By सुखी भारती | Jun 18, 2026
महर्षि याज्ञवल्क्य बड़े ही प्रेम, माधुर्य और भाव-विभोर वाणी से महर्षि भारद्वाज को श्रीरामकथा का अमृतपान करा रहे हैं। मनु-शतरूपा की परम पावन तपोगाथा का वर्णन करने के उपरान्त वे एक प्राचीन इतिहास का उद्घाटन करते हैं, जिसे स्वयं भगवान शंकर ने माता पार्वती को सुनाया था। यह कथा कैकय देश के परम प्रतापी नरेश सत्यकेतु और उनके पुत्र प्रतापभानु से संबंधित है।
‘धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना।।
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा।।’
ज्येष्ठ पुत्र का नाम प्रतापभानु था और कनिष्ठ पुत्र अरिमर्दन कहलाता था। अरिमर्दन की भुजाओं में सहस्र गजराजों के समान बल विद्यमान था। दोनों भ्राताओं के मध्य ऐसा निर्मल स्नेह था, जिसमें छल, कपट और स्वार्थ का लेशमात्र भी स्थान न था।
जब राजा सत्यकेतु ने देखा कि उनका ज्येष्ठ पुत्र राज्य संचालन में पूर्णतः समर्थ हो चुका है, तब उन्होंने राजसिंहासन प्रतापभानु को सौंप दिया और स्वयं वन में जाकर भगवान की भक्ति तथा तपस्या में लीन हो गए।
राजा प्रतापभानु का एक अत्यन्त विद्वान, धर्मनिष्ठ और दूरदर्शी मंत्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था। वह सदैव राजा को वेद-विहित मार्ग, धर्ममय आचरण और लोककल्याणकारी नीतियों का उपदेश देता रहता था। परिणामस्वरूप प्रतापभानु के राज्य में दुःख, दारिद्र्य और क्लेश का नामोनिशान तक न था। प्रजा ऐसे सुख का अनुभव करती थी, मानो स्वर्ग स्वयं पृथ्वी पर अवतरित हो गया हो। धीरे-धीरे प्रतापभानु के पराक्रम और नीति के प्रभाव से समस्त पृथ्वी उनके अधीन हो गई।
एक दिन राजा प्रतापभानु शिकार की अभिलाषा से सुसज्जित होकर अपने तीव्रगामी अश्व पर आरूढ़ हुए और विशाल वन की ओर प्रस्थान किया। अनेक मृगों का आखेट करने के पश्चात उनकी दृष्टि एक असाधारण, विशालकाय और अत्यन्त बलवान वराह पर पड़ी। उस वराह का शरीर पर्वत के समान विशाल और गति वायु के समान तीव्र थी।
राजा ने पूर्ण एकाग्रता और पराक्रम के साथ उस पर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी, किन्तु वह विचित्र वराह प्रत्येक बार उनकी दृष्टि से ओझल हो जाता। ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई मायावी शक्ति उसे संरक्षण प्रदान कर रही हो। अंततः वह भागता हुआ वन की गहनतम गहराइयों में स्थित एक अंधकारमयी गुफा में प्रवेश कर गया।
प्रतापभानु ने गुफा के मुख पर पहुँचकर भीतर प्रवेश करने का विचार किया, किन्तु विवेक ने उन्हें रोक लिया। अज्ञात गुफा में प्रवेश करना उन्हें उचित न लगा। अतः उन्होंने लौटने का निश्चय किया।
किन्तु तभी उन्हें एक नई समस्या का आभास हुआ। वराह का पीछा करते-करते वे वन के ऐसे निर्जन और अपरिचित भाग में पहुँच चुके थे, जहाँ से अपने राज्य की दिशा का कोई ज्ञान नहीं हो रहा था। दिन ढलने को था, शरीर थकान से चूर था और प्यास कण्ठ को दग्ध कर रही थी। वे कभी जल की खोज में इधर-उधर भटकते, कभी किसी वृक्ष की छाया में क्षणभर विश्राम करते और फिर आगे बढ़ जाते।
इसी प्रकार भटकते-भटकते उनकी दृष्टि एक आश्रम पर पड़ी। आश्रम को देखकर उनके हृदय में आशा का संचार हुआ, किन्तु वे यह नहीं जानते थे कि वह किसी महात्मा का आश्रम नहीं, अपितु एक कपटी और प्रतिशोधाग्नि से दग्ध व्यक्ति का निवास था।
वास्तव में वह कोई मुनि नहीं, बल्कि एक पराजित राजा था। कभी उसका प्रतापभानु से भीषण युद्ध हुआ था। उस युद्ध में स्वयं को पराजित होता देखकर वह अपनी सेना और राज्य त्यागकर प्राणरक्षा हेतु वन में भाग आया था और तब से मुनिवेष धारण कर वहीं निवास कर रहा था—
‘फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट पुनिबेषा।।
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई।।’
ज्यों ही उस कपटी मुनि की दृष्टि प्रतापभानु पर पड़ी, वह उन्हें तत्काल पहचान गया। उसके हृदय में वर्षों से दबी प्रतिशोध की ज्वाला प्रचंड होकर भड़क उठी। वह मन ही मन हर्षित होकर सोचने लगा—“अहा! आज तो मेरा परम शत्रु स्वयं चलकर मेरे द्वार पर आ पहुँचा है। विधाता ने प्रतिशोध लेने का यह दुर्लभ अवसर मुझे प्रदान किया है।”
यद्यपि उसके हृदय में वैराग्नि धधक रही थी, तथापि वह प्रत्यक्ष युद्ध का साहस नहीं कर सका। वह भली-भाँति जानता था कि प्रतापभानु का प्रताप और पराक्रम साधारण नहीं है। बाहर से वह तपस्वी का वेश धारण किए हुए था, किन्तु भीतर उसका मन विष से भरे कलुषित पात्र के समान कड़वा था। इसलिए उसने विचार किया कि जहाँ बल असफल हो जाए, वहाँ छल अपना कार्य सिद्ध कर सकता है।
यह निश्चय कर उसने अपनी कुटिल बुद्धि का जाल बुनना आरम्भ किया। स्वयं को त्रिकालदर्शी और अंतर्यामी सिद्ध करते हुए वह राजा प्रतापभानु के समीप पहुँचा और उनसे कुछ ऐसी रहस्यमयी बातें कहने लगा, जिन्हें सुनकर राजा विस्मित रह गए।
अब वह कपटी मुनि राजा से क्या कहता है, और किस प्रकार अपने छल-जाल में फँसाकर उनके पतन की भूमिका रचता है—यह जानेंगे अगले अंक में।
जय श्रीराम।
- सुखी भारती