Prabhasakshi NewsRoom: Bangladesh PM से मिलने के तुरंत बाद Delhi आकर PM Modi से मिले Dinesh Trivedi, पलट गया पूरा खेल

By नीरज कुमार दुबे | Aug 12, 2026

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में पिछले कुछ समय से जिस तरह की तल्खी और अविश्वास दिखाई दिया है, उसके बीच मोदी सरकार ने अब कूटनीतिक संवाद को फिर से पटरी पर लाने की स्पष्ट कोशिश शुरू कर दी है। ढाका में उच्चस्तरीय मुलाकातों के बाद भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलना नई राजनीतिक परिस्थितियों में भारत की बांग्लादेश नीति को लेकर गंभीर मंथन का संकेत है।

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यही इस पूरी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। भारत यह संकेत दे रहा है कि ढाका में सत्ता परिवर्तन के बावजूद वह बांग्लादेश के साथ अपने दीर्घकालिक हितों को किसी एक राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं करना चाहता। आपसी हित, पारस्परिक लाभ और संवेदनशीलताओं का सम्मान करने संबंधी नई दिल्ली के संदेश इस बात को रेखांकित करते हैं कि भारत रिश्तों में स्थायित्व चाहता है, टकराव नहीं।

लेकिन इस कूटनीतिक पहल की राह आसान नहीं है। सबसे बड़ी पेचीदगी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग को लेकर है। बांग्लादेश लगातार हसीना को भारत से वापस भेजने की मांग कर रहा है। जिस पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस अनुरोध की भारत में स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप जांच की जा रही है और प्रक्रिया पूरी होने पर जानकारी दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि शेख हसीना अगस्त 2024 में अपनी सरकार के पतन के बाद भारत आ गईं थीं। बांग्लादेश की पिछली सरकार भी उनके प्रत्यर्पण की मांग कर चुकी थी और उन्हें तथा पूर्व गृहमंत्री असदुज्जमान खान कमाल को 2024 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में मौत की सजा सुनाई जा चुकी है।

देखा जाये तो नई दिल्ली के लिए यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील कूटनीतिक प्रश्न भी है। हाल ही में भारत में शेख हसीना के एक वर्चुअल कार्यक्रम को लेकर ढाका ने कड़ा विरोध जताया था। भारत ने साफ किया कि कार्यक्रम एक निजी मीडिया संस्था ने आयोजित किया था और सरकार का उससे कोई संबंध नहीं था। ऐसे माहौल में नई दिल्ली का दिनेश त्रिवेदी के जरिए नई बांग्लादेशी सरकार तक संवाद का संदेश पहुंचाना इस बात का संकेत है कि वह विवादित मुद्दों को रिश्तों के व्यापक ढांचे पर हावी नहीं होने देना चाहता।

हम आपको यह भी बता दें कि दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में भारत का उच्चायुक्त बनाना भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत था। वरिष्ठ राजनीतिज्ञ और लंबे राजनीतिक अनुभव वाले त्रिवेदी को ढाका भेजकर नई दिल्ली ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि बांग्लादेश के साथ रिश्तों में पैदा होने वाली जटिलताओं को केवल नौकरशाही या सुरक्षा के चश्मे से नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद और परिपक्व कूटनीति के जरिए सुलझाने की जरूरत है। ऐसे समय में जब दोनों देशों के बीच शेख हसीना के प्रत्यर्पण, सीमा सुरक्षा और राजनीतिक अविश्वास जैसे संवेदनशील मुद्दे मौजूद हैं, एक अनुभवी राजनीतिक चेहरे को संवाद का माध्यम बनाना बताता है कि मोदी सरकार रिश्तों को टकराव की दिशा में ले जाने की बजाय बातचीत के जरिए स्थिर और संतुलित करना चाहती है। त्रिवेदी की ढाका में लगातार उच्चस्तरीय मुलाकातें और उसके तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी से उनकी बैठक इसी व्यापक राजनीतिक कूटनीति की अगली कड़ी के तौर पर देखी जा सकती है।

देखा जाये तो रणनीतिक दृष्टि से बांग्लादेश भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। बंगाल की खाड़ी में उसकी भौगोलिक स्थिति, पूर्वोत्तर भारत से उसका जुड़ाव, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क, ये सभी भारत की दीर्घकालिक रणनीति से सीधे जुड़े हैं। इसी कारण सुरक्षा सहयोग को फिर से मजबूत करना महज द्विपक्षीय मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की पूर्वोत्तर और हिंद-प्रशांत रणनीति का भी हिस्सा है।

इस संदर्भ में भारत द्वारा प्रधानमंत्री तारिक रहमान को दो अलग-अलग निमंत्रण दिया जाना खास महत्व रखता है। एक निमंत्रण द्विपक्षीय भारत यात्रा का है और दूसरा सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र का, वह भी बिम्सटेक के मौजूदा अध्यक्ष के रूप में। हालांकि बांग्लादेश ने अभी यात्रा पर फैसला नहीं किया है और उसके विदेश मंत्री ने दोनों निमंत्रणों को अलग-अलग रखने पर जोर दिया है।

दरअसल, यहीं मोदी सरकार की कूटनीति का बड़ा रणनीतिक दांव दिखाई देता है। भारत बांग्लादेश को केवल द्विपक्षीय रिश्ते के चश्मे से नहीं, बल्कि BIMSTEC और बंगाल की खाड़ी की व्यापक क्षेत्रीय संरचना के केंद्र में देख रहा है। BIMSTEC में भारत, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड शामिल हैं। बांग्लादेश की अध्यक्षता और BRICS आउटरीच में उसकी संभावित भागीदारी नई दिल्ली को क्षेत्रीय सहयोग के व्यापक मंच पर ढाका से संवाद बढ़ाने का अवसर देती है।

इसलिए दिनेश त्रिवेदी की मोदी से मुलाकात को केवल एक राजनयिक रिपोर्टिंग इवेंट मानना भूल होगी। यह उस बड़ी कोशिश का हिस्सा है जिसमें भारत राजनीतिक मतभेदों के बावजूद बांग्लादेश के साथ संवाद की खिड़की खुली रखना चाहता है। हसीना का मुद्दा, सुरक्षा सहयोग, द्विपक्षीय यात्राएं और BIMSTEC जैसे क्षेत्रीय मंच, इन सभी को अलग-अलग संभालते हुए नई दिल्ली रिश्तों को एक नए संतुलन की ओर ले जाने की कोशिश कर रही है।

बहरहाल, आखिरकार भारत के लिए मजबूत और स्थिर बांग्लादेश केवल पड़ोसी होने का सवाल नहीं है; यह सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी, बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक पहुंच और पूरे दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए मोदी सरकार के सामने असली चुनौती सिर्फ रिश्ते सुधारने की नहीं, बल्कि उन्हें राजनीतिक बदलावों से ऊपर उठाकर स्थायी रणनीतिक साझेदारी में बदलने की है। ढाका में शुरू हुआ नया संवाद इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम जरूर है लेकिन आगे की राह तय करेगी कि यह पहल वास्तविक विश्वास में बदलती है या फिर पुरानी कड़वाहटों के बीच सीमित कूटनीतिक कवायद बनकर रह जाती है।

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