इमरान खान को भारत के साथ संबंध नहीं सुधारने देगी पाक सेना

By कुलदीप नैय्यर | Aug 16, 2018

यह 12 अगस्त, 1947, आजादी के तीन दिन पहले की बात है। मेरे पिता, जो डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस कर रहे थे, ने हम तीनों भाइयों को बुलाया और पूछा कि हमारा कार्यक्रम क्या है? मैंने कहा कि मैं उसी तरह पाकिस्तान रूकना चाहता हूं जिस तरह भारत में मुसलमान रूक गए हैं। मेरा बड़ा भाई, जो अमृतसर में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था, ने बीच में ही कहने के लिए दखल दिया कि पश्चिम पंजाब में भी मुसलमान हिंदुओं को उसी तरह मकान खाली करने के लिए कहेंगे जिस तरह पूर्वी पंजाब में रहने वालों को चले जाने के लिए कहा जाएगा। मैंने कहा कि यह कैसे संभव है अगर हिंदू जाने के लिए तैयार नहीं हुए। उसने कहा कि हमें जबरदस्ती निकाल दिया जाएगा।

लेकिन उनके जाने के बाद हम लोग भविष्य के बारे में विचार करने के लिए खाने की मेज के चारों ओर बैठ गए। मैंने कहा कि मैं रूक रहा हूं और उन्होंने बताया कि वे लोग अमृतसर जाएंगे और जब गड़बड़ी खत्म हो जाएगी वापस लौट आएंगे। हम सबकी राय थी कि हालात कितने भी निराशाजनक क्यों न हो, वापस सामान्य हो जाएंगे, ज्यादा से ज्यादा एक महीने में। घर में ताला लगाते वक्त मेरी मां ने कहा कि उसे अजीब महसूस हो रहा है मानो हम वापस यहां नहीं आने वाले हैं। मेरे बड़े भाई ने उसके साथ सहमति जाहिर की।

मैंने कैनवास के नीले थैले में एक पतलून और एक कमीज रख ली और यह कह कर निकल गया कि हम दरियागंज में मौसा के घर मिलेंगे। मेरी मां ने मुझे दिल्ली पहुंचने तक अपना खर्च चलाने के लिए 120 रूपए दिए। मेरे पिता ने मेरी यात्रा को आसान बना दिया था। उन्होंने एक ब्रिगेडियर से हम तीन भाइयों को सरहद पार ले जाने के लिए कहा था। उसने कहा कि उसकी जीप में जगह नहीं है और वह सिर्फ एक आदमी को ले जा सकता है। दूसरे दिन सुबह, मुझे उसकी गाड़ी में ठेल दिया गया। मैं अपने आंसू रोक नहीं पाया और मुझे संदेह हो रहा था कि हम दोबारा मिल पाएंगे।

सियालकोट से संबरावल के बीच की यात्रा सामान्य थी। लेकिन वहां से लोगों का कारवां दो विपरीत दिशाओं में जाता दिखाई दे रहा था− हिंदू भारत की ओर जा रहे थे और मुसलमान पाकिस्तान की ओर आ रहे थे। अचानक हमारी जीप रोक दी गई। एक बूढ़ा सिख रास्ते के बीच में खड़ा हो गया था और उसने अपने पोते को भारत ले जाने की विनती की। मैंने विनम्रता से उसे कहा कि मैं अभी भी अपनी पढ़ाई कर रहा हूं और उसकी विनती कितना भी उचित क्यों न हो, उसके पोते को ले नहीं जा सकता।

उसे अत्यंत बूढ़े आदमी ने कहा कि उसका परिवार खत्म हो चुका है और सिर्फ उसका यही पोता बचा है। वह चाहता था कि उसका पोता जिंदा रहे। मुझे अब भी उसका आंसू भरा चेहरा याद है, लेकिन मैंने उसे वास्तविकता बता दी थी। मेरे अपने भविष्य का ही पता नहीं था तो मैं उसके पोते को कैसे पालता? हम लोग आगे बढ़ गए। आगे की यात्रा में हमने बिखरे समान देखे, लेकिन लाशें उस समय तक हटाई जा चुकी थीं। हालांकि हवा में बदबू जरूर बची हुई थी।

उसी समय, मैंने प्रतिज्ञा की कि मैं दोनों मुल्कों के बीच अच्छे रिश्ते को बढ़ावा दूंगा। यही वजह थी कि मैंने वाघा सीमा पर मोमबत्ती जलाना शुरू किया। यह कार्यक्रम करीब 20 साल पहले शुरू हुआ था। यह एक छोटा आंदोलन था जो 15−20 लोगों को लेकर शुरू हुआ था। अब इस पार एक लाख लोग और पाकिस्तान से, सीमित संख्या में ही सही, इस मुहिम में शामिल होते हैं।

लोगों के उत्साह की सीमा नहीं होती। मेरी तमन्ना है कि सरहद को नरम बनाया जाए और अमन के हालात हों ताकि दुश्मनी दूर की जा सके। मैं उस बस में था जिसमें चढ़ कर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर गए थे। दोनों ओर खुशमिजाजी का माहौल था और मुझे लगा कि इस यात्रा से दोनों देशों के बीच आपसी व्यपार, संयुक्त कारोबार और लोगों के बीच संपर्क नियमित हो जाएंगे।

लेकिन सरहद के दोनों ओर कंटीले तार और वीजा की पाबंदियों के जरिए लोगों को इस मुल्क से उस मुल्क में ले जाने से रोकता हुआ देख कर मुझे निराशा होती है। पहले, बु़द्धिजीवी, संगीतकार और कलाकार आपस में मिल सकते थे और संयुक्त कार्यक्रम कर सकते थे। लेकिन वीजा देने में सराकारों की ओर से अपनाई जाने वाली कठोरता के कारण यह भी रूक गया है। करीब−करीब, आधिकारिक और गैर−आधिकरिक भी संपर्क नहीं रह गया है।

नए नियुक्त प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक इंटरव्यू में कहा है कि वह व्यापार और वाणिज्य सुनिश्चित करेंगे। मेरी एक ही चिंता है कि सेना से उनकी नजदीकी शायद उन्हें अपने वायदे पूरे करने नहीं दे। लेकिन, हो सकता है कि सेना वाली बात बढ़ा−चढ़ा कर कही जा रही हो। वह भी शांति चाहती है क्योंकि उसके लोग ही युद्ध लड़ते हैं और इससे जुड़ी बाकी चीजें भी उन्हें झेलनी पड़ती हैं।

चिंता पैदा करने वाली बात यह है कि भारत में फैसला चुने हुए प्रतिनिधि लेते हैं और यह पाकिस्तान के विपरीत है जहां अंतिम फैसला फौज के हाथ में है। यह कल्पना करना कठिन है कि इमरान फौज के आला अफसरों को समझा पाते हैं या नहीं।

नई दिल्ली को कोशिश करनी चाहिए। लेकिन इसने कठोर रवैय्या अख्तियार कर लिया है कि जब तक इस्लामाबाद आतंकवादियों को पनाह देना बंद नहीं करता और मुंबई धमाकों के दोषियों को सजा नहीं देता, तब तक वह वार्ता नहीं करेगा। दोनों देशों के बीच अच्छे संबंधों के लिए भारत की मांग को ध्यान में रख कर इमरान खान को पहल करनी चाहिए।

-कुलदीप नायर

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