India Bangladesh Border पर Smart Fencing का काम और तेज, घुसपैठियों और तस्करों पर चौबीसों घंटे रहेगी नजर

By नीरज कुमार दुबे | Jul 02, 2026

पश्चिम बंगाल की भारत बांग्लादेश सीमा पर अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। मुर्शिदाबाद के जलंगी गांव से लेकर कूचबिहार, उत्तर चौबीस परगना और सिलीगुड़ी तक सीमा सुरक्षा को अभेद्य बनाने का अभियान तेज हो चुका है। वर्षों तक राजनीतिक टकराव, ढीले रवैये और स्थानीय विवादों में उलझी सीमा अब नई तकनीक और सख्त प्रशासनिक फैसलों के सहारे मजबूत की जा रही है। इस पूरी कवायद का सबसे स्पष्ट संदेश है कि भारत की सीमा अब किसी भी घुसपैठिए के लिए खुला रास्ता नहीं रहने वाली।

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पश्चिम बंगाल में कुल 2217 किलोमीटर लंबी भारत बांग्लादेश सीमा आती है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार इसमें 569 किलोमीटर हिस्सा अब तक बिना बाड़ का है। इनमें से 456 किलोमीटर क्षेत्र में बाड़ लगाना संभव है जबकि 113 किलोमीटर इलाका नदियों और बदलती भौगोलिक स्थिति के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इसके बावजूद सीमा सुरक्षा बल नई तकनीक के सहारे इन क्षेत्रों को भी सुरक्षित बनाने की तैयारी कर रहा है।

राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा लंबे समय से विवाद का केंद्र रहा है। पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार पर आरोप लगते रहे कि उसने सीमा पर बाड़ लगाने में सहयोग नहीं किया और ढीले रवैये के कारण अवैध घुसपैठ को बढ़ावा मिला। चुनाव के दौरान यह मुद्दा प्रमुख बना और नई सरकार ने सत्ता में आते ही सीमा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने पद संभालते ही सीमा सुरक्षा बल को जमीन सौंपने की प्रक्रिया तेज कर दी। केवल कुछ ही हफ्तों में सैकड़ों एकड़ जमीन सीमा सुरक्षा बल को हस्तांतरित कर दी गई।

हालांकि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान नहीं है। सर्वेक्षण दल पहले सीमा से डेढ़ सौ गज दूरी पर संभावित फेंसिंग लाइन तय करते हैं। इसके बाद भूमि सुधार विभाग और लोक निर्माण विभाग सफेद झंडों से क्षेत्र चिह्नित करते हैं। किसानों और जमीन मालिकों को दस्तावेज लेकर बुलाया जाता है और मुआवजे पर बातचीत होती है। रिपोर्टों के मुताबिक कुछ गांवों में कम मुआवजे को लेकर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं।

इसके अलावा, सीमा क्षेत्र की भौगोलिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पद्मा नदी के कटाव ने कई जगह पुरानी सड़क और फेंसिंग को बहा दिया। चर भूमि वाले इलाके मानसून में पूरी तरह पानी में डूब जाते हैं और वहां नाव से आवाजाही करनी पड़ती है। ऐसे क्षेत्रों में स्थायी बाड़ बनाना बेहद कठिन माना जाता है। फिर भी सीमा सुरक्षा बल इन चुनौतियों से निपटने के लिए नई तकनीक का सहारा ले रहा है।

इतिहास भी इस संकट की जड़ में रहा है। वर्ष 1947 में खींची गई रेडक्लिफ रेखा ने कई गांवों और बस्तियों को उलझन में डाल दिया। बाद में भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि सीमा समझौते के जरिए कई एन्क्लेव बदले गए, लेकिन आज भी कुछ इलाकों में जमीन के कागजों में बांग्लादेश का नाम दर्ज है। ऐसे गांवों के लोग पहले भूमि अभिलेखों में सुधार की मांग कर रहे हैं।

इसके बावजूद एक बात साफ है कि अब सीमा सुरक्षा को लेकर भारत का रुख पहले से कहीं अधिक कठोर हो चुका है। अवैध घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार से होने वाली संदिग्ध गतिविधियों पर निर्णायक प्रहार की तैयारी चल रही है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को यह समझ लेना चाहिए कि भारत की सीमा अब पहले जैसी कमजोर नहीं रही। आधुनिक निगरानी प्रणाली, चौबीसों घंटे सक्रिय सुरक्षा बल और तेजी से बन रही स्मार्ट फेंसिंग उनके हर रास्ते को बंद करने की दिशा में बढ़ रही है।

बहरहाल, जो लोग अब भी भारत की सीमा को आसान रास्ता समझते हैं, उनके लिए यह स्पष्ट चेतावनी है कि अवैध प्रवेश की हर कोशिश अब पकड़ी जाएगी और कानून के तहत सख्त कार्रवाई होगी। देश की सुरक्षा से खिलवाड़ अब किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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