By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Aug 30, 2016
उपन्यास लेखन को नई दिशा देने वाले रचनाकार भगवती चरण वर्मा को हिन्दी साहित्य ने 'भूले बिसरे चित्र' बना दिया। भाषा पर गहरी पकड़ रखने वाले वर्मा की रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं लेकिन साहित्य जगत में आज वह लगभग बिसर से गए हैं। वरिष्ठ साहित्यकार रवींन्द्र कालिया ने कहा कि भगवती चरण वर्मा हिन्दी के महत्वपूर्ण उपन्यासकार हैं। मगर हिन्दी ने उन्हें लगभग भुला सा दिया और यह कुछ उनके उपन्यास 'भूले बिसरे चित्र' के जैसा ही हुआ।
साहित्यकार विलास गुप्ते ने कहा, ''भगवती चरण वर्मा ने 'चित्रलेखा' लिखा था, तब प्रेमचंद का साहित्य लोगों के जेहन में था। समसामयिक जीवन की वास्तविकताओं से इतर उस दौर में इतिहास को आधार बनाते हुए संस्कृत के शब्दों का इस्तेमाल कर चित्रलेखा की रचना करने का साहस सिर्फ वही दिखा सकते थे।'' वह कहते हैं, ''हालांकि चित्रलेखा में पाप और पुण्य को लेकर सवाल उठाए गए थे, लेकिन आध्यात्मिक और नैतिकता की दृष्टि से यह एक उत्तम उपन्यास था। आज भी यह बेहद महत्वपूर्ण है।''
गौरतलब है कि ''चित्रलेखा'' पर 1941 में और 1964 में इसी नाम से दो फिल्में बनाई गईं। वह कहते हैं ''टेढ़े मेढ़े रास्ते'' उपन्यास में आजादी के ठीक पहले और बाद के हालात का जिक्र है। इस उपन्यास में एक लय है और वास्तविकता का सटीक चित्रण भी है। इसकी भाषा आधुनिक है। 'भूले बिसरे चित्र' और 'चित्रलेखा' के अलावा उनके अन्य प्रमुख उपन्यास 'कहीं ना जाए का कहिये', 'रेखा', 'सबहीं नचावत राम गोसाई', 'सामर्थ्य और सीमा', 'संपूर्ण नाटक', 'सीधी सच्ची बातें', 'टेढ़े मेढ़े रास्ते' और 'वह फिर नहीं आई' हैं।