By नीरज कुमार दुबे | Sep 26, 2026
दिल्ली में विपक्षी गठबंधन INDIA के भीतर एक बार फिर एकजुटता की कवायद तेज हो गयी है। चुनाव आयोग से संबंधित मुद्दे पर साझा लड़ाई लड़ने की तैयारी हो रही है, नेताओं के बीच बातचीत बढ़ी है और दिल्ली में सभी विपक्षी दलों की बैठक भी बुला ली गई है। लेकिन सियासत का असली सवाल यह है कि क्या दिल्ली की एकजुटता उत्तर प्रदेश की जमीन तक पहुंच पाएगी? क्योंकि जिस गठबंधन को दिल्ली में एक मंच पर खड़ा करने की कोशिश हो रही है, उसी गठबंधन के सबसे बड़े चुनावी मैदान उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच खींचतान लगातार खुलकर सामने आ रही है।
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मगर हुजूर, राजनीति में असली परीक्षा मंच पर हाथ मिलाने की नहीं, मैदान में सीट बांटने की होती है। और यहीं से कहानी बदल जाती है। उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटों का हिसाब किताब शुरू होते ही सपा और कांग्रेस के बीच पुरानी दोस्ती की परतें खुरचने लगी हैं। कांग्रेस ज्यादा सीटों की मांग कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी अपनी ताकत और पिछले चुनावी प्रदर्शन के आधार पर बड़ा हिस्सा अपने पास रखना चाहती है। दोनों दल अपने-अपने स्तर पर सीटों की ताकत-कमजोरी का आकलन कर रहे हैं और गंभीर सीट बंटवारे की बातचीत अक्टूबर में शुरू होने की संभावना बताई गई है।
उधर, तनाव सिर्फ बंद कमरों की बातचीत तक सीमित नहीं है। कांग्रेस के इमरान मसूद ने जल्द गठबंधन तय करने की मांग की और कहा कि भ्रम की स्थिति में कांग्रेस चुनावी तैयारी नहीं कर सकती। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने तो यहां तक कहा कि मतभेद होने पर पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। दूसरी तरफ सपा की सांसद इकरा हसन ने साफ कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती देने की क्षमता अखिलेश यादव के नेतृत्व में है। इस तरह यानी एक ही गठबंधन में दो सुर, दो दावे और दो नेतृत्व केंद्र दिखाई दे रहे हैं।
अखिलेश यादव का रायबरेली से पीडीए यात्रा शुरू करना भी इसी रस्साकशी का हिस्सा माना जा रहा है। रायबरेली कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रहा है, लेकिन अखिलेश ने वहीं से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर यह संदेश दिया कि उत्तर प्रदेश में जमीन किसके पास है, इसका हिसाब अलग से होगा। इसे कई राजनीतिक विश्लेषक सीट बंटवारे से पहले सपा की राजनीतिक ताकत दिखाने की कवायद के तौर पर देख रहे हैं।
और अब मैनपुरी-इटावा-सैफई की धरती से शिवपाल सिंह यादव का बयान इस खींचतान में नया तड़का लगा रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा था कि अखिलेश रायबरेली जा सकते हैं तो कांग्रेस भी इटावा, कन्नौज और मैनपुरी जाएगी। जवाब में शिवपाल ने कहा— जाइए, अभियान चलाइए, लेकिन वहां कांग्रेस को वोट नहीं मिलेगा। उन्होंने अपने जसवंतनगर क्षेत्र का हवाला देते हुए कांग्रेस को वहां वोट न मिलने की बात कही और सपा की जीत का दावा किया।
अब शिवपाल के इस बयान का राजनीतिक मतलब समझिए। यह सिर्फ किसी एक रैली या दौरे पर प्रतिक्रिया नहीं है। यह दरअसल सपा के उस आत्मविश्वास का प्रदर्शन है जिसमें वह कांग्रेस को यह याद दिलाना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन की जमीन सपा के संगठन और सामाजिक आधार से तैयार होती है। मैनपुरी, इटावा और सैफई जैसे इलाकों में कांग्रेस का चुनावी अभियान सपा के लिए सिर्फ सहयोगी दल की गतिविधि नहीं, बल्कि अपने प्रभाव क्षेत्र में दूसरे सहयोगी की राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
यही INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी पहेली है। दिल्ली में सवाल है कौन-कौन साथ आएगा? उत्तर प्रदेश में सवाल है किसके साथ कौन कितनी सीट पर लड़ेगा? दिल्ली में साझा मुद्दे खोजे जा रहे हैं, लखनऊ में सीटों का हिसाब किताब चल रहा है। दिल्ली में एकजुटता की तस्वीर खींची जा रही है और यूपी में दोनों दल अपने-अपने झंडे ऊंचे करने में जुटे हैं। हम आपको याद दिला दें कि 2024 में उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस ने मिलकर 43 लोकसभा सीटें जीती थीं। सपा 37 और कांग्रेस छह पर विजयी रही थी। यही प्रदर्शन अब दोनों दलों के आत्मविश्वास और दावेदारी का आधार बन रहा है। लेकिन 2027 की विधानसभा राजनीति का गणित अलग है। सपा अपने संगठन, सामाजिक समीकरण और विधानसभा में अपनी मौजूदा ताकत के आधार पर ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है, जबकि कांग्रेस 2024 के प्रदर्शन और राहुल गांधी की सक्रियता को अपनी बढ़ती राजनीतिक हैसियत का आधार बना रही है।
यानी मामला साफ है। INDIA गठबंधन को जोड़ने की कोशिश दिल्ली में हो रही है, लेकिन उसे बचाने की असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होनी है। क्योंकि गठबंधन सिर्फ नेताओं की मुलाकातों और साझा तस्वीरों से नहीं चलता। गठबंधन तब चलता है जब कार्यकर्ता एक-दूसरे के लिए जमीन छोड़ें, नेता एक-दूसरे की सीमा का सम्मान करें और सीटों के बंटवारे पर दोनों पक्ष अपनी महत्वाकांक्षा को किसी साझा फार्मूले में बांध सकें।
वरना दिल्ली में जितनी बार हाथ मिलेंगे, मैनपुरी और रायबरेली में उतनी ही बार पैर एक-दूसरे की जमीन पर पड़ते दिखाई देंगे। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यही पैर कब एक-दूसरे के रास्ते में आ जाएं, इसका फैसला अक्सर दिल्ली की बैठक नहीं, जमीन पर लड़ने वाला कार्यकर्ता करता है।
-नीरज कुमार दुबे