Pahalgam में Kalma नहीं पढ़ पाने पर हत्या, Hyderabad के स्कूल में Hindu छात्र को मिला कलमा और सूरह फातिहा का होमवर्क, चल क्या रहा है?

By नीरज कुमार दुबे | Jul 17, 2026

पहलगाम के आतंकी हमले में निर्दोष हिंदू पर्यटकों को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि वे कलमा नहीं पढ़ पाए थे। उस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था और यह सवाल खड़ा किया था कि किसी की आस्था की परीक्षा लेकर उसकी जान लेना किस तरह की कट्टर मानसिकता का परिचायक है? लेकिन अब हैदराबाद से सामने आई एक घटना ने एक नया और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। यहां एक निजी स्कूल में दूसरी कक्षा के हिंदू छात्र को कलमा और सूरह फातिहा याद करने का होमवर्क दिया गया। आखिर बच्चों की मासूम शिक्षा में धार्मिक पाठ को इस तरह शामिल करने के पीछे कैसी मानसिकता काम कर रही है? स्कूल शिक्षा का केंद्र हैं या किसी विशेष धार्मिक विचारधारा को बच्चों पर थोपने का माध्यम बनते जा रहे हैं?

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माता-पिता ने तत्काल स्कूल प्रबंधन से जवाब मांगा और पूछा कि दूसरे धर्म के बच्चे को किसी विशेष धर्म की प्रार्थना याद करने के लिए क्यों कहा गया? उनका कहना था कि शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना है, न कि किसी बच्चे पर उसकी इच्छा या उसके परिवार की धार्मिक मान्यताओं के विपरीत धार्मिक सामग्री थोपना। इस मामले के सामने आने के बाद स्कूल परिसर के बाहर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया और मामला तेजी से राजनीतिक रंग भी लेने लगा।

विवाद बढ़ने पर स्कूल प्रबंधन ने संबंधित शिक्षिका शेख आयशा परवीन को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। 15 जुलाई की तारीख वाले सेवा समाप्ति पत्र में न केवल उनकी सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त की गईं, बल्कि उन्हें सक्सेस ग्रुप ऑफ एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस के किसी भी संस्थान में भविष्य में नौकरी के लिए स्थायी रूप से अयोग्य भी घोषित कर दिया गया। हालांकि, इस कार्रवाई के अलावा स्कूल प्रबंधन ने सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत बयान जारी नहीं किया।

इस पूरे मामले में भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने दावा किया कि उनके हस्तक्षेप के बाद शिक्षिका को हटाया गया। वहीं भाजपा कार्यकर्ताओं ने स्कूल के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने भाजपा नेता एवं अधिवक्ता करुणा सागर समेत कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया। करुणा सागर ने सवाल उठाया कि जब मामला इतना गंभीर है तो अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई? उन्होंने यह भी मांग की कि यदि छात्रों पर किसी धार्मिक सामग्री को थोपने का आरोप है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए।

हालांकि, बाद में छात्र के माता-पिता ने स्कूल प्रबंधन को पत्र लिखकर कहा कि वे शिक्षिका के खिलाफ की गई कार्रवाई और उनके द्वारा मांगी गई माफी को स्वीकार करते हैं। परिवार ने यह भी उम्मीद जताई कि भविष्य में स्कूल प्रबंधन इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होने देगा और पूरा सहयोग करेगा।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई असहज प्रश्न छोड़ दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी भी शिक्षक को यह अधिकार है कि वह किसी अन्य धर्म के मासूम बच्चों को अपने धार्मिक पाठ याद करने का होमवर्क दे? यदि किसी हिंदू, सिख, ईसाई या अन्य धर्म के शिक्षक द्वारा किसी मुस्लिम छात्र को अपने धर्म के मंत्र, श्लोक या प्रार्थना याद करने के लिए बाध्य किया जाता, तो क्या समाज और प्रशासन की प्रतिक्रिया भी यही होती? शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में वैज्ञानिक सोच, नैतिक मूल्य और संवैधानिक भावना विकसित करना है, न कि उनकी धार्मिक पहचान के साथ प्रयोग करना।

देखा जाये तो यह घटना केवल एक स्कूल या एक शिक्षक तक सीमित नहीं मानी जा सकती। यदि आरोप सही हैं तो यह अभिभावकों के उस विश्वास पर चोट है, जिसके आधार पर वे अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं। देश के शिक्षा संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी बच्चा चाहे हिंदू हो, मुस्लिम हो या किसी अन्य धर्म से जुड़ा हो, उसकी इच्छा और उसके परिवार की आस्था के विरुद्ध किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा या धार्मिक अभ्यास न थोपा जाए। आखिर बच्चों की कक्षा में किताबों का स्थान होना चाहिए या धार्मिक पहचान की परीक्षा का? यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर समाज और शिक्षा व्यवस्था दोनों को देना होगा।

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