जब भी आप राजस्थान आये तो रणथम्भौर का दुर्ग देख कर ही जाए

By डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | Nov 22, 2019

शूरवीरों की आन-बान शान का प्रतीक रणथम्भौर राजस्थान का एक प्राचीन एवं प्रमुख गिरि दुर्ग है। बीहड़ वन और दुर्ग  घाटियों के मध्य अवस्थित यह दुर्ग विशिष्ट सामरिक स्थिति और सुदृढ़ संरचना के कारण अजेय माना जाता था। दिल्ली से उसकी निकटता तथा मालवा और मेवाड़ के मध्य में स्थित होने के कारण रणथम्भौर दुर्ग पर निरन्तर आक्रमण होते रहे। रणथम्भौर दुर्ग एक ऊंचे गिरि शिखर पर बना है और उसकी स्थिति कुछ ऐसी विलक्षण है कि दुर्ग के समीप जाने पर ही यह दिखाई देता है। रणथम्भौर का वास्तविक नाम रन्त: पुर है अर्थात् ’रण की घाटी में स्थित नगर’। ’रण’ उस पहाड़ी का नाम है जो किले की पहाड़ी से कुछ नीचे है एवं थंभ (स्तम्भ) जिस पर यह किला बना है। इसी से इसका नाम रणथम्भौर हो गया। यह दुर्ग चतुर्दिक पहडि़यों से घिरा है जो इसकी नैसर्गिक प्राचीरों का काम करती हैं। दुर्ग की इसी दुर्गम भौगोलिक स्थिति को लक्ष्य कर अबुल फजल ने लिखा हैं-यह दुर्ग पहाड़ी प्रदेश के बीच में है।

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रणथम्भौर को सर्वाधिक गौरव मिला यहाँ के वीर और पराक्रमी शासक राव हम्मीर देव चौहान के अनुपम त्याग और बलिदान से। हम्मीर ने सुलतान अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मदशाह (महमांशाह) को अपने यहाँ शरण प्रदान की जिसे दण्डित करने तथा अपनी साम्रज्यवादी महत्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु अलाउद्दीन ने 1301 ई. में रणथम्भौर पर एक विशाल सैन्य दल के साथ आक्रमण किया। पहले उसने अपने सेनापति नुसरत खां को रणथम्भौर विजय के लिए भेजा लेकिन किले की घेराबन्दी करते समय हम्मीर के सैनिकों द्वारा दुर्ग से की गई पत्थर वर्षा से वह मारा गया। क्रुद्ध हो अलाउद्दीन स्वयं रणथम्भौर पर चढ़ आया तथा विशाल सेना के साथ दुर्ग को घेर लिया। पराक्रमी हम्मीर ने इस आक्रमण का जोरदार मुकाबला किया। अलाउद्दीन के साथ आया इतिहासकार अमीर खुसरो युद्ध के घटनाक्रम का वर्णन करते हुए लिखता है कि सुल्तान ने किले के भीतर मार करने के लिए पाशेब (विशेष प्रकार के चबूतरे) तथा गरगच तैयार करवाये और मगरबी (ज्वलनशील पदार्थ फेंकने का यन्त्र) व अर्रादा (पत्थरों की वर्षा करने वाला यन्त्र) आदि की सहायता से आक्रमण किया। उधर हम्मीरदेव के सैनिकों ने दुर्ग के भीतर से अग्निबाण चलाये तथा मंजनीक व ढेकुली यन्त्रों द्वारा अलाउद्दीन के सैनिकों पर विशाल पत्थरों के गोले बरसाये। दुर्गस्थ जलाशयों से तेज बहाव के साथ पानी छोड़ा गया जिससे खिलजी सेना को भारी क्षति हुई। इस तरह रणथम्भौर का घेरा लगभग एक वर्ष तक चला। अन्ततः अलाउद्दीन ने छल और कूटनीति का आश्रय लिया तथा हम्मीर के दो मंत्रियों रतिपाल और रणमल को बूंदी का परगना इनायत करने का प्रलोभन देकर अपनी और मिला लिया। इस विश्वासघात के फलस्वरूप हम्मीर को पराजय का मुख देखना पड़ा। अन्ततः उसने केसरिया करने की ठानी। दुर्ग की ललनाओं ने जौहर का अनुष्ठान किया तथा हम्मीर अपने कुछ विश्वस्त सामन्तों तथा महमांशाह सहित दुर्ग से बाहर आ शत्रु सेना से युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। जुलाई, 1301 में रणथम्भौर पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया। हम्मीर के इस अदभुत त्याग और बलिदान से प्रेरित हो संस्कृत, प्राकृत, राजस्थानी एवं हिन्दी आदि सभी प्रमुख भाषाओं में कवियों ने उसे अपना चरित्रनायक बनाकर उसका यशोगान किया है। रणथम्भोर अपने में शौर्य, त्याग और उत्सर्ग की एक गौरवशाली परम्परा संजोये हुए है।

   

रणतभंवर के लाडले त्रिनेत्र गणेश विश्व धरोहर में शामिल राजस्थान के रणथंभौर दुर्ग के भीतर विराजते हैं। अरावली और विध्यांचल पहाडिय़ों के बीच रमणिक, प्राकृतिक, सौन्दर्य के मध्य होकर गणेश मंदिर तक धार्मिक आस्था लेकर पहुंचना अपने आप में एक अलग ही अहसास कराता है। भारत के चार स्वयंभू मंदिरों में से यह एक है और यहां भारत के ही नहीं, विश्व के कोने-कोने से दर्शनार्थी गणेश दर्शन के लिए आते हैं, मनौती मांगते हैं, जिन्हें त्रिनेत्र गणेश जी पूर्ण करते हैं। पूरी दुनिया में गणेश जी का यह अकेला मंदिर में है, जहां वे अपने पूरे परिवार- दो पत्नी रिद्धि और सिद्धि एवं दो पुत्र- शुभ और लाभ के साथ प्रतिस्थापित हैं। जयपुर से यह मंदिर करीब 142 किलोमीटर की दूरी पर सवाई माधोपुर जिला मुख्यालय पर स्थित है। सवाई माधोपुर से 13 किलोमीटर दूर करीब 1579 फीट की ऊंचाई पर पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक है।

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त्रिनेत्र गणेश जी का महत्व इस बात से भी है कि ये भक्तगणों की मनोकामना को पूर्ण करने वाले माने जाते हैं। इसीलिए इस कामना के वशीभूत लोग मांगलिक कार्य विशेष रूप से विवाह का पहला निमंत्रण पत्र या तो स्वयं उपस्थित होकर भेंट करते हैं या डाक से प्रेषित करते हैं। मंदिर का पुजारी निमंत्रण पत्र को गणेश जी के सम्मुख खोलकर, पढ़कर सुनाता है। त्रिनेत्र होने के कारण इन्हें महागणपति का स्वरूप माना जाता है। इसके पीछे मान्यता के अनुसार द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण का विवाह रूकमणी के साथ हुआ तो वे गणेश जी को बुलाना भूल गए और इसी से नाराज होकर गणेश जी ने अपने मूषकों को आदेश दिया कि विशाल चूहों की सेना के साथ जाओ और श्री कृष्ण के रथ के आगे धरती पर बिल खोद डालो। इससे कृष्ण का रथ आगे नहीं बढ़ पाया और जमीन में धंस गया। मूषकों के बताने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और वे रणथंभौर स्थित जगह पर गणेश जी को लेने आए, तब जाकर उनका विवाह संपन्न हुआ। इसी कारण त्रिनेत्र गणेश जी को भारत के प्रथम गणेश कहा जाता है और शादियों के हजारों निमंत्रण यहां आते हैं।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं पत्रकार

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