Hindu Nav Varsh: साल 2026 में 12 नहीं, 13 महीनों का होगा हिंदू नववर्ष

By डॉ अनीष व्यास | Mar 17, 2026

हिंदू धर्म में नववर्ष की शुरुआत चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है। इस साल यह 19 मार्च को पड़ रही है। इस बार हिंदू नववर्ष की शुरुआत के साथ नव संवत्सर 2083 शुरू होगा। यह संवत्सर धार्मिक और पंचांग की दृष्टि से काफी खास माना जा रहा है। इस बार विक्रम संवत में 12 नहीं, 13 महीने होंगे। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि साल 2026 में हिंदू कैलेंडर का नया साल नवसंवत्सर 2083 इस बार 13 महीनों का होगा। कारण कि इस नवसंवत में अधिकमास ( मलमास) आएगा। इस कारण एक महीना बढ़ जाएगा। ज्येष्ठ माह अधिकमास होगा। यह ज्येष्ठ अधिकमास 17 मई से 15 जून तक रहेगा। इससे आगे के महीनों के व्रत त्योहार 15 से 20 दिन देरी से आएंगे। 19 मार्च से विक्रम संवत लगेगा, इसी दिन से गुड़ी पड़वा, वासंती नवरात्र की शुरुआत होती है।

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अधिक मास

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि विक्रम संवत 2083 में ज्येष्ठ महीने में अधिक मास आएगा। यह अधिक मास 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक रहेगा। अधिक मास आने की वजह से साल के आगे आने वाले व्रत और त्योहारों की तारीखें 15 से 20 दिन आगे खिसक जाएंगी। इस साल एक नहीं, बल्कि 2 महीने ज्येष्ठ होंगे। पहले 15 दिन सामान्य ज्येष्ठ माह होंगे, इसके बाद 30 दिन अधिक ज्येष्ठ मास के होंगे। अंत के 15 दिन फिर सामान्य ज्येष्ठ मास के होंगे।

अधिक ज्येष्ठ मास

आरंभ: 17 मई 2026

समाप्ति: 15 जून 2026

सामान्य ज्येष्ठ मास

आरंभ: 22 मई 2026

समाप्ति: 29 जून 2026

यानी इस अवधि में दोनों महीने एक-दूसरे के साथ ओवरलैप भी करेंगे।

13वां महीना होगा अधिक मास

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि विक्रम संवत 2083 में ज्येष्ठ का अधिक मास होने से ये साल 12 नहीं बल्कि 13 महीनों का रहेगा। अधिक मास यानी इस साल ज्येष्ठ का महीना 30 नहीं बल्कि 60 दिनों का होगा। ज्येष्ठ का अधिक मास 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा। अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। धर्म ग्रंथों में इसका विशेष महत्व बताया गया है। इस महीने में मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि पर रोक रहती है।

ज्येष्ठ महीने में होगी भीषण गर्मी 

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि इस साल गर्मी का असर सामान्य से कुछ ज्यादा समय तक बना रह सकता है। अप्रैल-मई की तपिश लंबी चलने की संभावना है। वहीं, मानसून के आने में थोड़ी देरी हो सकती है। या फिर शुरुआती दिनों में बारिश असमान रह सकती है। कुछ इलाकों में तेज बारिश तो कुछ जगहों पर कम बारिश की स्थिति बन सकती है। इसका सीधा असर खेती-किसानी पर भी पड़ेगा। खरीफ फसलों की बुआई की तारीखें आगे-पीछे हो सकती हैं। किसानों को मौसम को देखते हुए फैसले लेने पड़ेंगे। हालांकि, अगर मानसून ठीक से सक्रिय हुआ तो फसलों के लिए हालात बेहतर भी हो सकते हैं। अधिक मास के कारण यूपी में यह साल मौसम के लिहाज से उतार-चढ़ाव वाला रह सकता है। गर्मी और बारिश दोनों में बदलाव देखने को मिल सकता है। इसलिए लोगों को स्वास्थ्य, पानी और खेती से जुड़े मामलों में अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होगी।

क्यों लगता है मलमास

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि सूर्य और चंद्र कैलेंडर के बीच का फर्क ही इस अद्भुत महीने को जन्म देता है। सौर वर्ष 365 दिन का होता है और चंद्र वर्ष 354 दिन। यह अंतर हर 32 महीने और 16 दिनों में इतना बढ़ जाता है कि पंचांग को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ना पड़ता है। इसी अतिरिक्त महीने को अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।

मांगलिक कार्यों से परहेज

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि परंपराओं में कहा गया है कि मलमास के दौरान विवाह जैसे शुभ संस्कार, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण, भूमि पूजन या किसी नए व्यवसाय की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किए गए शुभ कार्य अपेक्षित फल नहीं देते और ग्रह-नक्षत्र भी मांगलिक कर्मों के अनुकूल नहीं माने जाते। इसी कारण इस पूरे अवधि में बड़े संस्कारों को स्थगित करने की सलाह दी जाती है।

क्यों जरूरी है अधिक मास

भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू धर्म में लगभग सभी व्रत त्योहार चंद्रमा की तिथियों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं। चंद्रमा लगभग 29 दिनों में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है, जिसे एक चंद्र मास कहते हैं। जब चंद्रमा पृथ्वी के 12 चक्कर लगा लेता है तो इसे एक चंद्र वर्ष कहते हैं जो लगभग 355 दिन का होता है। वहीं सौर वर्ष 365 का होता है। अगर अधिक मास की व्यवस्था न हो तो हिंदू व्रत-त्योहार हर साल 10 दिन पीछे खिसकते चले जाएंगे, जिससे दिवाली बारिश में और होली शीत ऋतु में मनाई जाने लगेगी। ऐसी स्थिति से बचने के लिए ही हमारे विद्वानों में अधिक मास की व्यवस्था की है।

- डॉ अनीष व्यास

भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक

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