोई गुण ग्राहकता कहता है। ऐसी गुण ग्राहकता मैंने इससे पहले, श्रीहनुमान जी के मुखारबिंद सुनी थी। यह वही श्रीहनुमान जी ही थे, जिन्होंने तुम्हारे अशोक वन को उजाड़ कर, तुम्हारे पुत्र को मारकर व संपूर्ण नगर को जलाकर तुम्हारा मान मर्दन किया था। ऐसे में तुम्हें श्रीहनुमान जी पर भी क्रोधित होकर, उन्हें हीन भाव से देखना चाहिए था। लेकिन मैं तो देख रहा हूँ, तुम तो उनके बल को ही नहीं भूल पा रहे हो और उनके बल की प्रशंसा किए जा रहे हो। तो इसको किसी के प्रति गुण ग्राहकता नहीं कहते, अपितु तुम्हारी निर्लज्जता कहते हैं। तो मेरा तो यही निष्कर्ष है, कि तुम्हें न तो लज्जा है, न क्रोध है, और न ही चिढ़ है-

‘सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई।

दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।।

देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा।

तुम्हारें लाज न रोष न माखा।।’

रावण ने जब यह सुना, तो वह अपनी ढिठाई पर आ गया। वह उसे भावनात्मक स्तर पर कमजोर करने का प्रयास करने लगा। उसने कहा, कि हे वानर! अब मैं क्या करूँ, जब तेरी बुद्धि ही ऐसी है तो। तेरी ऐसी बुद्धि का ही परिणाम है, कि तू अपने बाप को खा गया।

वीर अंगद ने जब यह सुना, तो वे तपाक से बोले, कि अरे मूर्ख रावण! मैं तो ऐसा ही हूँ। मैंने पहले अपने पिता को खाया। और निश्चित ही उसके पश्चात मैं तुम्हें भी खा जाता। क्योंकि जो अपने पिता को खा सकता है, उसे तुमको खाने में भला कितना ही प्रयास लगेगा? लेकिन अभी तो मुझे कुछ और ही बात समझ में आ रही है। वह यह कि पहले तो मुझे यह बता, कि जगत में कितने रावण हैं? जगत में जितने भी रावणों को मैं जानता हूँ, पहले तू उनके बारे में सुन।

रावण वीर अंगद का यह प्रश्न सुन कर प्रश्नवाचक दृष्टि से उन्हें ताड़ने लगा। कि पता नहीं अब यह बालिसुत कौन-सा साँप निकालने वाला है?

वीर अंगद ने रावण को कितने रावणों के बारे में बताया, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम

- सुखी भारती

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