By संतोष उत्सुक | Aug 01, 2023
चुनावों के देश में जब भी नया चुनाव नज़दीक आता है बयानों की दुनिया में संस्कार प्रवेश करना शुरू हो जाते हैं। इतिहास के अनुसार, महा जन थोडा बहुत कटा फटा हुआ बयान भी दें तो बढ़िया असर पड़ना शुरू हो जाता है। ख़बरों के रंग ढंग बदलने लगते हैं। उनमें आम इंसान से चिपके मुद्दों की पूछ बढ़ जाती है। ऐसी चीज़ों और भावनाओं की बिक्री और बाज़ार भाव बढ़ जाते हैं, जो बरसों से अबिकाऊ रही। फटेहाली भी हाथों हाथ बिकनी शुरू हो जाती है। प्रतिस्पर्धा बढाने के लिए, दूसरे बयान वातावरण में आकर कहते हैं, इस तरह का ब्यान उस तरह की ज़बान से शोभा नहीं देता।
सवाल यह है कि क्या संस्कार सीमित प्रकार व रंग रूप के होते हैं। अपने कर्तव्य का कर्मठता से पालन करने वालों द्वारा, दुर्भावना का प्रचार करने मात्र से, संस्कारों का कार्यान्वन बदल दिया जाता है। फटे, कटे, घिसे कपडे तो पारम्परिक मजबूरियों का फैशनेबल पुनर्जन्म है। नए दृष्टिकोण से सोचें तो इसे पुराने फटे हुए संस्कारों को नया कलेवर देना भी तो माना जा सकता है। गर्व महसूस करने के लिए ज़रूरी तो नहीं कि सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक या आर्थिक उपलब्धि हासिल की जाए। सार्वजनिक स्तर पर शारीरिक व मानसिक रूप से नंगे होते हुए, लेकिन महंगे, डिज़ाइनर, खुशबूदार कपडे और जूते पहनकर सब से यह कहलवाने की रिवायत जारी है कि वाह! क्या अंदाज़ है। आज जो संस्कार ज़िंदगी के बाज़ार में उपलब्ध हैं वे फटी हुई जीन्स से बेहतर नहीं दिखते, उनमें से जिस्म ही नहीं आदमीयत भी नंगी होती नज़र आती है।
सबके सामने कपड़ों समेत नंगे होकर, बात मनवाने के ज़माने में यह भी कहते रहना ज़रूरी हो गया है कि गौर से देखिए, मैंने खुद को कितने अच्छे से कवर कर रखा है। हमारे यहां तो फटे हुए बयान भी अनेक संस्कारों के मुंह सिलने का ज़िम्मेदारी भरा काम करते हैं।
- संतोष उत्सुक